आलोक कुमार | नई दिल्ली/गुरुग्राम, 22 नवंबर 2025
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग (NCMEI) ने हरियाणा के चर्चित अल-फलाह विश्वविद्यालय के खिलाफ अभूतपूर्व कार्रवाई करते हुए उसे एक कड़ा शो-कॉज नोटिस जारी किया है। आयोग ने विश्वविद्यालय से पूछा है कि उसका अल्पसंख्यक संस्था का दर्जा तत्काल प्रभाव से क्यों न रद्द कर दिया जाए। 20 नवंबर को जारी नोटिस में आयोग ने साफ कहा है कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोप और अल्पसंख्यक स्टेटस के कथित दुरुपयोग को देखते हुए विश्वविद्यालय का वर्तमान दर्जा बनाए रखना अब उचित नहीं लगता। यह नोटिस प्रोफेसर शाहिद अख्तर की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय कमेटी ने जारी किया है, जिसने 4 दिसंबर को अल-फलाह विश्वविद्यालय के कुलपति और ट्रस्ट पदाधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से दिल्ली में उपस्थित होकर विस्तृत दस्तावेजों के साथ जवाब पेश करने का निर्देश दिया है। आयोग ने चेतावनी दी है कि यदि जवाब संतोषजनक नहीं मिला तो NCMEI एक्ट के तहत मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए minority status का तत्काल प्रभाव से withdrawal किया जा सकता है।
सूत्रों के अनुसार यह कार्रवाई केवल हालिया आतंकी कड़ी पर आधारित नहीं है, बल्कि पिछले कई वर्षों से विश्वविद्यालय पर प्रशासनिक अनियमितताओं, वित्तीय पारदर्शिता की कमी और नियमों के उल्लंघन के आरोप लगते रहे हैं। द इकोनॉमिक टाइम्स की 21 नवंबर की रिपोर्ट के अनुसार, अल-फलाह विश्वविद्यालय ने 2007 से अब तक केंद्र सरकार की विभिन्न स्कॉलरशिप योजनाओं—पोस्ट-मैट्रिक, मेरिट-कम-मीन्स, मौलाना आजाद फेलोशिप आदि—के तहत करोड़ों रुपये प्राप्त किए, लेकिन इसके बदले में जरूरी ऑडिट रिपोर्ट, यूटिलाइजेशन सर्टिफिकेट और लाभार्थी छात्रों की पूरी सूची समय पर जमा नहीं की। सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि 2018-19 से 2023-24 के बीच विश्वविद्यालय ने लगभग 42 करोड़ रुपये की छात्रवृत्ति राशि ली, जिनमें से 11 महत्वपूर्ण यूसी आज तक लंबित हैं। इसी अवधि में विश्वविद्यालय ने अपने ट्रस्ट डीड और नियम-कानूनों में बदलाव किए, जिनकी सूचना न हरियाणा सरकार को दी गई और न ही NCMEI को, जो नियमानुसार अनिवार्य था।
मामले का सबसे संवेदनशील पहलू राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा है। 10 नवंबर को हुए फरीदाबाद रेड फोर्ट आतंकी हमले में गिरफ्तार दो मुख्य आरोपी—जावेद अहमद सिद्दीकी और एक अन्य व्यक्ति—अल-फलाह विश्वविद्यालय के पूर्व छात्र बताए जा रहे हैं। खुफिया एजेंसियों की प्रारंभिक रिपोर्ट में दावा किया गया है कि हमले की साजिश के दौरान विश्वविद्यालय कैंपस के कुछ हिस्सों का इस्तेमाल मीटिंग पॉइंट के रूप में किया गया। यही नहीं, कुछ वर्तमान छात्रों के नाम भी जांच एजेंसियों की रडार पर हैं। आयोग ने इस पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा है कि अल्पसंख्यक संस्था का दर्जा केवल शैक्षणिक सशक्तिकरण और सामाजिक उत्थान के उद्देश्य से दिया जाता है, यदि इसका उपयोग देश की सुरक्षा के खिलाफ गतिविधियों में हो रहा है तो इसे तुरंत वापस लेना आवश्यक है।
इस बीच हरियाणा सरकार को भी आयोग ने अलग से पत्र लिखकर जवाब तलब किया है। राज्य के उच्च शिक्षा विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में अल-फलाह विश्वविद्यालय के खिलाफ फर्जी दाखिले, फर्जी डिग्रियां और फंड के दुरुपयोग जैसी कई शिकायतें मिली थीं, लेकिन अल्पसंख्यक दर्जे की आड़ में संस्थान अक्सर जांच से बच निकलता रहा। अब NCMEI की इस ऐतिहासिक सख्ती के बाद राज्य सरकार भी एक उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करने पर गंभीरता से विचार कर रही है, जिससे विश्वविद्यालय के संचालन और वित्तीय गतिविधियों की व्यापक समीक्षा की जा सके।
इसके अतिरिक्त राष्ट्रीय मूल्यांकन एवं प्रत्यायन परिषद (NAAC) ने भी विश्वविद्यालय को नोटिस जारी किया है, जिसमें आरोप लगाया गया है कि अल-फलाह ने ‘A’ ग्रेड रेटिंग प्राप्त करने के लिए गलत और बढ़ा-चढ़ा कर डेटा प्रस्तुत किया। NAAC ने संकेत दिया है कि यदि आरोप सही पाए गए तो विश्वविद्यालय की ग्रेडिंग वापस ली जा सकती है, जिससे इसकी शैक्षणिक विश्वसनीयता पर बड़ा असर पड़ेगा। विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी है, लेकिन सूत्रों के अनुसार 4 दिसंबर की सुनवाई से पहले वह सभी पुराने रिकॉर्ड और सुरक्षा संबंधी आरोपों पर सफाई तैयार करने में लगा हुआ है।
कुल मिलाकर, अल-फलाह विश्वविद्यालय इस समय अपने अस्तित्व के सबसे बड़े संकट का सामना कर रहा है। एक तरफ अल्पसंख्यक दर्जा छिनने का खतरा, दूसरी ओर NAAC की कार्रवाई और राज्य सरकार की संभावित जांच, और सबसे ऊपर राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर आरोप—इन सबने विश्वविद्यालय को कठघरे में खड़ा कर दिया है। माना जा रहा है कि यह मामला आने वाले दिनों में न केवल हरियाणा बल्कि देशभर की अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं की जवाबदेही, पारदर्शिता और संरचनात्मक निगरानी पर व्यापक बहस को जन्म देगा। 4 दिसंबर की सुनवाई का फैसला न केवल अल-फलाह विश्वविद्यालय का भविष्य तय करेगा, बल्कि भारत में अल्पसंख्यक संस्थानों के नियामक ढांचे की दिशा और कठोरता को भी निर्धारित कर सकता है।




