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अल फ़लाह यूनिवर्सिटी फ़ाउंडर गिरफ्तार: शिक्षा की आड़ में सौ करोड़ का ‘मनी लॉन्ड्रिंग जाल’ बेनकाब

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आलोक कुमार | नई दिल्ली, 18 नवंबर 2025

दिल्ली–NCR में फैली शैक्षणिक संस्थाओं की दुनिया में आज एक बड़ा भूचाल तब आया जब Enforcement Directorate (ED) ने अल फलाह यूनिवर्सिटी के संस्थापक और ट्रस्ट चेयरमैन जावेद अहमद सिद्दीकी को धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA) के तहत गिरफ्तार कर लिया। यह गिरफ्तारी महज किसी वित्तीय अनियमितता का मामला नहीं, बल्कि एक बड़े “इकोनॉमिक–टेरर नेटवर्क” की संभावित कड़ी के रूप में देखी जा रही है। जांच एजेंसी का दावा है कि अल फलाह समूह की फंडिंग, जमीन खरीद, ट्रस्ट के लेन–देन, और उससे जुड़े शेल कंपनियों के नेटवर्क ने इतने गंभीर सवाल खड़े किए हैं कि सिद्दीकी की गिरफ्तारी अपरिहार्य हो गई थी। पिछले 48 घंटों में जिन 25 ठिकानों पर छापेमारी हुई, उनमें विश्वविद्यालय का फ़रीदाबाद कैंपस, ट्रस्ट से जुड़े दफ्तर, प्रॉपर्टी डीलरों के कार्यालय और कथित शेल कंपनियों के ठिकाने शामिल थे। ED सूत्रों के अनुसार, टीम को कई जगह से ऐसे दस्तावेज मिले जो यह संकेत देते हैं कि विश्वविद्यालय की शैक्षणिक पहचान के पीछे करोड़ों रुपये का वित्तीय जाल बुना गया था, जिसे अब “व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल” के रूप में भी जांचा जा रहा है।

शिक्षा के नाम पर ‘इकोनॉमिक सिंडिकेट’?

ED की शुरुआती जांच में यह पाया गया कि अल फलाह यूनिवर्सिटी और उससे जुड़े Al Falah Charitable Trust ने पिछले कई वर्षों में जिन स्रोतों से धन जुटाया, निवेश किया और खर्च किया—उनके बीच घोर असंगतियां मौजूद थीं। विश्वविद्यालय द्वारा दावा किया गया था कि ट्रस्ट पूरी तरह “गैर-लाभकारी शैक्षणिक संस्था” है, लेकिन इसके खातों में दर्ज लेन-देन उस छवि से बिल्कुल उलट financial behaviour प्रदर्शित करते हैं। जांच में सामने आया है कि ट्रस्ट के प्रमुख लोगों ने नौ से ज़्यादा कंपनियों में डायरेक्टरशिप ली हुई है, जिनमें रियल एस्टेट, ऊर्जा, विदेश व्यापार, कंसल्टेंसी और सॉफ़्टवेयर तक के कारोबार शामिल हैं। इतनी विविधता वाले कारोबारी ढांचे ने ED की नजर में शक पैदा किया कि क्या ये कंपनियां वास्तव में कारोबार के लिए थीं या केवल “मनी राउटिंग” और “लेयरिंग” के लिए बनाई गई थीं। कई बैंक ट्रांज़ैक्शंस ऐसे थे जिनकी तिथि, राशि और क्रम शैक्षणिक संस्थान की प्रकृति से मेल नहीं खाते थे। ED को यह भी संदेह है कि इन कंपनियों का उपयोग “कथित निवेश” और “दान” के नाम पर बड़ी रकम को सफेद बनाने के लिए किया गया।

कई फैकल्टी और स्टाफ से पूछताछ जारी

यह मामला तब और गंभीर हो गया जब कुछ हफ्ते पहले दिल्ली के लाल किले के पास हुए कार ब्लास्ट की जांच के दौरान सुरक्षा एजेंसियों ने पाया कि एक संदिग्ध व्यक्ति की डिजिटल ट्रेल अल फलाह यूनिवर्सिटी के कैंपस से जुड़ती है। इस ब्लास्ट की जांच के दौरान एक कथित लॉजिस्टिक सपोर्ट मॉड्यूल का उल्लेख आया था, जिसकी गतिविधियों में विश्वविद्यालय से जुड़े कुछ लोगों की भूमिका की जांच की जा रही है। अभी तक कोई स्पष्ट आतंकी लिंक सामने नहीं आया है, लेकिन ED और NIA दोनों इस बात की तहकीकात कर रहे हैं कि क्या कुछ वित्तीय लेन–देन ऐसे ‘स्पॉन्सर नेटवर्कʼ का हिस्सा थे जो “इकोनॉमिक सपोर्ट” प्रदान करते हों। विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन आरोपों का खंडन किया है, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां इस कनेक्शन को हल्के में लेने को तैयार नहीं। पिछले दस दिनों में विश्वविद्यालय के कई कर्मचारियों, फैकल्टी सदस्यों और ट्रस्ट कर्मियों से गहन पूछताछ की जा चुकी है। इन पूछताछों में वित्तीय गतिविधियों, विदेशी यात्राओं, संदिग्ध ईमेल ट्रेल्स और कैंपस मीटिंग्स के बारे में कई सवाल शामिल थे।

डिजिटल डेटा, सर्वर इमेजिंग, नकदी और रियल एस्टेट डॉक्यूमेंट जब्त

ED द्वारा की गई छापेमारी सिर्फ़ पारंपरिक तलाशी नहीं थी। टीमों में डिजिटल फॉरेंसिक विशेषज्ञों को शामिल किया गया जिन्होंने विश्वविद्यालय और ट्रस्ट के सर्वर, लैपटॉप, हार्ड डिस्क और सीसीटीवी बैकअप की इमेजिंग की। कई जगहों से अनरजिस्टर्ड डिवाइस, पेन ड्राइव और हार्ड डिस्क मिलीं, जिनमें लाखों फाइलें हैं जिन्हें अब जांच एजेंसी डी-क्लासिफाई कर रही है। ED ने विश्वविद्यालय की भूमि खरीद से जुड़े दस्तावेज भी ज़ब्त किए हैं, जिनमें कुछ रजिस्ट्री ऐसे लोगों के नाम पर पाई गई है जो या तो मौजूद नहीं हैं या आर्थिक क्षमता के आधार पर इतनी बड़ी खरीददारी नहीं कर सकते। यह पैटर्न मनी लॉन्ड्रिंग मामलों में आमतौर पर पाए जाने वाले “बेनामी लेन-देन” का संकेत देता है। इसके अलावा, जांचकर्ताओं को शेल कंपनियों के कई ऐसे समझौते मिले हैं जो विश्वविद्यालय की आधिकारिक लेखा-पुस्तकों में दर्ज नहीं हैं।

मान्यता, डिग्री और संस्थागत विश्वसनीयता पर उठे सवाल

अल फलाह यूनिवर्सिटी में हजारों छात्र पढ़ते हैं, जिनमें मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट और अन्य व्यावसायिक कोर्स शामिल हैं। ED की कार्रवाई के बाद छात्रों और अभिभावकों के बीच यह चिंता गहरा गई है कि कहीं इसका असर संस्थागत मान्यताओं और डिग्रियों पर न पड़े। हालांकि UGC और NAAC ने इस मामले में अभी कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, लेकिन यह साफ है कि इतनी बड़ी कार्रवाई के बाद नियामक संस्थाओं को स्थिति की समीक्षा करनी ही पड़ेगी। शिक्षा क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि किसी भी यूनिवर्सिटी का मनी लॉन्ड्रिंग या टेरर मॉड्यूल से जुड़ा हुआ संदिग्ध लेन–देन सामने आना सिर्फ़ एक संस्था का नहीं बल्कि पूरे सेक्टर की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचाता है। इससे शैक्षणिक संस्थानों की विश्वसनीयता, निजी विश्वविद्यालयों की पारदर्शिता और छात्रों के करियर पर गहरा असर पड़ता है।

PMLA अदालत में पेशी, लंबी पूछताछ और संभावित सीज़र व अटैचमेंट की तैयारी

गिरफ्तारी के बाद जावेद अहमद सिद्दीकी को PMLA अदालत में पेश किया गया जहां ED उनकी कस्टडी की मांग कर रही है ताकि वित्तीय नेटवर्क की आगे की कड़ियों को खोला जा सके। जांच अधिकारियों का मानना है कि यह केवल शुरुआत है और आने वाले हफ्तों में बड़े स्तर पर संपत्ति जब्ती (Attachment), बैंक खातों पर रोक, और विदेशी लेन–देन की जांच शुरू की जा सकती है। ED अब इस केस को “education–sector laundering model” के उदाहरण के रूप में देख रही है, जिसके जरिए कई संस्थान लंबे समय से नियमों की आड़ में भारी लेन–देन कर रहे थे। अदालत यह भी देख रही है कि क्या इस केस में आतंक–फाइनेंसिंग का कोण जोड़ने की जरूरत पड़ेगी या नहीं।

शिक्षा और सुरक्षा के संगम में छुपे ‘अदृश्य नेटवर्क’ की खोज की शुरुआत

अल फलाह यूनिवर्सिटी के संस्थापक की गिरफ्तारी ने उस परत को भी उजागर किया है जो दिखाती है कि कैसे कुछ शिक्षण संस्थान शैक्षणिक परदे का उपयोग वित्तीय अनियमितताओं, गलत लेन-देन और संदिग्ध नेटवर्क छिपाने के लिए करते हैं। यह जांच अब सिर्फ़ सिद्दीकी तक सीमित नहीं रहेगी—यह पूरे उस मॉडल की पड़ताल करेगी जिसमें ट्रस्ट, कंपनियां, विदेशी लेन-देन, भूमि खरीद और शैक्षणिक फंडिंग एक जटिल नक्षत्र की तरह जुड़ी होती है। आने वाले दिनों में इस केस में कई हैरान करने वाले खुलासे होने की संभावना है, और ED इसे “राष्ट्रीय सुरक्षा और वित्तीय अपराधों के संगम” के रूप में देख रही है।

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