एसोसिएशन ऑफ़ इंडियन यूनिवर्सिटीज़ (AIU) द्वारा 13 नवंबर 2025 को अल फ़लाह यूनिवर्सिटी की सदस्यता निलंबित करने का फैसला एक ऐसे वक़्त में आया है जब दिल्ली के रेड फोर्ट के पास हुए कार ब्लास्ट की जांच ने राष्ट्रीय बहस का माहौल और गहरा कर दिया है। AIU ने यह कहते हुए विश्वविद्यालय की सदस्यता को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया कि संस्थान “अच्छी स्थिति में नहीं लग रहा है।” यहां सवाल यह है कि क्या किसी विश्वविद्यालय की ‘स्थिति’ का मूल्यांकन इतने सतही ढंग से किया जा सकता है? क्या कोई निर्णय केवल इस आधार पर लिया जा सकता है कि दो डॉक्टर—जिन्हें हाल ही में आतंकवादी गतिविधियों के आरोप में गिरफ्तार किया गया है—कभी इस विश्वविद्यालय से जुड़े थे? राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर उठाए गए कई कदम अक्सर संवैधानिक मूल्यों की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। AIU का यह कदम भी उसी जल्दबाज़ी और दबाव का प्रतीक लगता है जिसने भारतीय अकादमिक क्षेत्र को कई बार राजनीतिक परिस्थितियों का शिकार बनाया है।
घटना की समयरेखा पर नज़र डालें तो यह स्पष्ट होता है कि ब्लास्ट की जांच अभी शुरुआती चरण में है। गिरफ्तार किए गए व्यक्ति आरोपी हैं, दोषी नहीं। न अदालत का फैसला आया है, न जांच एजेंसियों की अंतिम रिपोर्ट। ऐसे में यह मान लेना कि उनके विश्वविद्यालय ने किसी प्रकार से “प्रोत्साहित” किया होगा या “संलिप्त” रहा होगा—कानूनी रूप से भी गलत है और नैतिक रूप से भी। लोकतंत्र का मूल सिद्धांत है: “जब तक दोष साबित न हो, व्यक्ति निर्दोष है”—लेकिन यहां आरोप लगते ही सज़ा दे दी गई। यह प्रवृत्ति न सिर्फ़ न्याय प्रक्रिया को कमजोर करती है बल्कि उच्च शिक्षा की स्वतंत्रता के लिए गहरा ख़तरा पैदा करती है। क्या किसी संस्थान को केवल इस वजह से दंडित किया जा सकता है कि उसके कुछ पूर्व छात्र किसी मामले में संदिग्ध हों? यह सवाल सिर्फ़ अल फ़लाह विश्वविद्यालय तक सीमित नहीं है बल्कि भारत के सभी शैक्षणिक संस्थानों की स्वायत्तता और गरिमा से जुड़ा है।
भारत में संस्थानों को आरोपी व्यक्ति के साथ जोड़कर त्वरित ‘दंडात्मक कार्रवाई’ करने की प्रवृत्ति नई नहीं है। जेएनयू, जामिया और कई अन्य विश्वविद्यालयों के खिलाफ़ वर्षों से इसी तरह के आरोपों का इस्तेमाल कर राजनीतिक हस्तक्षेप को जायज़ ठहराने की कोशिश की जाती रही है। अल फ़लाह का मामला भी उसी पैटर्न का हिस्सा लगता है जहां तथ्यों और न्यायिक प्रक्रिया से पहले, धारणा और दबाव काम करते दिखते हैं। AIU ने निलंबन आदेश में कहा कि विश्वविद्यालय अब “सदस्यता के लाभों” का उपयोग नहीं कर सकता। लेकिन यह नहीं बताया गया कि क्या संस्थान को अपना पक्ष रखने का अवसर दिया गया था। घटनाक्रम से स्पष्ट होता है कि जांच शुरू होने के कुछ ही दिनों में यह कार्रवाई हो गई, जो गंभीरता से अधिक जल्दबाज़ी का संकेत देती है। क्या AIU पर राष्ट्रीय अथवा राजनीतिक दबाव था? रेड फोर्ट ब्लास्ट जैसी घटना के बाद संस्थान अक्सर “तत्काल कार्रवाई” दिखाने की दौड़ में लग जाते हैं, लेकिन इस उत्साह में अक्सर निष्पक्षता और उचित प्रक्रिया कुर्बान हो जाती है।
विचार करने की बात यह है कि आज यदि अल फ़लाह यूनिवर्सिटी पर उसके पूर्व छात्रों के शक होने के आधार पर कार्रवाई होती है, तो कल यही पैमाना अन्य प्रतिष्ठित संस्थानों पर भी लागू होगा क्या? यदि कोई IIT, DU या JNU का पूर्व छात्र किसी अपराध में फंस जाए, तो क्या उन संस्थानों की मान्यता भी छीनी जाएगी? यदि किसी कंपनी का कर्मचारी किसी अवैध गतिविधि में शामिल हो, तो क्या कंपनी का लाइसेंस रद्द किया जाएगा? यह तर्क कितना खतरनाक है, इसका अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि इस तरह के निर्णय सामान्य हो जाएं तो देश में कोई भी संस्था—शैक्षणिक हो, सामाजिक हो या कॉर्पोरेट—पूर्वाग्रह और डर के बोझ तले दब जाएगी। शिक्षा संस्थान अपराध जांच एजेंसियां नहीं होते, न ही वे हर छात्र की पृष्ठभूमि की निगरानी कर सकते हैं। उनका उद्देश्य समाज को शिक्षित, सक्षम और जागरूक बनाना है। ऐसे में इस प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई संस्थागत स्वायत्तता और अकादमिक स्वतंत्रता पर गंभीर हमला है।
AIU का यह निर्णय एक खतरनाक संदेश देता है कि “आरोप लगते ही दंड शुरू हो जाएगा।” यह भीड़-न्याय की मानसिकता है, जिसमें आरोप ही सबूत बन जाते हैं और संस्थागत प्रक्रियाओं का महत्व समाप्त हो जाता है। और जब यह ध्यान में रखा जाए कि अल फ़लाह यूनिवर्सिटी एक मुस्लिम-बहुल संस्थान है, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह निर्णय कहीं न कहीं सामुदायिक पूर्वाग्रह से प्रभावित तो नहीं? भारत जैसे बहु-धार्मिक, बहु-सांस्कृतिक लोकतंत्र में इस तरह का निर्णय न सिर्फ़ शिक्षा की समावेशिता पर चोट करता है बल्कि एक समुदाय को अप्रत्यक्ष रूप से निशाना बनाए जाने की आशंका भी बढ़ाता है। राष्ट्रीय सुरक्षा महत्वपूर्ण है, लेकिन उसे न्याय, निष्पक्षता और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की कीमत पर नहीं खरीदा जा सकता।
इस समय सबसे अधिक जरूरत है गहन, निष्पक्ष और सबूत-आधारित जांच की। विश्वविद्यालयों को बिना सुनवाई के सज़ा देना न सिर्फ़ न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ़ है बल्कि यह एक खतरनाक मिसाल भी स्थापित करता है। अल फ़लाह का मामला अदालत में तय होगा—लेकिन AIU का यह जल्दबाज़ निर्णय भारतीय शिक्षा जगत, लोकतंत्र और न्याय प्रणाली की विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न छोड़ जाता है। यदि आज एक विश्वविद्यालय को केवल आरोपों के आधार पर दंडित किया जा सकता है, तो कल पूरा समाज इसी पूर्वाग्रह और संस्थागत भय के घेरे में होगा।





