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शर्तें थोप कर नहीं होते समझौते, बराबरी के बिना नहीं होगी डील : ईरान

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अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली/इस्लामाबाद/तेहरान | 12 अप्रैल 2026

इस्लामाबाद में अमेरिका और Iran के बीच हुई लंबी और बहुप्रतीक्षित वार्ता के विफल होने के बाद अब बयानबाज़ी का दौर और तेज हो गया है। पूर्व ईरानी विदेश मंत्री Mohammad Javad Zarif ने बेहद स्पष्ट और सख्त शब्दों में कहा है कि ईरान के साथ कोई भी समझौता “हमारी या आपकी शर्तों” पर नहीं हो सकता। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance इस्लामाबाद से बिना किसी समझौते के लौट चुके हैं और दोनों देशों के बीच बातचीत पूरी तरह ठप पड़ती नजर आ रही है। ज़रिफ का यह संदेश केवल एक प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि उस व्यापक सोच को दर्शाता है जिसमें ईरान खुद को किसी दबाव में झुकने के बजाय बराबरी की स्थिति में देखना चाहता है।

करीब 21 घंटे तक चली इस मैराथन वार्ता से उम्मीद थी कि यह मध्य पूर्व में चल रहे तनाव को कम करने की दिशा में एक बड़ा कदम साबित होगी, लेकिन अंत में नतीजा शून्य रहा। अमेरिकी पक्ष ने जहां साफ तौर पर अपनी शर्तें रखीं—खासकर ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर स्पष्ट प्रतिबद्धता—वहीं ईरान ने इन्हें “एकतरफा और अव्यावहारिक मांगें” बताया। इस टकराव ने बातचीत को उस मोड़ पर पहुंचा दिया जहां से आगे बढ़ने की कोई गुंजाइश नहीं बची। ज़रिफ का बयान इसी पृष्ठभूमि में आया है, जिसमें उन्होंने यह साफ कर दिया कि बातचीत तभी सफल हो सकती है जब दोनों पक्ष बराबरी और आपसी सम्मान के साथ आगे बढ़ें, न कि शर्तें थोपकर।

ज़रिफ ने अपने बयान में जिस “our/your terms” की बात कही, वह दरअसल कूटनीति के उस मूल सिद्धांत की ओर इशारा करता है जिसमें कोई भी समझौता तभी टिकाऊ होता है जब उसमें दोनों पक्षों की स्वीकार्यता हो। उनका कहना है कि यदि कोई एक पक्ष अपनी शर्तें थोपने की कोशिश करेगा, तो न केवल बातचीत विफल होगी बल्कि भविष्य में भी किसी समझौते की संभावना कमजोर पड़ जाएगी। यह बयान अप्रत्यक्ष रूप से अमेरिका की उस रणनीति पर भी सवाल खड़ा करता है जिसमें वह पहले अपनी शर्तें तय करता है और फिर दूसरे पक्ष से उन्हें स्वीकार करने की अपेक्षा रखता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच यह भी साफ हो गया है कि अमेरिका और ईरान के बीच असली लड़ाई केवल परमाणु कार्यक्रम या आर्थिक प्रतिबंधों की नहीं है, बल्कि भरोसे और संतुलन की है। ईरान पहले ही कह चुका है कि पिछले अनुभवों ने उसे सतर्क बना दिया है, और अब वह बिना ठोस गारंटी के किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं है। दूसरी ओर अमेरिका अपनी सुरक्षा चिंताओं और रणनीतिक हितों को लेकर पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहा। यही वजह है कि बातचीत बार-बार शुरू होने के बावजूद किसी ठोस नतीजे तक नहीं पहुंच पा रही।

इस्लामाबाद की वार्ता का टूटना केवल एक कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि उस गहरी खाई का प्रतीक है जो दोनों देशों के बीच वर्षों से बनी हुई है। ज़रिफ का बयान इस खाई को और स्पष्ट करता है—जहां एक तरफ दबाव की राजनीति है, वहीं दूसरी तरफ संप्रभुता और सम्मान का सवाल। अब पूरी दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या आने वाले दिनों में दोनों देश अपने रुख में नरमी लाते हैं या फिर यह गतिरोध एक बार फिर बड़े संघर्ष का कारण बनता है।

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