Home » National » इंदौर और गुजरात के बाद अब पलवल में 12 मौत, क्या साफ पानी भी “विश्वगुरु” के राज में “विलासिता” बन गया है?

इंदौर और गुजरात के बाद अब पलवल में 12 मौत, क्या साफ पानी भी “विश्वगुरु” के राज में “विलासिता” बन गया है?

Facebook
WhatsApp
X
Telegram

ओपिनियन | एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 16 फरवरी 2026

हरियाणा के पलवल जिले के छायंसा गांव में पिछले 15 दिनों में 12 लोगों की मौत — जिनमें 5 स्कूली बच्चे शामिल हैं — सिर्फ एक स्थानीय त्रासदी नहीं है। यह उस विकास मॉडल पर सवाल है, जिसमें विश्व मंच पर नेतृत्व की बातें तो खूब होती हैं, लेकिन गांव के नल से सुरक्षित पानी तक नहीं पहुंच पाता। लोग डरकर पानी उबाल रहे हैं, टैंकर का इंतजार कर रहे हैं, और कुछ परिवार अपने बच्चों की तस्वीरों के सामने बैठकर यह सोच रहे हैं कि आखिर गलती किसकी थी — उनकी या सिस्टम की?

स्वास्थ्य विभाग की प्रारंभिक जांच में 107 पानी के नमूनों में से 23 फेल पाए गए। बैक्टीरियल संक्रमण, क्लोरीन की कमी, हेपेटाइटिस जैसे मामलों की आशंका — ये सब संकेत हैं कि समस्या आकस्मिक नहीं, संरचनात्मक है। ग्रामीणों का कहना है कि बदबूदार और गंदे पानी की शिकायतें पहले भी की गई थीं। अगर निगरानी प्रणाली काम कर रही होती, तो क्या हालात यहां तक पहुंचते?

यह पहली घटना नहीं है। मध्य प्रदेश के इंदौर में हाल ही में दूषित पानी से कई मौतें हुईं। वहां भी सवाल उठे — पाइपलाइन में लीकेज था? सीवेज मिश्रण हुआ? क्लोरीनेशन सही नहीं हुआ? गुजरात के कई इलाकों से भी जहरीले पानी से लोगों के बीमार पड़ने की खबरें सामने आती रही हैं। हर बार प्रशासन जांच बैठाता है, हर बार बयान आता है — “स्थिति नियंत्रण में है।” लेकिन कब तक?

‘जल जीवन मिशन’ के तहत हर घर नल कनेक्शन देने का दावा किया गया है। आंकड़ों में प्रगति दिखती है। लेकिन आंकड़े जीवन नहीं बचाते — गुणवत्ता बचाती है। पाइपलाइन बिछा देना और पानी सुरक्षित रखना दो अलग बातें हैं। क्या हर जिले में नियमित और स्वतंत्र जल गुणवत्ता ऑडिट हो रहा है? क्या टेस्ट रिपोर्ट सार्वजनिक हैं? क्या ग्राम स्तर पर जिम्मेदारी तय है? या सब कुछ फाइलों में ‘संतोषजनक’ लिखकर आगे बढ़ जाता है?

समस्या केवल तकनीकी नहीं, प्राथमिकता की है। जब बजट घोषणाएं होती हैं, तो कनेक्शन संख्या बताई जाती है। लेकिन कितने घरों में पानी पीने योग्य है — यह सवाल कम पूछा जाता है। पलवल की 12 मौतें याद दिलाती हैं कि विकास का असली पैमाना हाईवे या डेटा सेंटर नहीं, बल्कि वह पानी है जो एक बच्चा बिना डर के पी सके।

राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाएंगे। कोई इसे राज्य की नाकामी बताएगा, कोई केंद्र की। लेकिन नागरिक के लिए इससे फर्क नहीं पड़ता कि जिम्मेदारी किसकी है — उसे सिर्फ साफ पानी चाहिए। जब इंदौर, गुजरात और अब पलवल जैसी घटनाएं बार-बार सामने आती हैं, तो यह ‘अपवाद’ नहीं रह जाता, यह पैटर्न बन जाता है।

सबसे तकलीफदेह सच यह है कि जिन परिवारों ने अपने बच्चों को खोया है, उनके लिए अब कोई योजना, कोई घोषणा मायने नहीं रखती। उनके लिए यह सवाल हमेशा रहेगा — क्या समय पर पानी की जांच होती, तो आज उनका बच्चा जिंदा होता?

भारत को सचमुच वैश्विक नेतृत्व की ओर बढ़ना है, तो सबसे पहले अपने गांवों के नल सुरक्षित करने होंगे। स्वच्छ पानी कोई राजनीतिक नारा नहीं, जीवन का न्यूनतम अधिकार है। जब तक यह अधिकार सुनिश्चित नहीं होता, तब तक विकास के दावे अधूरे रहेंगे। सवाल यह नहीं कि जांच होगी या नहीं। सवाल यह है कि क्या इस बार सुधार होगा — या अगली त्रासदी का इंतजार किया जाएगा?

0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest
0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments