एबीसी नेशनल न्यूज | नई दिल्ली | 15 फरवरी 2026
ट्रेड डील पर बयान से शुरू हुआ पूरा विवाद
फरवरी 2026 के दूसरे हफ्ते में लोकसभा का माहौल अचानक गरमा गया, जब कांग्रेस सांसद राहुल गांधी ने राष्ट्रपति के अभिभाषण पर बहस के दौरान भारत–अमेरिका अंतरिम ट्रेड डील को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार राष्ट्रीय हितों से समझौता कर रही है और किसानों व छोटे उद्योगों को जोखिम में डाल रही है। उनके भाषण के कुछ हिस्से बाद में कार्यवाही से हटा दिए गए, जिसे संसदीय भाषा में “एक्सपंज” कहा जाता है। यही वह बिंदु था, जहां से मामला सिर्फ बहस तक सीमित नहीं रहा, बल्कि प्रक्रिया और विशेषाधिकारों की चर्चा तक पहुंच गया।
प्रिविलेज मोशन की चर्चा और अचानक बदला रुख
राहुल गांधी के भाषण के बाद संसदीय मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने संकेत दिया कि सरकार उनके खिलाफ प्रिविलेज मोशन ला सकती है। प्रिविलेज मोशन आमतौर पर तब लाया जाता है जब माना जाए कि किसी सदस्य ने सदन को गुमराह किया है या उसकी गरिमा का उल्लंघन किया है। लेकिन कुछ ही दिनों में घटनाक्रम ने नया मोड़ लिया। बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने राहुल गांधी के खिलाफ सब्सटेंटिव मोशन का नोटिस दे दिया। इस नोटिस में गंभीर आरोप लगाए गए और उनकी लोकसभा सदस्यता रद्द करने तक की मांग की गई। इसके बाद सरकार ने स्पष्ट किया कि अलग से प्रिविलेज मोशन नहीं लाया जाएगा और दुबे के प्रस्ताव पर ही आगे की प्रक्रिया होगी।
प्रिविलेज मोशन क्या है — और इसमें प्रक्रिया कैसे चलती है
प्रिविलेज मोशन एक ऐसी संसदीय प्रक्रिया है, जिसमें सदन या उसके किसी सदस्य के विशेषाधिकार के उल्लंघन की जांच की जाती है। यदि स्पीकर इसे स्वीकार कर लेते हैं, तो मामला प्रिविलेज कमिटी को भेजा जाता है। यह कमिटी पूरे मामले की जांच करती है, संबंधित सदस्य को अपना पक्ष रखने का मौका देती है और फिर अपनी रिपोर्ट सदन में पेश करती है। इसके बाद चर्चा और मतदान होता है। आम तौर पर इसके परिणामस्वरूप फटकार, निंदा या सीमित अवधि का निलंबन हो सकता है। सदस्यता रद्द करना इस प्रक्रिया में दुर्लभ माना जाता है।
सब्सटेंटिव मोशन क्यों ज्यादा गंभीर माना जा रहा है
सब्सटेंटिव मोशन एक स्वतंत्र प्रस्ताव होता है, जिसके जरिए सदन सीधे कोई ठोस निर्णय ले सकता है—जैसे निंदा, निष्कासन या सदस्यता समाप्त करना। इसमें लंबी कमिटी जांच की अनिवार्यता नहीं होती, और यदि स्पीकर इसे स्वीकार कर लें तो सीधे सदन में बहस और वोटिंग हो सकती है। यही कारण है कि राजनीतिक गलियारों में इसे अधिक गंभीर कदम माना जा रहा है। क्योंकि अंततः फैसला सदन के बहुमत से होगा, और मौजूदा लोकसभा में सरकार के पास स्पष्ट बहुमत है।
क्या यह रणनीतिक कदम है या सामान्य संसदीय प्रक्रिया?
संसदीय हलकों में यह चर्चा भी है कि प्रिविलेज मोशन की जगह सब्सटेंटिव मोशन चुनना एक रणनीतिक फैसला हो सकता है। प्रिविलेज कमिटी की प्रक्रिया अपेक्षाकृत लंबी और विस्तृत होती है, जिसमें आरोपी सदस्य को विस्तार से अपनी बात रखने का अवसर मिलता है। जबकि सब्सटेंटिव मोशन के जरिए सरकार सीधे सदन में बहस और मतदान की ओर बढ़ सकती है। हालांकि सरकार की ओर से इसे पूरी तरह संसदीय प्रक्रिया का हिस्सा बताया गया है।
राहुल गांधी और कांग्रेस का पक्ष
राहुल गांधी ने इन आरोपों को सिरे से खारिज किया है। उनका कहना है कि उन्होंने सदन में जो कहा, वह देशहित और किसानों के हित में कहा। कांग्रेस ने इसे विपक्ष की आवाज दबाने की कोशिश बताया है और कहा है कि लोकतंत्र में सवाल पूछना अपराध नहीं हो सकता। पार्टी का तर्क है कि यदि सरकार के पास जवाब हैं, तो उन्हें संसद में दिए जाने चाहिए, न कि प्रक्रिया के जरिए विपक्ष को दबाया जाना चाहिए।
अब सबकी नजर स्पीकर के फैसले पर
इस पूरे मामले में अगला और सबसे अहम कदम लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला का होगा। वे तय करेंगे कि सब्सटेंटिव मोशन को स्वीकार किया जाए या नहीं, और यदि किया जाए तो आगे की प्रक्रिया क्या होगी। सदस्यता रद्द करने जैसा कदम आसान नहीं होता और इसके लिए ठोस आधार और बहुमत दोनों की जरूरत होती है। फिलहाल मामला प्रक्रियागत चरण में है, लेकिन यह स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में संसद के भीतर और बाहर यह मुद्दा राजनीतिक बहस का केंद्र बना रहेगा।
यह मामला केवल एक सदस्य या एक भाषण का नहीं, बल्कि संसद की कार्यप्रणाली, विपक्ष की भूमिका और लोकतांत्रिक परंपराओं की कसौटी का भी है। आगे क्या होता है, यह तय करेगा कि यह विवाद इतिहास में एक सामान्य संसदीय टकराव के रूप में दर्ज होगा या एक बड़े राजनीतिक मोड़ के रूप में।




