इंशा रहमान, स्टूडेंट ऑफ लॉ एंड पॉलिटिक्स
26 अक्टूबर 2025
यह कहानी इतिहास के उन पन्नों से निकलती है, जहाँ वीरता, विश्वासघात और मानवीय स्वभाव की जटिलताएँ एक-दूसरे से टकराती हैं। यह केवल युद्धों या विद्रोहों की कहानी नहीं है, उन आदमियों और औरतों की कथा है जिन्होंने अपने समय की अन्यायपूर्ण व्यवस्थाओं को चुनौती दी — और बदले में कभी सम्मान पाया, तो कभी उपेक्षा और धोखा भी झेला।
चे ग्वेरा, जिन्होंने लैटिन अमेरिका की धरती पर क्रांति की मशाल जलाई, और मोहम्मद करीम, जिन्होंने उपनिवेशवाद के खिलाफ अपने लोगों को जगाने की कोशिश की — दोनों ने अपने आदर्शों के लिए जीवन न्योछावर कर दिया। लेकिन अंत में वही जनता, जिसके लिए वे लड़े थे, उनके बलिदान की कीमत समझ नहीं सकी। यही विडंबना भारतीय इतिहास में भी झलकती है — जब मंगल पांडे की गोली ने विद्रोह की आग लगाई, रानी लक्ष्मीबाई ने तलवार उठाई, नाना साहब ने लड़ाई का बिगुल फूंका, और बहादुर शाह ज़फर ने पूरे हिंदुस्तान को एकता की पुकार दी — तब भी कई अपने ही लोग या तो मौन रहे या अंग्रेजों के साथ जा खड़े हुए।
यह कहानी हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि इतिहास के नायक केवल अपने दुश्मनों से नहीं, बल्कि अपने ही समाज की उदासीनता और विभाजन से भी लड़ते हैं। उनके साहस में वह पीड़ा छिपी है, जो तब जन्म लेती है जब जनता अपने ही उद्धारकों से मुँह मोड़ लेती है। इसीलिए, चे ग्वेरा से लेकर बहादुर शाह ज़फर तक — इन सभी की कहानियाँ हमें यह सिखाती हैं कि आज़ादी का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मिक जागृति और सामूहिक जिम्मेदारी भी है।
चे ग्वेरा और चरवाहे का विश्वासघात
1967 में, बोलीविया के जंगलों में चे ग्वेरा अपनी अंतिम लड़ाई लड़ रहे थे। उनकी गुरिल्ला सेना, जो सरकार के खिलाफ विद्रोह कर रही थी, भुखमरी और थकान से जूझ रही थी। चे, जो क्यूबा की क्रांति के नायक थे, अब बोलीविया में एक नई क्रांति की आग जलाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन स्थानीय किसानों और चरवाहों का समर्थन उनके लिए उतना मजबूत नहीं था, जितना उन्होंने उम्मीद की थी।
एक रात, ला हिगुएरा के पास एक चरवाहे ने उनकी मौजूदगी की सूचना बोलीवियाई सेना को दे दी। यह चरवाहा, जिसके पास न तो कोई वैचारिक निष्ठा थी और न ही क्रांति की समझ, केवल अपनी रोज़मर्रा की ज़िंदगी की चिंता में था। जब सैनिकों ने चे को घेर लिया और उसे पकड़ लिया, तो एक सैनिक ने उस चरवाहे से पूछा, “तुमने उस व्यक्ति को कैसे धोखा दे दिया, जिसने अपनी पूरी ज़िंदगी तुम्हारे और तुम्हारे अधिकारों की रक्षा के लिए संघर्ष किया?”
चरवाहे का जवाब उतना ही सरल था, जितना कि क्रूर: “उसकी दुश्मन से लड़ाई ने मेरी भेड़ों को डरा दिया!” यह जवाब चे के लिए एक तमाचे की तरह था। वह व्यक्ति, जिसने साम्राज्यवाद और पूँजीवाद के खिलाफ वैश्विक लड़ाई लड़ी, एक साधारण चरवाहे की छोटी-सी दुनिया के सामने हार गया।
चे को 9 अक्टूबर, 1967 को ला हिगुएरा में मार दिया गया। उनकी मृत्यु ने उन्हें एक शहीद और वैश्विक प्रतीक बना दिया, लेकिन उस चरवाहे की कहानी हमें यह सिखाती है कि क्रांति की आग में कई बार वे लोग भी जल जाते हैं, जो केवल अपनी छोटी-सी दुनिया को बचाने की कोशिश कर रहे होते हैं।
मोहम्मद करीम और मिस्र की लड़ाई
1798 में, जब नेपोलियन बोनापार्ट ने मिस्र पर आक्रमण किया, तो मोहम्मद करीम, एक साधारण मिस्री सेनानायक, ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए एक अनपेक्षित प्रतिरोध खड़ा किया। नेपोलियन की सेना, जो उस समय यूरोप की सबसे शक्तिशाली सेनाओं में से एक थी, ने मिस्र को अपने साम्राज्य का हिस्सा बनाने की योजना बनाई थी। लेकिन करीम, जो अलेक्ज़ेंड्रिया के एक साधारण नेता थे, ने स्थानीय लोगों को संगठित कर फ्रांसीसी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया।
उनके नेतृत्व में मिस्र की जनता ने कई छोटी-छोटी लड़ाइयों में फ्रांसीसियों को भारी नुकसान पहुँचाया। लेकिन 1799 में, करीम को धोखे से पकड़ लिया गया। जब उन्हें नेपोलियन के सामने लाया गया, तो फ्रांसीसी जनरल ने उनकी वीरता की प्रशंसा की, लेकिन साथ ही एक प्रस्ताव रखा: “मैं तुम्हें मृत्युदंड से बचा सकता हूँ, बशर्ते तुम मेरी सेना को हुए नुकसान की भरपाई के लिए दस हज़ार स्वर्ण मुद्राएँ दे दो।”
करीम, जिनके पास इतना धन कभी था ही नहीं, ने हँसते हुए जवाब दिया, “मेरे पास तो स्वर्ण मुद्राएँ नहीं, लेकिन हाँ, अलेक्ज़ेंड्रिया के व्यापारियों पर मेरा सौ हज़ार से अधिक स्वर्ण मुद्राओं का कर्ज़ ज़रूर है।” यह जवाब सुनकर नेपोलियन ने उन्हें कुछ समय दिया, यह सोचकर कि शायद मिस्र की जनता अपने नायक को बचाने के लिए आगे आएगी।
करीम को बेड़ियों में जकड़ा गया और अलेक्ज़ेंड्रिया के बाज़ार में ले जाया गया। वहाँ, जहाँ उन्होंने अपनी ज़िंदगी दाँव पर लगाकर लोगों की आज़ादी के लिए लड़ाई लड़ी थी, उन्होंने उम्मीद की कि व्यापारी और आम लोग उनकी मदद करेंगे। लेकिन इसके उलट, व्यापारियों ने उन पर इल्ज़ाम लगाए। उन्होंने कहा कि करीम की लड़ाई ने अलेक्ज़ेंड्रिया में तबाही मचाई, व्यापार ठप्प हुआ, और उनकी आर्थिक स्थिति खराब हो गई। कोई भी आगे नहीं आया।
निराश और टूटे मन से करीम नेपोलियन के पास लौटे। नेपोलियन ने उनसे कहा, “मैं तुम्हें इसलिए नहीं मार रहा कि तुमने मेरे खिलाफ लड़ाई लड़ी। मैं तुम्हें इसलिए मार रहा हूँ क्योंकि तुमने उन लोगों के लिए अपनी ज़िंदगी कुर्बान की, जो स्वतंत्रता से ज्यादा अपने व्यापार को महत्व देते हैं।” इसके बाद, करीम को मृत्युदंड दे दिया गया।
और इतिहास की गूँज
इन दोनों कहानियों को जोड़ने वाली एक और ऐतिहासिक घटना है भारत की 1857 की क्रांति, जिसे प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी कहा जाता है। इस क्रांति में मंगल पांडे, रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहब और बहादुर शाह ज़फर जैसे नायकों ने अंग्रेजी शासन के खिलाफ विद्रोह किया। लेकिन कई बार, उनके अपने लोग—चाहे वह स्थानीय जमींदार हों, व्यापारी हों, या आम जनता—उनके साथ खड़े नहीं हुए। कुछ ने तो अंग्रेजों का साथ दिया, क्योंकि उनकी लड़ाई ने उनकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को प्रभावित किया था।
मंगल पांडे: विद्रोह की पहली चिंगारी
1857 की क्रांति की शुरुआत जिस व्यक्ति से मानी जाती है, वह थे मंगल पांडे — एक साधारण सैनिक, पर असाधारण साहस का प्रतीक। 29 मार्च 1857 को बैरकपुर छावनी में, उन्होंने अंग्रेजी शासन के खिलाफ वह पहली गोली चलाई जिसने पूरे भारत में विद्रोह की आग भड़का दी। कारतूसों में गाय और सूअर की चर्बी की अफ़वाह से भड़के हिंदू और मुस्लिम सिपाहियों के बीच मंगल पांडे का नाम एक प्रतीक बन गया — गुलामी के खिलाफ पहला विद्रोही। हालांकि अंग्रेजों ने उन्हें पकड़कर फांसी दे दी, लेकिन उनकी शहादत ने पूरे देश में स्वतंत्रता की ज्वाला जला दी। मंगल पांडे का विद्रोह एक सैनिक विद्रोह नहीं था, बल्कि एक राष्ट्र के जागरण की पहली पुकार थी।
रानी लक्ष्मीबाई: झांसी की वीरांगना
झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का नाम आज भी साहस, नेतृत्व और अदम्य देशभक्ति के प्रतीक के रूप में लिया जाता है। जब अंग्रेजों ने “डॉक्ट्रिन ऑफ लैप्स” के तहत झांसी को हड़पने की कोशिश की, तो रानी ने कहा था — “मैं अपनी झांसी नहीं दूँगी।” तलवार और घोड़े के साथ उन्होंने न केवल अपने राज्य की रक्षा की, बल्कि देश की अस्मिता की लड़ाई भी लड़ी। 1857 की क्रांति के दौरान झांसी उनके नेतृत्व में एक किला बन गया था, जहाँ से उन्होंने अंग्रेजी सेनाओं को कई बार पीछे हटने पर मजबूर किया। ग्वालियर की लड़ाई में उन्होंने दुश्मनों से घिरी होने के बावजूद आखिरी सांस तक संघर्ष किया। लक्ष्मीबाई ने साबित किया कि स्वतंत्रता स्त्री और पुरुष दोनों की साझा जिम्मेदारी है।
नाना साहब का विद्रोह और विश्वासघात की पीड़ा
1857 की क्रांति का एक और महत्वपूर्ण अध्याय कानपुर का विद्रोह था, जिसका नेतृत्व नाना साहब पेशवा ने किया। अंग्रेजों ने जब उनके पिता बाजीराव द्वितीय की पेंशन रोक दी और उत्तराधिकार का अधिकार छीन लिया, तो नाना साहब के मन में अंग्रेजी अन्याय के खिलाफ आग भड़क उठी। कानपुर में उन्होंने सैनिकों और जनता को एकजुट कर अंग्रेजों के खिलाफ ऐतिहासिक लड़ाई छेड़ी। कुछ समय के लिए कानपुर विद्रोहियों के नियंत्रण में रहा, लेकिन अंग्रेजों ने जल्द ही पुनः हमला कर शहर पर कब्ज़ा कर लिया। तब कई स्थानीय लोगों ने भय या स्वार्थवश अंग्रेजों का साथ देते हुए नाना साहब और उनके साथियों के खिलाफ गवाही दी, यह कहते हुए कि उनकी लड़ाई ने शहर में अराजकता फैलाई थी। यह विश्वासघात नाना साहब के लिए गहरा आघात था — यह केवल एक युद्ध की हार नहीं थी, बल्कि उस एकता की भी हार थी जो भारत को स्वतंत्रता दिला सकती थी। नाना साहब का संघर्ष इस बात की याद दिलाता है कि गुलामी से मुक्ति केवल हथियारों से नहीं, बल्कि एकजुट विश्वास और निष्ठा से मिलती है।
बहादुर शाह ज़फर: अंतिम मुगल और पहला प्रतीक सम्राट
दिल्ली के बुजुर्ग बादशाह बहादुर शाह ज़फर 1857 की क्रांति के औपचारिक नेता बने। हालांकि वे उम्रदराज़ और राजनीति से दूर रहना चाहते थे, पर जब विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुँचे, तो उन्होंने उन्हें “हिंदुस्तान का सम्राट” घोषित कर दिया। उनके नेतृत्व में दिल्ली विद्रोह का केंद्र बनी। हिंदू-मुस्लिम एकता की मिसाल देते हुए ज़फर ने एक साझा झंडे तले अंग्रेजों के खिलाफ जंग की घोषणा की। परंतु, यह सपना अधिक समय तक न टिक सका। जब अंग्रेजों ने दिल्ली पर कब्जा किया, तो बहादुर शाह ज़फर को गिरफ्तार कर लिया गया, उनके बेटों की हत्या कर दी गई, और उन्हें रंगून निर्वासित कर दिया गया — जहाँ 1862 में उन्होंने आखिरी सांस ली। उन्होंने कहा था —
“कितना बदनसीब है ज़फर, दफ़्न के लिए दो गज ज़मीन भी न मिली कुए-यार में।”
1857 की क्रांति: जुड़ी हुई चार कहानियां, एक सपना
इन तीनों की कहानियाँ — मंगल पांडे की चिंगारी, रानी लक्ष्मीबाई की तलवार, और बहादुर शाह ज़फर की एकता की पुकार — भारत के पहले स्वतंत्रता संग्राम का सार हैं। यह आंदोलन केवल एक बगावत नहीं था, बल्कि एक साझा सपना था — गुलामी से मुक्ति का, स्वराज का, आत्मसम्मान का। दुर्भाग्य से, इस क्रांति को वह जनसमर्थन नहीं मिला जिसकी उसे आवश्यकता थी। कुछ भारतीयों ने अंग्रेजों का साथ दिया, कुछ डर से, कुछ स्वार्थ से, और कुछ इस भ्रम में कि यह विद्रोह उनकी रोजमर्रा की जिंदगी को तबाह कर देगा। फिर भी, 1857 की यह क्रांति आने वाले सभी स्वतंत्रता आंदोलनों की मूल प्रेरणा बन गई। इन वीरों की विरासत हमें यह याद दिलाती है कि आज़ादी का अर्थ केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्मगौरव और एकता भी है — और यही संदेश 1857 की क्रांति ने भारत की आत्मा में हमेशा के लिए अंकित कर दिया।
मोहम्मद राशिद रिदा का दर्शन
मोहम्मद राशिद रिदा, एक प्रमुख इस्लामी विचारक, ने इन घटनाओं को देखकर एक गहरा दर्शन व्यक्त किया: “जो किसी अज्ञानी जनता के लिए लड़ता है, वह उस व्यक्ति के समान है जो अंधों के रास्ते को रोशन करने के लिए खुद को आग में झोंक देता है।” यह कथन चे ग्वेरा, मोहम्मद करीम, और मंगल पांडे जैसे नायकों की कहानियों को जोड़ता है। ये सभी अपने समय के वीर थे, जिन्होंने अपने लोगों के लिए सब कुछ त्याग दिया, लेकिन कई बार उनकी जनता उनकी कीमत को समझ नहीं पाई।
इतिहास हमें बार-बार सिखाता है कि वीरता और बलिदान हमेशा सराहे नहीं जाते। चे ग्वेरा की भेड़ों को डराने वाली क्रांति, मोहम्मद करीम का व्यापारियों द्वारा ठुकराया जाना, और 1857 के विद्रोहियों का अपने ही लोगों द्वारा विश्वासघात—ये सभी कहानियाँ एक ही सत्य को उजागर करती हैं: स्वतंत्रता और न्याय की लड़ाई में, नायक अक्सर अकेले खड़े होते हैं। लेकिन उनकी कहानियाँ, उनके बलिदान, और उनकी हार हमें यह सिखाते हैं कि सच्चाई और न्याय के लिए लड़ना, भले ही उसका तात्कालिक परिणाम न मिले, अपने आप में एक विजय है।




