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साधारण दर्द की दवा, कैंसर के खिलाफ ढाल? समझ ने बढ़ाई उम्मीद—लेकिन खतरे भी कम नहीं

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स्वास्थ्य/ साइंस | ABC NATIONAL NEWS | लंदन | 21 अप्रैल 2026

दर्द, बुखार या हल्की सूजन में इस्तेमाल होने वाली आम दवा Aspirin अब एक बार फिर चर्चा में है। वजह है—कैंसर के खतरे को कम करने से जुड़ी नई रिसर्च। वर्षों से वैज्ञानिक इस सवाल का जवाब खोज रहे थे कि क्या सच में एस्पिरिन कैंसर से बचा सकती है। अब सामने आई नई स्टडीज़ ने इस दिशा में कुछ अहम संकेत दिए हैं, लेकिन साथ ही यह भी साफ कर दिया है कि मामला उतना आसान नहीं है जितना पहले समझा जा रहा था।

दरअसल, पहले कई शोधों में यह संकेत मिला था कि लंबे समय तक एस्पिरिन लेने से खासकर कोलोरेक्टल कैंसर यानी आंत के कैंसर का खतरा कम हो सकता है। कुछ रिपोर्ट्स के मुताबिक, इसका असर तुरंत नहीं बल्कि 10 से 20 साल बाद दिखाई देता है। यही वजह है कि डॉक्टर इसे “धीमी लेकिन संभावित सुरक्षा” देने वाली दवा मानते रहे हैं। लेकिन अब वैज्ञानिक इस बात को गहराई से समझने लगे हैं कि आखिर यह दवा शरीर में ऐसा क्या करती है जिससे कैंसर पर असर पड़ता है।

नई रिसर्च के मुताबिक, एस्पिरिन सिर्फ दर्द कम करने का काम नहीं करती, बल्कि यह शरीर की इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी प्रभावित करती है। खासतौर पर यह खून में मौजूद प्लेटलेट्स के जरिए होने वाली एक ऐसी प्रक्रिया को रोकती है, जो कैंसर को फैलने में मदद कर सकती है। वैज्ञानिकों ने पाया कि एस्पिरिन एक खास केमिकल—थ्रॉम्बॉक्सेन A2—को कम करती है, जो आमतौर पर टी-सेल्स को दबा देता है। जब यह दबाव कम होता है, तो टी-सेल्स ज्यादा सक्रिय होकर कैंसर कोशिकाओं पर हमला कर पाते हैं।

आसान भाषा में कहें तो एस्पिरिन शरीर की “रक्षा सेना” को मजबूत करने में मदद कर सकती है, जिससे कैंसर के फैलने की रफ्तार धीमी पड़ सकती है। यही वजह है कि कुछ वैज्ञानिक अब इसे कैंसर के खिलाफ एक संभावित “इम्यून बूस्टर” के तौर पर भी देखने लगे हैं। इसके अलावा, एस्पिरिन शरीर में सूजन को कम करती है, और लंबे समय तक रहने वाली सूजन को कई तरह के कैंसर की जड़ माना जाता है।

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी उतना ही अहम है। हाल की कुछ बड़ी स्टडीज़ ने यह दिखाया है कि हर किसी के लिए एस्पिरिन फायदेमंद नहीं है। खासकर 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में इसका असर उल्टा भी पड़ सकता है। एक अध्ययन में पाया गया कि बुजुर्गों में रोजाना एस्पिरिन लेने से कैंसर का खतरा कम नहीं हुआ, बल्कि कुछ मामलों में कैंसर से मौत का जोखिम बढ़ गया।

इसी तरह, कई विशेषज्ञों का कहना है कि अगर एस्पिरिन का फायदा होता भी है, तो वह बहुत लंबे समय बाद दिखता है—और तब तक इसके नुकसान सामने आ सकते हैं। जैसे पेट में खून बहना, स्ट्रोक का खतरा या अन्य गंभीर साइड इफेक्ट्स। इसलिए डॉक्टर साफ तौर पर कहते हैं कि इसे हर किसी के लिए कैंसर से बचाव की दवा मानना गलत होगा।

कुछ खास मामलों में जरूर इसके फायदे ज्यादा स्पष्ट दिखाई देते हैं। उदाहरण के तौर पर, जिन लोगों में Lynch syndrome जैसी जेनेटिक समस्या होती है, उनमें एस्पिरिन लेने से आंत के कैंसर का खतरा कम पाया गया है। इसके अलावा, जिन लोगों की जीवनशैली जोखिम भरी होती है—जैसे धूम्रपान, खराब खानपान या मोटापा—उनमें भी कुछ अध्ययन इसके संभावित लाभ की ओर इशारा करते हैं।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या आम आदमी को रोज एस्पिरिन लेनी चाहिए? इसका सीधा जवाब है—नहीं, बिना डॉक्टर की सलाह के बिल्कुल नहीं। क्योंकि यह दवा जितनी आसानी से मिल जाती है, उतनी ही आसानी से नुकसान भी पहुंचा सकती है। हर व्यक्ति की उम्र, स्वास्थ्य स्थिति और जोखिम अलग-अलग होते हैं, इसलिए इसका इस्तेमाल भी सोच-समझकर ही होना चाहिए।

एस्पिरिन को लेकर तस्वीर अब पहले से ज्यादा साफ जरूर हुई है, लेकिन पूरी तरह साफ नहीं। यह दवा कैंसर के खिलाफ एक संभावित हथियार हो सकती है, खासकर शरीर की इम्यून सिस्टम को मजबूत करने के जरिए। लेकिन इसे कोई जादुई इलाज मान लेना बड़ी भूल होगी। सही समय, सही व्यक्ति और सही मात्रा—यही तय करेगा कि यह दवा आपके लिए फायदेमंद है या नुकसानदायक।

इसलिए अगर आप यह सोच रहे हैं कि एक छोटी सी गोली आपको कैंसर से बचा सकती है, तो थोड़ा ठहरिए—और सबसे पहले अपने डॉक्टर से सलाह जरूर लीजिए।

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