आलोक कुमार । नई दिल्ली 30 नवंबर 2025
सुनवाई ने बदल दिया पूरा परिदृश्य: साधारण बहस से संवैधानिक विमर्श तक
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) का मामला 27 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में सिर्फ एक प्रशासनिक प्रक्रिया का विवाद नहीं रह गया, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र, नागरिकता और चुनाव आयोग की शक्तियों की सीमा पर उठे गहरे प्रश्नों में बदल गया। सुनवाई की शुरुआत सामान्य तथ्यों और तकनीकी पहलुओं से हुई थी, लेकिन जैसे ही वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी खड़े हुए, अदालत में चर्चा का स्तर बदलकर एक गंभीर संवैधानिक विमर्श में तब्दील हो गया। उनके 53 मिनट के तर्कों ने न सिर्फ बेंच का ध्यान खींचा बल्कि समीकरण ही बदल दिए। जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉय मालिया बागची दोनों को तुरंत प्रतिक्रिया देने में कठिनाई हुई और वे आपस में लगातार विचार-विमर्श करते दिखे। यह संकेत था कि मामला सामान्य नहीं, गहरे संवैधानिक सवालों से भरा है।
चुनाव आयोग की ‘सर्वशक्तिमान’ छवि पर सीधा वार: क्या ECI ने अपनी सीमाएँ लांघीं?
सिंघवी की दलीलों का केंद्र यही था कि चुनाव आयोग (ECI) ने अपने संवैधानिक अधिकारों का गंभीर अतिक्रमण किया है। उन्होंने बताया कि जनप्रतिनिधित्व कानून (ROPA) के अनुसार चुनाव आयोग का अधिकार किसी एक निर्वाचन क्षेत्र तक सीमित है, जहाँ वह मतदाता सूची में सुधार कर सकता है। लेकिन SIR प्रक्रिया के नाम पर आयोग ने पूरे देश में एक साथ व्यापक संशोधन शुरू कर दिया, जिसके लिए उसे किसी भी कानून ने कोई शक्ति नहीं दी है। यह तर्क इतना ठोस था कि उसने पूरे विवाद को एक नई दिशा दे दी—अब बहस यह नहीं है कि SIR की प्रक्रिया सही थी या नहीं, बल्कि यह है कि क्या चुनाव आयोग को यह प्रक्रिया शुरू करने का अधिकार ही था?
नागरिकता संसद का विषय है, आयोग का नहीं: सिंघवी का संवैधानिक आधार
एक और महत्वपूर्ण संवैधानिक पहलू जो सिंघवी ने उठाया, वह यह कि नागरिकता का निर्धारण पूरी तरह संसद के अधिकार क्षेत्र में आता है। भारत में नागरिकता से जुड़े सभी कानून—जैसे Citizenship Act और Foreigners Act—संसद द्वारा बनाए गए हैं। ऐसे में चुनाव आयोग जैसी प्रशासनिक संस्था नागरिकता तय करने का अधिकार अपने हाथ में नहीं ले सकती। SIR प्रक्रिया के तहत नागरिकता के सबूत माँगना, दस्तावेज़ मांगना या मतदाता की पात्रता को नागरिकता से जोड़ना न केवल असंवैधानिक है बल्कि संवैधानिक संतुलन को बिगाड़ने वाला कदम है। इस दलील ने SIR प्रक्रिया की बुनियादी वैधता पर और गहरे सवाल खड़े कर दिए।
‘माता-पिता के दस्तावेज़’ वाला मानवीय सवाल: क्या यही न्याय है?
सुनवाई का सबसे मानवीय, संवेदनशील और ज़मीन से जुड़ा तर्क तब आया जब सिंघवी ने पूछा—क्या एक आम नागरिक सिर्फ इसलिए मतदाता सूची से बाहर कर दिया जाएगा कि वह अपने माता–पिता के दस्तावेज़ दिखाने में असमर्थ है? उन्होंने बताया कि भारत की सामाजिक–आर्थिक वास्तविकता ऐसी है कि लाखों लोगों—खासकर वंचित, ग्रामीण, मजदूर, प्रवासी और अल्पसंख्यक तबकों—के पास ऐसे दस्तावेज़ उपलब्ध ही नहीं होते। फिर इस आधार पर किसी का नाम मतदाता सूची से हटाना न्याय के सिद्धांतों, लोकतंत्र और मानवाधिकारों की पूरी अवधारणा के खिलाफ है। यह तर्क अदालत को सोचने पर मजबूर करने वाला था, और इसने SIR प्रक्रिया को मानवीय संवेदना के नजरिए से भी संदेह के घेरे में ला दिया।
2003 के पहले–बाद में मतदाताओं के लिए अलग नियम: अनुच्छेद 14 का स्पष्ट उल्लंघन
सिंघवी ने चुनाव आयोग द्वारा मतदाताओं को दो श्रेणियों में बांटने पर भी कड़ा सवाल उठाया—
एक वर्ग: 2003 से पहले मतदाता सूची में शामिल लोग
दूसरा वर्ग: 2003 के बाद शामिल लोग
इन दोनों समूहों से अलग-अलग दस्तावेज़ माँगे जा रहे थे। यह स्पष्ट भेदभाव है और संविधान के अनुच्छेद 14—समानता के अधिकार—का प्रत्यक्ष उल्लंघन है। बिना किसी तार्किक आधार के दो नागरिकों के लिए अलग नियम बनाना मनमाना वर्गीकरण माना जाता है, जिसे अदालतें बार-बार खारिज कर चुकी हैं। इस तर्क ने SIR प्रक्रिया की भेदभावपूर्ण प्रकृति को उजागर कर दिया।
पहले से मौजूद कानूनी तंत्र को दरकिनार क्यों किया? Form-7 पर सिंघवी का जोर
जनप्रतिनिधित्व कानून में पहले से ही Form-7 का स्पष्ट प्रावधान मौजूद है जिसके तहत नाम जोड़ने, हटाने या आपत्ति दर्ज करने की कानूनी प्रक्रिया निर्धारित है। यह प्रक्रिया वर्षों से लागू है और इसे संवैधानिक वैधता भी प्राप्त है। ऐसे में जब एक प्रभावी कानूनी तंत्र पहले से मौजूद है, तो चुनाव आयोग ने एक पूरी तरह नई, बड़ी, महंगी और व्यापक SIR प्रक्रिया क्यों शुरू की? सिंघवी ने इस सवाल को अदालत के सामने यह कहते हुए रखा कि यह “अनावश्यक ही नहीं, अवैध” भी है। यह सवाल आयोग की मंशा से लेकर उसकी विधिक समझ तक सब पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
सुनवाई का ‘टर्निंग पॉइंट’: विपक्ष के तर्कों को पहले ही निष्प्रभावी कर दिया
वरिष्ठ अधिवक्ता अरुण अग्रवाल ने इस सुनवाई को पूरे मामले का “टर्निंग पॉइंट” बताया। उनका कहना था कि सिंघवी ने न सिर्फ अपने तर्क रखे बल्कि विपक्ष के संभावित तर्कों को भी पहले ही उखाड़ दिया। उन्होंने कानून की भावनाओं, तकनीकी प्रावधानों और संवैधानिक दायरे—तीनों को जोड़कर एक ऐसा समग्र तर्क प्रस्तुत किया कि अदालत को गंभीरता से विचार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। यह सुनवाई अब मात्र प्रक्रिया की वैधता का मुद्दा नहीं है, बल्कि संस्थागत अधिकारों और लोकतांत्रिक सीमाओं पर केंद्रित एक बड़े संवैधानिक प्रश्न में बदल चुकी है।
यह मामला अब नागरिकों के अधिकार और लोकतांत्रिक संरचना की आत्मा का परीक्षण है
27 नवंबर की सुनवाई ने स्पष्ट कर दिया कि SIR विवाद अब प्रशासनिक प्रक्रियाओं के इर्द-गिर्द घूमने वाला मुद्दा नहीं रहा। यह भारत के संवैधानिक ढांचे, चुनाव आयोग की शक्ति, नागरिकता के अधिकार, और सबसे महत्वपूर्ण—एक साधारण नागरिक के मत देने के अधिकार—का परीक्षण बन चुका है। सिंघवी की दलीलों ने इस मामले को एक निर्णायक मोड़ पर ला खड़ा किया है। अब अदालत को तय करना है कि क्या चुनाव आयोग ने संवैधानिक सीमाएँ लांघीं और क्या SIR प्रक्रिया को अवैध घोषित किया जा सकता है। इस फैसले का असर न केवल वर्तमान राजनीतिक परिस्थिति पर पड़ेगा, बल्कि यह आने वाले वर्षों में भारत के लोकतांत्रिक भविष्य को भी प्रभावित करेगा।





