एबीसी नेशनल न्यूज | रियाद/मोगादिशु | 24 फरवरी 2026
समझौते की पृष्ठभूमि और बदलता भू-राजनीतिक माहौल
10 फरवरी को सोमालिया और सऊदी अरब के बीच हुआ सैन्य सहयोग समझौता केवल एक सामान्य रक्षा समझौता नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे हॉर्न ऑफ अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र में बदलते रणनीतिक समीकरणों के संकेत के रूप में देखा जा रहा है। सोमालिया लंबे समय से आतंरिक सुरक्षा चुनौतियों, समुद्री डकैती और क्षेत्रीय विवादों से जूझता रहा है, जबकि सऊदी अरब लाल सागर और अदन की खाड़ी के आसपास अपनी सुरक्षा उपस्थिति को मजबूत करना चाहता है। ऐसे में दोनों देशों का करीब आना साझा हितों और सुरक्षा चिंताओं का परिणाम माना जा रहा है।
सोमालिया के लिए संभावित फायदे
इस समझौते से सोमालिया को सबसे बड़ा लाभ सुरक्षा क्षमता बढ़ाने के रूप में मिल सकता है। सऊदी अरब की सैन्य ट्रेनिंग, आधुनिक उपकरण और निगरानी तकनीक सोमालिया की सेना और सुरक्षा बलों को मजबूत कर सकती है। समुद्री सुरक्षा, आतंकवाद विरोधी अभियान और सीमा निगरानी जैसे क्षेत्रों में सहयोग सोमालिया को अपने संवेदनशील इलाकों पर बेहतर नियंत्रण स्थापित करने में मदद दे सकता है। साथ ही आर्थिक रूप से कमजोर रक्षा ढांचे वाले सोमालिया को वित्तीय और तकनीकी सहयोग मिलने की भी संभावना है।
सऊदी अरब के रणनीतिक हित
सऊदी अरब के लिए यह समझौता लाल सागर और अदन की खाड़ी जैसे अहम समुद्री मार्गों की सुरक्षा से जुड़ा है। इन रास्तों से वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति गुजरती है, इसलिए क्षेत्र में स्थिरता सऊदी अरब के आर्थिक और सुरक्षा हितों के लिए जरूरी है। सोमालिया के साथ मजबूत संबंध सऊदी अरब को अफ्रीकी तट के पास रणनीतिक पहुंच और सहयोगी उपस्थिति प्रदान कर सकते हैं, जिससे समुद्री खतरों और क्षेत्रीय अस्थिरता से निपटना आसान हो सकता है।
तकनीक और सुविधाओं का संभावित आदान-प्रदान
हालांकि समझौते के सभी विवरण सार्वजनिक नहीं हैं, लेकिन सामान्यतः ऐसे सहयोग में सैन्य प्रशिक्षण, खुफिया जानकारी साझा करना, निगरानी प्रणाली, ड्रोन तकनीक, समुद्री सुरक्षा उपकरण और रक्षा बुनियादी ढांचे के विकास जैसी चीजें शामिल हो सकती हैं। संयुक्त अभ्यास और विशेषज्ञता का आदान-प्रदान भी दोनों देशों की सैन्य तैयारी और प्रतिक्रिया क्षमता को बेहतर बना सकता है। इससे सोमालिया को आधुनिक सैन्य प्रक्रियाओं का अनुभव मिलेगा, जबकि सऊदी अरब को क्षेत्रीय संचालन की बेहतर समझ मिल सकती है।
कौन-कौन से देश सतर्क रह सकते हैं
इस समझौते से क्षेत्र के कई देश सतर्क नजर रख सकते हैं। संयुक्त अरब अमीरात, जिसकी सोमालिया और सोमालीलैंड में पहले से आर्थिक और सुरक्षा मौजूदगी रही है, इस बदलाव को अपने प्रभाव क्षेत्र में चुनौती के रूप में देख सकता है। इसके अलावा इथियोपिया और केन्या जैसे पड़ोसी देश भी क्षेत्रीय सुरक्षा संतुलन पर नजर रखेंगे, क्योंकि सोमालिया की सैन्य क्षमता में बदलाव का असर सीमा सुरक्षा और क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ सकता है। खाड़ी क्षेत्र में कतर और अन्य देशों के लिए भी यह समझौता नए रणनीतिक समीकरणों का संकेत हो सकता है।
दूसरे देशों के लिए संभावित चिंताएं
यदि क्षेत्र में सैन्य गठबंधन और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है तो इससे तनाव और शक्ति संतुलन की प्रतिस्पर्धा भी तेज हो सकती है। बंदरगाहों, समुद्री मार्गों और सैन्य ठिकानों को लेकर प्रतिस्पर्धा बढ़ने से आर्थिक और सुरक्षा हितों पर असर पड़ सकता है। साथ ही किसी एक पक्ष की मजबूत उपस्थिति दूसरे देशों को वैकल्पिक गठबंधन बनाने की ओर प्रेरित कर सकती है, जिससे क्षेत्रीय कूटनीति और जटिल हो सकती है।
सहयोग या प्रतिस्पर्धा—भविष्य पर निर्भर
सोमालिया और सऊदी अरब का यह समझौता सुरक्षा सहयोग और स्थिरता को मजबूत करने की दिशा में सकारात्मक कदम भी साबित हो सकता है और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा को बढ़ाने वाला कारक भी बन सकता है। इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि यह साझेदारी केवल सुरक्षा तक सीमित रहती है या व्यापक रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बनती है। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि इस समझौते ने हॉर्न ऑफ अफ्रीका और खाड़ी क्षेत्र की राजनीति में नई हलचल जरूर पैदा कर दी है, जिस पर आने वाले समय में कई देशों की नजर बनी रहेगी।




