एबीसी डेस्क 26 दिसंबर 2025
गुंटूर (आंध्र प्रदेश) के एक अस्पताल में जब दिवंगत दलित छात्र रोहित वेमुला की मां राधिका वेमुला भर्ती हुईं, तो यह सिर्फ एक मेडिकल इमरजेंसी नहीं थी—यह उस परिवार के लिए फिर से टूट जाने का पल था, जिसने पहले ही अपने बेटे को खोने का असहनीय दर्द झेला है। अस्पताल के बिस्तर पर लेटी एक मां, आंखों में चिंता और मन में डर—कि इलाज कैसे होगा, खर्च कैसे उठेगा—उस वक्त परिवार ने नेता विपक्ष राहुल गांधी को संदेश भेजा।
संदेश मिलते ही राहुल गांधी ने बिना किसी देरी के गुंटूर में मौजूद एक स्थानीय कांग्रेस नेता को निर्देश दिए कि राधिका वेमुला के इलाज और परिवार की हर जरूरत का पूरा ध्यान रखा जाए। यह कोई औपचारिक फोन कॉल नहीं था, न ही कोई प्रेस बयान—यह एक संवेदनशील क्षण में लिया गया मानवीय फैसला था, जहां राजनीति नहीं, सिर्फ इंसानियत बोल रही थी।
इलाज के दौरान अस्पताल का बिल कुछ लाख रुपये तक पहुंच गया। इस आर्थिक बोझ को भी बिना किसी प्रचार, कैमरे या बयान के चुपचाप अदा कर दिया गया। इलाज की पूरी स्थिति और मेडिकल रिपोर्ट राहुल गांधी को दी जाती रही, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि राधिका वेमुला को हर जरूरी चिकित्सा सुविधा मिल रही है और परिवार किसी तरह की चिंता में न रहे।
रोहित वेमुला की याद आज भी देश की अंतरात्मा को झकझोरती है। उस त्रासदी के बाद से राधिका वेमुला सिर्फ एक मां नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की एक पीड़ादायक प्रतीक बन चुकी हैं। ऐसे में उनके बीमार पड़ने की खबर ने कई जख्मों को फिर से हरा कर दिया। इस कठिन समय में मिला यह शांत, निःशब्द सहयोग उस राजनीति से अलग खड़ा दिखता है, जो अक्सर शोर में उलझी रहती है।
यह घटना किसी उपलब्धि की तरह पेश करने के लिए नहीं, बल्कि यह याद दिलाने के लिए महत्वपूर्ण है कि सत्ता और विपक्ष से परे भी इंसानियत होती है। जब एक मां अस्पताल में जूझ रही हो, तब सबसे बड़ी भूमिका संवेदना की होती है—और कभी-कभी वही संवेदना सबसे गहरी राजनीति बन जाती है।




