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अपने ही बनाए आग में झुलसता पाकिस्तान

इस्लामाबाद 30 सितंबर 2025

आतंकवाद का बूमरैंग

क्वेटा में हुआ हालिया आत्मघाती हमला, जिसमें 10 से अधिक लोगों की मौत और 30 से ज्यादा घायल हुए, पाकिस्तान के लिए कोई नई घटना नहीं है। यह उस लंबे सिलसिले की कड़ी है, जो दशकों पहले शुरू हुआ था जब पाकिस्तान की हुकूमत ने आतंकवादी संगठनों को अपनी रणनीतिक संपत्ति (Strategic Assets) के तौर पर पाला-पोसा। कभी इन्हें अफगानिस्तान में प्रभाव जमाने, कभी भारत को अस्थिर करने और कभी वैश्विक ताकतों के सामने मोलभाव करने के हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। लेकिन आज वही आतंकवादी संगठन पाकिस्तान की धरती पर तबाही बरपा रहे हैं। क्वेटा का धमाका इस कड़वे सच की याद दिलाता है कि आतंकवाद कभी सीमाओं में नहीं बंधता। जिसे आप हथियार समझते हैं, वही आपके खिलाफ बूमरैंग बनकर लौटता है।

बलूचिस्तान: अस्थिरता का गढ़

पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत इस आग का सबसे बड़ा केंद्र बन चुका है। संसाधनों से समृद्ध लेकिन गरीबी और उपेक्षा से ग्रस्त यह इलाका लंबे समय से अलगाववादी आंदोलनों, सांप्रदायिक हिंसा और चरमपंथ की त्रिकोणीय मार झेल रहा है। फ्रंटियर कॉर्प्स मुख्यालय के पास हुआ धमाका इस बात का प्रतीक है कि अब पाकिस्तान की सुरक्षा संस्थाएं भी आतंकियों के निशाने पर हैं। जिस सेना को कभी पाकिस्तान की सबसे मजबूत ढाल माना जाता था, वही आज अपने ही बनाए संगठनों के हाथों कमजोर और असुरक्षित हो रही है। बलूच जनता की आवाज़ को बंदूक से दबाने की कोशिश ने सिर्फ हालात को और विस्फोटक बना दिया है।

आर्थिक और राजनीतिक संकट

यह आतंक की लपटें उस समय और खतरनाक हो जाती हैं जब पाकिस्तान पहले से ही गहरे आर्थिक संकट और राजनीतिक अस्थिरता से जूझ रहा है। कर्ज़ का बोझ, महंगाई, बेरोजगारी और IMF की शर्तों ने देश की रीढ़ तोड़ दी है। आम जनता दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष कर रही है और अब उसके सिर पर आतंकवाद का साया और गहरा हो गया है। पाकिस्तान की सरकार जनता को सुरक्षा और स्थिरता देने में पूरी तरह विफल साबित हो रही है।

दुनिया के लिए सबक

पाकिस्तान का हाल आज पूरी दुनिया के लिए एक सबक है। आतंकवाद कभी भी स्थायी हथियार नहीं हो सकता। जो मुल्क इसे विदेश नीति या रणनीति का हिस्सा बनाते हैं, वे अंततः इसकी चपेट में खुद ही आ जाते हैं। पाकिस्तान ने जिन आतंकियों को कभी “मुक्ति सेनानी” या “रणनीतिक गहराई” का नाम दिया था, आज वही उसके विनाश का कारण बन रहे हैं। अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी ने पाकिस्तान के चरमपंथी नेटवर्क को और ताकतवर बना दिया है। सच यह है कि कट्टरवाद न किसी सीमा को मानता है, न किसी दोस्ती को।

भारत और क्षेत्रीय असर

भारत के लिए यह घटनाएं सिर्फ पड़ोसी देश की खबर नहीं हैं। पाकिस्तान की अस्थिरता हमेशा भारत की सीमाओं तक आई है—चाहे वह आतंकियों की घुसपैठ के रूप में हो या सीमा पर तनाव के रूप में। पाकिस्तान की आंतरिक कमजोरी का बोझ अक्सर भारत को उठाना पड़ा है। अफगानिस्तान की नाजुक स्थिति और पाकिस्तान के भीतर की आग मिलकर पूरे दक्षिण एशिया के लिए खतरा बन सकती है।

नतीजा: अपने ही आग में झुलसता पाकिस्तान

आज पाकिस्तान उसी आग में जल रहा है जिसे उसने दूसरों को जलाने के लिए सुलगाया था। आतंकवाद ने उसकी अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज—तीनों को खोखला कर दिया है। क्वेटा का धमाका कोई अंत नहीं बल्कि इस जलती आग की एक और चिंगारी है। असली समस्या यह है कि पाकिस्तान की सत्ता अब भी जड़ कारणों को स्वीकार करने से इंकार कर रही है। जब तक यह सच सामने नहीं आता कि आतंकवाद की राजनीति ही उसकी सबसे बड़ी गलती थी, तब तक पाकिस्तान का भविष्य उसी आग में झुलसता रहेगा जिसे उसने खुद प्रज्वलित किया था।

 

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