राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | कोच्चि | 4 नवंबर 2026
केरल हाईकोर्ट ने धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी गतिविधियों को लेकर एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि संवैधानिक लोकतंत्र में, खासकर शैक्षणिक संस्थानों में, ऐसी राजनीतिक गतिविधियों की कोई जगह नहीं है। अदालत ने यह टिप्पणी श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय के 16 निलंबित छात्रों से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान की। साथ ही, छात्रों को सेमेस्टर परीक्षा में बैठने की अनुमति देने वाले एकल पीठ के अंतरिम आदेश को रद्द कर दिया।
यह मामला केरल के एर्नाकुलम जिले के कालडी स्थित श्री शंकराचार्य संस्कृत विश्वविद्यालय का है। निलंबित छात्र माकपा की छात्र इकाई स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (SFI) से जुड़े हैं। अगस्त में विश्वविद्यालय परिसर में हुए विरोध प्रदर्शन और एक नुक्कड़ नाटक के बाद इन छात्रों को निलंबित कर दिया गया था।
क्या था पूरा मामला?
विश्वविद्यालय परिसर में 13 अगस्त 2026 को छात्रों ने विरोध प्रदर्शन किया था। उनकी प्रमुख मांग विश्वविद्यालय में बेहतर बुनियादी सुविधाएं और शैक्षणिक संसाधन उपलब्ध कराने की थी। यह प्रदर्शन उस समय हुआ, जब विश्वविद्यालय की सिंडिकेट बैठक चल रही थी।
विश्वविद्यालय प्रशासन का आरोप था कि प्रदर्शन के दौरान छात्रों ने कुलपति सीजा थॉमस का प्रतीकात्मक अंतिम संस्कार दर्शाने वाला नुक्कड़ नाटक किया। प्रशासन ने कुलपति के साथ दुर्व्यवहार और उनकी गाड़ी को नुकसान पहुंचाने की कोशिश के आरोप भी लगाए।
हालांकि, छात्रों ने इन आरोपों से इनकार किया। उनका कहना था कि नुक्कड़ नाटक विश्वविद्यालय के थिएटर विभाग की उपेक्षा और वहां सुविधाओं की कमी को उजागर करने के लिए किया गया था।
इस घटना के बाद विश्वविद्यालय ने 1 सितंबर को 16 छात्रों को निलंबित कर दिया और उनके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई शुरू की। घटना के संबंध में कालडी पुलिस थाने में दो FIR भी दर्ज की गईं।
पहले एकल पीठ ने दी थी परीक्षा में बैठने की अनुमति
निलंबित छात्रों ने हाईकोर्ट में याचिका दायर कर कहा था कि निलंबन के कारण उनकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। उन्हें कक्षाओं में शामिल होने से रोका गया था और अब सेमेस्टर परीक्षाओं में बैठने से भी वंचित किया जा रहा था।
30 अक्टूबर को हाईकोर्ट की एकल पीठ ने 16 छात्रों को परीक्षा शुल्क जमा करने और सेमेस्टर परीक्षा में बैठने की अंतरिम अनुमति दे दी थी। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया था कि इस अनुमति से छात्रों को कोई स्थायी अधिकार नहीं मिलेगा और यह मुख्य याचिका के अंतिम फैसले के अधीन रहेगी।
विश्वविद्यालय ने इस आदेश को खंडपीठ में चुनौती दी। उसका तर्क था कि छात्र परीक्षा में बैठने के लिए निर्धारित अनिवार्य शर्तें पूरी नहीं करते। इनमें न्यूनतम उपस्थिति, आंतरिक परीक्षाओं में निर्धारित प्रदर्शन और उपस्थिति की कमी को माफ कराने के लिए तय प्रक्रिया का पालन शामिल था।
खंडपीठ ने एकल पीठ का आदेश क्यों रद्द किया?
न्यायमूर्ति अनिल के. नरेंद्रन और न्यायमूर्ति मुरली कृष्ण एस. की खंडपीठ ने विश्वविद्यालय की अपील स्वीकार करते हुए एकल पीठ का आदेश रद्द कर दिया।
अदालत ने पाया कि छात्रों की याचिका में ऐसे पर्याप्त तथ्य और दस्तावेज नहीं थे, जिनसे यह साबित हो सके कि वे परीक्षा में बैठने की निर्धारित पात्रता पूरी करते हैं। विश्वविद्यालय के नियमों के अनुसार न्यूनतम उपस्थिति और आंतरिक परीक्षाओं से जुड़ी शर्तें पूरी करना जरूरी था।
खंडपीठ ने कहा कि अदालतें ऐसे निर्देश नहीं दे सकतीं, जिनके कारण किसी विश्वविद्यालय या अन्य प्राधिकरण को अपने वैधानिक प्रावधानों और निर्धारित नियमों के विपरीत काम करना पड़े। अदालत के अनुसार, नियमों के तहत पात्रता पूरी किए बिना परीक्षा में बैठने की अनुमति देना संस्थागत अनुशासन और निर्धारित प्रक्रिया को कमजोर करेगा।
‘शैक्षणिक संस्थान शिक्षा के लिए हैं, राजनीति के लिए नहीं’
सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने अपने 2017 के एक पुराने फैसले का हवाला दिया। उसी फैसले में कहा गया था कि धरना, भूख हड़ताल और सत्याग्रह जैसी राजनीतिक गतिविधियों की संवैधानिक लोकतंत्र में कोई जगह नहीं है, विशेषकर शैक्षणिक संस्थानों में।
अदालत ने पुराने फैसले की टिप्पणी दोहराते हुए कहा कि शैक्षणिक संस्थान शिक्षा प्रदान करने के लिए हैं, राजनीति करने के लिए नहीं। राजनीतिक दल अपनी महत्वाकांक्षाओं के लिए किसी शैक्षणिक संस्थान की व्यवस्था या पढ़ाई करने वाले दूसरे छात्रों के अधिकारों को बाधित नहीं कर सकते।
पुराने फैसले में यह भी कहा गया था कि शैक्षणिक संस्थानों में ऐसी गतिविधियों में शामिल होने वाले छात्रों को निष्कासन या रस्टिकेशन जैसी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है।
डॉ. आंबेडकर के भाषण का भी उल्लेख
खंडपीठ ने अपने पुराने फैसले में उद्धृत संविधान सभा में डॉ. भीमराव आंबेडकर के 25 नवंबर 1949 के भाषण का भी संदर्भ दिया।
आंबेडकर ने लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए संवैधानिक तरीकों से सामाजिक और आर्थिक उद्देश्यों को हासिल करने पर जोर दिया था। उन्होंने कहा था कि जब संवैधानिक रास्ते उपलब्ध हों, तब सविनय अवज्ञा, असहयोग और सत्याग्रह जैसे तरीकों को अपनाने का औचित्य नहीं रह जाता। उन्होंने ऐसे तरीकों को ‘अराजकता का व्याकरण’ (Grammar of Anarchy) कहा था।
केरल हाईकोर्ट ने इसी विचार का उल्लेख करते हुए शैक्षणिक संस्थानों में राजनीतिक गतिविधियों और अनुशासन के बीच संबंध पर अपनी टिप्पणी दोहराई।
छात्रों के निलंबन पर अंतिम फैसला अभी बाकी
इस पूरे मामले में यह स्पष्ट करना जरूरी है कि खंडपीठ का ताजा आदेश मुख्य रूप से छात्रों को परीक्षा में बैठने की अंतरिम अनुमति से संबंधित था। अदालत ने परीक्षा-पात्रता और विश्वविद्यालय के नियमों के आधार पर एकल पीठ का आदेश रद्द किया है। छात्रों के निलंबन को चुनौती देने वाली मूल याचिका पर अंतिम फैसला अभी नहीं हुआ है।
इसलिए अदालत की टिप्पणी को छात्रों के खिलाफ लगाए गए सभी आरोपों पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता। विश्वविद्यालय के आरोप और छात्रों का पक्ष मूल विवाद का हिस्सा बने हुए हैं।
इस फैसले ने एक बार फिर यह बहस सामने ला दी है कि शैक्षणिक संस्थानों में विरोध-प्रदर्शन की सीमा क्या होनी चाहिए और छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों तथा विश्वविद्यालय के अनुशासन के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। फिलहाल केरल हाईकोर्ट ने अपने आदेश में विश्वविद्यालय के नियमों और परीक्षा की निर्धारित पात्रता को प्राथमिकता दी है।



