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‘दिमागी नक्सल’ कहकर सवालों से नहीं बच सकती सत्ता: खड़गे का मोदी-रिजिजू पर हमला

वोट चोरी के आरोपों पर प्रधानमंत्री से आमने-सामने बहस की मांग; रिजिजू ने ‘दिमागी नक्सल’ की परिभाषा बताकर किया पलटवार, SIR और चुनाव आयोग की भूमिका पर फिर तेज हुई सियासी जंग

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 4 नवंबर 2026

देश की राजनीति में अब सवालों का जवाब देने के बजाय सवाल पूछने वालों को ही कठघरे में खड़ा करने की प्रवृत्ति पर बहस तेज हो गई है। कभी ‘अर्बन नक्सल’ तो कभी ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू आमने-सामने आ गए हैं। खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से कहा है कि वह विपक्ष पर ठप्पे लगाने के बजाय ‘वोट चोरी’ के आरोपों और राहुल गांधी की खुली बहस की चुनौती का जवाब दें।

इस पूरे विवाद ने एक बुनियादी सवाल खड़ा कर दिया है—क्या लोकतंत्र में सरकार से सवाल पूछना, चुनावी प्रक्रिया पर संदेह जताना या नीतियों की आलोचना करना किसी को राष्ट्रविरोधी अथवा नक्सल समर्थक बताने का आधार बन सकता है?

खड़गे का सवाल—जवाब दीजिए, लेबल मत लगाइए

कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने सोशल मीडिया मंच X पर प्रधानमंत्री मोदी पर निशाना साधते हुए आरोप लगाया कि उनके पास ‘वोट चोरी’ के आरोपों और राहुल गांधी की खुली बहस की चुनौती का कोई जवाब नहीं है। खड़गे ने कहा कि प्रधानमंत्री बार-बार ‘दिमागी नक्सल’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जबकि उन्हें चुनावी पारदर्शिता और विपक्ष के सवालों पर जवाब देना चाहिए।

खड़गे ने राहुल गांधी की उस चुनौती का भी समर्थन किया, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री को किसी भी मंच पर खुली बहस के लिए आमंत्रित किया है। कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा कि प्रधानमंत्री संसद में सवालों का सामना करें और देश को बताएं कि चुनावी अनियमितताओं के आरोपों पर उनका क्या जवाब है।

SIR पर चुनाव आयोग के पांच यू-टर्न का आरोप

खड़गे ने चुनाव आयोग की विशेष गहन पुनरीक्षण प्रक्रिया यानी SIR पर भी गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने आरोप लगाया कि आयोग ने इस प्रक्रिया के दौरान पांच बार अपना रुख बदला है। उन्होंने विशेष रूप से फॉर्म-6 में किए गए बदलावों का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि आखिर इसकी जरूरत क्यों पड़ी।

खड़गे का दावा है कि फॉर्म-6 में बदलाव को लेकर चुनाव आयुक्तों के बीच भी आपत्ति जताई गई थी। उन्होंने पूछा कि यदि प्रक्रिया में सब कुछ सही था तो बार-बार बदलाव क्यों किए गए? कांग्रेस और विपक्ष पहले से ही आरोप लगाते रहे हैं कि SIR के नाम पर वास्तविक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए जाने का खतरा है। चुनाव आयोग की ओर से इस प्रक्रिया को मतदाता सूची की शुद्धता सुनिश्चित करने की कवायद बताया जाता रहा है।

अमित शाह से भी पूछा—तीन करोड़ घुसपैठिए कहां से आए?

खड़गे ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के उस दावे पर भी सवाल उठाया, जिसमें तीन करोड़ मतदाताओं को घुसपैठिया बताया गया है। उन्होंने पूछा कि यदि इतने बड़े पैमाने पर अवैध रूप से लोग देश में दाखिल हुए, तो इतने वर्षों तक गृह मंत्री रहते हुए अमित शाह ने क्या किया?

खड़गे ने इस मुद्दे पर गृह मंत्री की जवाबदेही तय करने की मांग की और उन्हें पद से हटाने तक की बात कही। यह कांग्रेस अध्यक्ष का राजनीतिक आरोप और मांग है, जिस पर सरकार की ओर से जवाब आना बाकी है।

रिजिजू का पलटवार—‘दिमागी नक्सल’ कोई राजनीतिक नैरेटिव नहीं

खड़गे के आरोपों पर किरेन रिजिजू ने पलटवार किया। उन्होंने कहा कि ‘दिमागी नक्सल’ कोई राजनीतिक नैरेटिव नहीं, बल्कि एक शब्द है। रिजिजू ने ऐसे लोगों की कुछ श्रेणियां भी गिनाईं, जिन्हें उनके अनुसार इस श्रेणी में रखा जा सकता है।

उन्होंने उन लोगों का उल्लेख किया जो माओवादी एजेंडे का समर्थन करते हैं और भारतीय संविधान को अस्वीकार करते हैं, अलगाववादियों के पक्ष में खड़े होते हैं, अनुच्छेद 370 का समर्थन करते हैं, विकास परियोजनाओं का विरोध करते हैं अथवा पूर्वोत्तर को देश के बाकी हिस्सों से काटने की साजिश में शामिल होते हैं।

रिजिजू की इस दलील के बावजूद राजनीतिक विवाद का मूल सवाल बना हुआ है कि किसी व्यक्ति की असहमति, आलोचना और सरकार से जवाब मांगने को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों से अलग कैसे पहचाना जाएगा? किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में आलोचना और हिंसक या असंवैधानिक गतिविधियों के बीच स्पष्ट अंतर होना जरूरी है।

सवाल पूछना अपराध नहीं, लोकतंत्र की बुनियाद है

इस विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि ‘अर्बन नक्सल’ और ‘दिमागी नक्सल’ जैसे राजनीतिक लेबल अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बनते जा रहे हैं। सरकार की नीतियों का विरोध करने वाले, चुनाव आयोग से जवाब मांगने वाले, पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी—कई बार ऐसे शब्दों के निशाने पर आ जाते हैं।

लोकतंत्र में किसी भी विचारधारा, राजनीतिक दल या सरकार की आलोचना करना नागरिकों का अधिकार है। यदि कोई व्यक्ति हिंसा, माओवादी गतिविधियों या संविधान विरोधी साजिश में शामिल है तो उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन केवल सवाल पूछने या असहमति जताने के कारण किसी को नक्सल समर्थक ठहरा देना लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करता है।

मोदी के सामने राहुल की बहस की चुनौती

यह विवाद ऐसे समय बढ़ा है जब राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री मोदी को खुली बहस की चुनौती दी है। राहुल ने प्रधानमंत्री से कहा है कि वे अपनी पसंद का स्थान चुनें और चाहें तो बहस के लिए निर्णायक भी अपनी पसंद का तय कर लें। उन्होंने विपक्ष को देशविरोधी बताने के आरोपों के साथ-साथ विदेशी संबंधों और देश के आर्थिक हितों से जुड़े सवालों पर चर्चा की मांग की है।

खड़गे ने इसी चुनौती को आगे बढ़ाते हुए प्रधानमंत्री से संसद, प्रेस और सार्वजनिक मंचों पर सवालों का सामना करने को कहा है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री ने अब तक कोई खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है।

असली मुद्दा—लेबल नहीं, जवाबदेही

सियासी बयानबाजी के बीच देश के सामने कई गंभीर सवाल हैं। मतदाता सूची में बदलाव की प्रक्रिया कितनी पारदर्शी है? चुनाव आयोग के फैसलों पर उठ रही आपत्तियों का जवाब कौन देगा? घुसपैठ के दावों के पीछे क्या प्रमाण हैं? और सरकार की आलोचना करने वालों को बार-बार राजनीतिक विशेषणों से क्यों नवाजा जा रहा है?

सत्ता पक्ष को यह समझना होगा कि लोकतंत्र में आलोचना को दबाने से सवाल खत्म नहीं होते। वहीं विपक्ष की भी जिम्मेदारी है कि वह अपने आरोपों को प्रमाणों और तथ्यों के साथ जनता के सामने रखे।

लोकतंत्र की असली ताकत इस बात में नहीं है कि कितने लोगों को ‘नक्सल’, ‘देशविरोधी’ या किसी दूसरे ठप्पे से पुकारा गया, बल्कि इस बात में है कि सत्ता से पूछे गए सवालों के कितने जवाब दिए गए।

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