ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026
प्रदूषण रोकने के नाम पर सरकार एक बार फिर ऐसे नियमों की तैयारी कर रही है, जिनका बोझ आखिरकार आम आदमी की जेब पर पड़ सकता है। BS-VII उत्सर्जन मानकों का मसौदा सामने आया है। प्रस्ताव के मुताबिक, 1 अप्रैल 2029 से यात्री कारों पर नए नियम लागू करने की तैयारी है। इसके बाद हल्के वाणिज्यिक वाहनों और भारी वाहनों की बारी आएगी। सवाल यह है कि प्रदूषण कम करने की जिम्मेदारी हर बार आम आदमी की जेब पर ही क्यों डाल दी जाती है?
कहीं प्रदूषण नियंत्रण के नाम पर नई गाड़ियां खरीदने का दबाव तो नहीं बनाया जा रहा?
आम आदमी बड़ी मुश्किल से अपनी कमाई जोड़कर एक गाड़ी खरीदता है। कोई परिवार बच्चों को स्कूल पहुंचाने के लिए गाड़ी लेता है, कोई नौकरी और कारोबार के लिए, तो कोई बुजुर्ग माता-पिता की सुविधा के लिए। गाड़ी खरीदना हर किसी के लिए शौक नहीं, जरूरत भी है। लेकिन जब भी नए उत्सर्जन मानकों की चर्चा होती है, लोगों के मन में सबसे पहले यही सवाल उठता है कि अब गाड़ी की कीमत कितनी बढ़ेगी, रखरखाव कितना महंगा होगा और भविष्य में पुरानी गाड़ी चलाना कितना मुश्किल हो जाएगा?
सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि नए नियम पर्यावरण की रक्षा के लिए हैं। पर्यावरण की रक्षा जरूरी है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि उसके नाम पर आम नागरिक पर ऐसा आर्थिक बोझ न डाल दिया जाए, जिसे उठाना उसके लिए मुश्किल हो।
प्रदूषण का समाधान जनता की जेब काटना नहीं है
प्रस्तावित BS-VII मानकों में इंजन से निकलने वाले धुएं के अलावा टायर और ब्रेक से पैदा होने वाले सूक्ष्म कणों की जांच तथा वास्तविक सड़क परिस्थितियों में उत्सर्जन परीक्षण जैसे प्रावधान शामिल हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के लंबे समय तक प्रदर्शन की जांच भी प्रस्ताव का हिस्सा है।
प्रदूषण के इन पहलुओं की जांच करना अपने आप में गलत नहीं है। असली सवाल यह है कि इन मानकों को लागू करने का खर्च कौन उठाएगा? क्या वाहन निर्माता अपनी तकनीक सुधारने और प्रदूषण घटाने की जिम्मेदारी पूरी तरह निभाएंगे, या अतिरिक्त लागत का बड़ा हिस्सा बढ़ी हुई कीमतों के रूप में ग्राहकों से वसूला जाएगा?
अगर नई तकनीक के नाम पर गाड़ियों की कीमतें बढ़ती हैं, तो सबसे ज्यादा मुश्किल मध्यमवर्गीय और निम्न आय वाले परिवारों को होगी। अमीर व्यक्ति के लिए महंगी गाड़ी खरीदना शायद बड़ी समस्या न हो, लेकिन सीमित आमदनी वाले परिवार के लिए कुछ हजार या लाख रुपये का अतिरिक्त खर्च भी बजट बिगाड़ सकता है।
सरकार को साफ करना चाहिए कि BS-VII लागू होने के बाद आम आदमी की जेब पर कितना असर पड़ेगा और इस बोझ को कम करने के लिए क्या व्यवस्था की जाएगी।
उद्योगपतियों के लिए नए बाजार, जनता के लिए नया खर्च?
हर बार जब कोई नया तकनीकी मानक आता है, वाहन कंपनियों को अपनी उत्पादन प्रक्रिया, इंजन, परीक्षण और प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों में बदलाव करने पड़ सकते हैं। इससे कंपनियों की लागत बढ़ने की आशंका रहती है। लेकिन क्या यह मान लिया जाए कि उस लागत की भरपाई ग्राहकों से ही होगी?
यहीं सरकार की जवाबदेही का सवाल खड़ा होता है। प्रदूषण कम करने के लिए नियम बनाना सरकार का काम है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उसी की जिम्मेदारी है कि नियमों का इस्तेमाल महंगी गाड़ियां बेचने का दबाव बनाने या आम आदमी को समय से पहले वाहन बदलने के लिए मजबूर करने के रास्ते के रूप में न हो।
अभी BS-VII का मसौदा प्रस्तावित है। इससे यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं होगा कि पुरानी गाड़ियां अपने आप प्रतिबंधित हो जाएंगी या हर वाहन मालिक को नई गाड़ी खरीदनी ही पड़ेगी। लेकिन सरकार को यह आशंका दूर करनी होगी कि भविष्य में नए मानकों के नाम पर पुराने वाहनों के मालिकों पर अनुचित दबाव नहीं बनाया जाएगा।
यदि सरकार की मंशा प्रदूषण कम करना है, तो उसे यह भी बताना चाहिए कि वाहन कंपनियों की जवाबदेही कैसे तय होगी, तकनीकी बदलावों का खर्च कैसे नियंत्रित किया जाएगा और आम लोगों को अनावश्यक आर्थिक नुकसान से कैसे बचाया जाएगा।
सिर्फ गाड़ियों को निशाना बनाकर प्रदूषण खत्म नहीं होगा
दिल्ली-एनसीआर सहित देश के कई शहरों में प्रदूषण एक गंभीर समस्या है। लेकिन प्रदूषण की पूरी जिम्मेदारी केवल निजी वाहन मालिकों पर डालना समाधान नहीं हो सकता। निर्माण स्थलों की धूल, औद्योगिक उत्सर्जन, कचरा जलाना, सड़कों की खराब सफाई और सार्वजनिक परिवहन की कमियां भी गंभीरता से देखनी होंगी।
अगर सरकार सचमुच साफ हवा चाहती है, तो उसे सार्वजनिक परिवहन मजबूत करना चाहिए, बसों की संख्या बढ़ानी चाहिए, निर्माण स्थलों पर धूल नियंत्रण के नियम सख्ती से लागू करने चाहिए और प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों पर भी समान कठोरता दिखानी चाहिए।
आखिर निजी वाहन मालिक ही हर बार नियमों, जांच और अतिरिक्त खर्च के केंद्र में क्यों दिखाई देता है? उद्योगों और अन्य प्रदूषण स्रोतों की जवाबदेही भी उतनी ही स्पष्ट होनी चाहिए।
सरकार बताए—राहत देगी या नया बोझ डालेगी?
BS-VII के प्रस्ताव पर जनता को केवल तकनीकी जानकारी नहीं, बल्कि आर्थिक प्रभाव का स्पष्ट हिसाब भी चाहिए। नई गाड़ियों की संभावित कीमतों पर क्या असर पड़ेगा? मौजूदा वाहनों के मालिकों के अधिकार क्या होंगे? क्या पुराने वाहनों को नियमों के अनुरूप बनाए रखने का व्यावहारिक रास्ता मिलेगा? और क्या कंपनियों को अतिरिक्त लागत का पूरा बोझ ग्राहकों पर डालने से रोकने के लिए कोई व्यवस्था होगी?
इन सवालों का जवाब दिए बिना केवल प्रदूषण का नाम लेकर जनता से नए खर्च के लिए तैयार रहने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।
कहीं तो बख्श दो सरकार! आम आदमी पहले ही महंगाई, ईंधन, बीमा, मरम्मत और रोजमर्रा के खर्चों से जूझ रहा है। गाड़ी खरीदना और उसे चलाते रहना लगातार महंगा होता जा रहा है। ऐसे में हर नए नियम के साथ जनता के मन में यह डर पैदा होना स्वाभाविक है कि अगला आर्थिक झटका किस रूप में आएगा।
प्रदूषण कम होना चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन साफ हवा की कीमत सिर्फ आम आदमी क्यों चुकाए? सरकार की जिम्मेदारी है कि वह पर्यावरण की रक्षा करे, वाहन उद्योग की जवाबदेही तय करे और जनता की जेब को भी सुरक्षित रखे।
प्रदूषण के नाम पर नियम बनाइए, लेकिन आम आदमी को नई गाड़ी खरीदने के लिए मजबूर करने वाला माहौल मत बनाइए। जनता को साफ हवा भी चाहिए और अपनी मेहनत की कमाई पर अपना हक भी।



