राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026
भारत में वाहनों से होने वाले प्रदूषण पर लगाम लगाने के लिए सरकार ने भारत स्टेज-VII (BS-VII) उत्सर्जन मानकों का मसौदा पेश किया है। प्रस्तावित नियमों के तहत अब केवल गाड़ियों के साइलेंसर से निकलने वाले धुएं की जांच ही नहीं होगी, बल्कि ब्रेक और टायरों से पैदा होने वाले प्रदूषण पर भी ध्यान दिया जाएगा। इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी समय के साथ कितनी प्रभावी रहती है और वास्तविक सड़कों पर वाहन कितना प्रदूषण फैलाते हैं, इसकी जांच भी नए मानकों का हिस्सा होगी।
सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने इन नियमों को चरणबद्ध तरीके से लागू करने का प्रस्ताव दिया है। मसौदा अधिसूचनाएं अक्टूबर 2026 में प्रकाशित की गई हैं। इन पर सार्वजनिक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की गई हैं। अंतिम नियम जारी होने से पहले इनमें बदलाव संभव है।
कब से लागू होंगे BS-VII के प्रस्तावित नियम?
प्रस्ताव के अनुसार, नए उत्सर्जन मानकों को अलग-अलग श्रेणियों के वाहनों पर अलग-अलग समय से लागू किया जाएगा।
– 1 अप्रैल 2029: यात्री कारें।
– अप्रैल 2030: हल्के वाणिज्यिक वाहन।
– अप्रैल 2031: बसें और भारी ट्रक।
यह समय-सारणी अभी प्रस्तावित है। इसे अंतिम अधिसूचना और सरकार के फैसले के बाद ही निश्चित माना जा सकेगा।
अब केवल साइलेंसर का धुआं नहीं, टायर और ब्रेक भी जांच के दायरे में
वाहनों से होने वाला प्रदूषण केवल इंजन से निकलने वाली गैसों तक सीमित नहीं है। ब्रेक लगाने और टायरों के सड़क से घिसने के कारण भी सूक्ष्म कण हवा में फैलते हैं। प्रस्तावित BS-VII मानकों में इस तरह के प्रदूषण को भी शामिल करने की तैयारी है।
यह बदलाव इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इलेक्ट्रिक वाहन भी टायरों के घिसने और ब्रेक से पैदा होने वाले कणों के कारण प्रदूषण में योगदान दे सकते हैं। यानी केवल पेट्रोल-डीजल से इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ना ही पर्याप्त नहीं होगा; वाहन के पूरे इस्तेमाल से होने वाले प्रदूषण को समझना भी जरूरी होगा।
सड़क पर चलाकर होगी उत्सर्जन की जांच
प्रस्तावित नियमों में वास्तविक ड्राइविंग परिस्थितियों में उत्सर्जन की जांच पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वाहन नियंत्रित प्रयोगशाला परिस्थितियों में ही नहीं, बल्कि सामान्य सड़क पर चलते समय भी निर्धारित मानकों का पालन करें।
कारों के लिए कार्बन मोनोऑक्साइड (CO), नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx) और पार्टिकुलेट मैटर (PM) जैसे प्रमुख प्रदूषकों की मौजूदा सीमाओं को मसौदे में बरकरार रखा गया है। इसके साथ ही जांच की प्रक्रिया और प्रदूषण नियंत्रण की निगरानी को अधिक व्यापक बनाने का प्रस्ताव है।
इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी पर भी नजर
नए मानकों का एक और महत्वपूर्ण पहलू इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी का समय के साथ प्रदर्शन है। प्रस्तावित व्यवस्था में यह जांचने पर जोर होगा कि इस्तेमाल के वर्षों बाद बैटरी कितनी क्षमता बनाए रखती है।
इसका उद्देश्य इलेक्ट्रिक वाहनों की दीर्घकालिक कार्यक्षमता और प्रदर्शन से जुड़े पहलुओं को बेहतर तरीके से परखना है। इससे वाहन निर्माताओं को बैटरी की गुणवत्ता और टिकाऊपन पर अधिक ध्यान देना पड़ सकता है।
वाहन उद्योग के सामने नई चुनौती
BS-VII मानकों को लागू करने के लिए वाहन निर्माताओं को तकनीक, परीक्षण और प्रदूषण नियंत्रण प्रणालियों में बदलाव करने पड़ सकते हैं। इससे कंपनियों की उत्पादन लागत पर असर पड़ने की संभावना है। हालांकि, अंतिम नियमों और उनके क्रियान्वयन की शर्तें स्पष्ट होने के बाद ही लागत और कीमतों पर वास्तविक प्रभाव का आकलन किया जा सकेगा।
उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण सवाल यह होगा कि नए मानकों से वाहनों की कीमत, रखरखाव और तकनीकी सुविधाओं पर क्या असर पड़ता है।
अंतिम फैसला अभी बाकी
सरकार के सामने चुनौती प्रदूषण नियंत्रण को मजबूत करने के साथ वाहन उद्योग को नए मानकों के लिए पर्याप्त समय और स्पष्ट दिशा-निर्देश उपलब्ध कराने की भी है। मसौदे पर मिलने वाली सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं के बाद नियमों में बदलाव हो सकता है।
BS-VII का प्रस्ताव भारत की वाहन उत्सर्जन नीति को अगले चरण में ले जाने की तैयारी है। इसका दायरा अब इंजन के धुएं से आगे बढ़कर वास्तविक सड़क परिस्थितियों, टायर-ब्रेक से निकलने वाले कणों और इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरी के प्रदर्शन तक पहुंच रहा है। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सरकार अंतिम नियम कब जारी करती है और उन्हें किस रूप में लागू किया जाता है।



