राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 16 अक्टूबर 2026
लोकतंत्र में जनता का वोट उसकी सबसे बड़ी ताकत है। इसी वोट से सरकारें बनती हैं, सत्ता बदलती है और जनता अपने भविष्य का फैसला करती है। अगर इसी वोट को छीनने, मतदाता सूची से नाम काटने और चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित करने का संगठित अपराध साबित होता है, तो इसे देश और लोकतंत्र के साथ सबसे गंभीर विश्वासघातों में गिना जाना चाहिए। ऐसे अपराध के दोषियों के लिए कठोरतम सजा की मांग क्यों नहीं होनी चाहिए? सवाल सीधा है—अगर किसी ने जानबूझकर करोड़ों नागरिकों का मताधिकार छीनने की साजिश रची, तो उसे फांसी की सजा क्यों न मिले?
14 करोड़ वोट काटे जाने और वोट चोरी के जरिए सरकार बनाने के आरोप देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने बेहद गंभीर सवाल खड़े करते हैं। इन आरोपों की सच्चाई जांच और प्रमाणों से तय होनी चाहिए, लेकिन इन्हें उठाने वालों को चुप कराने के बजाय हर सवाल का जवाब दिया जाना चाहिए। आखिर कितने नाम काटे गए? किस आधार पर काटे गए? किस अधिकारी ने आदेश दिया? किसने डिजिटल हस्ताक्षर किए? और सबसे महत्वपूर्ण—क्या किसी नागरिक को उसका पक्ष रखने का पूरा अवसर मिला?
बिना SOP के वोट काटने का अधिकार किसने दिया?
विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान ऑटो-जेनरेटेड Form-7 के इस्तेमाल और राज्यों को लिखित मानक संचालन प्रक्रिया (SOP) नहीं मिलने की रिपोर्ट ने गंभीर सवाल पैदा किए हैं। Form-7 का संबंध मतदाता सूची में नाम हटाने की आपत्ति या अनुरोध से है। ऐसे में यदि हजारों नाम हटाने की प्रक्रिया स्पष्ट लिखित दिशा-निर्देशों के बिना चलाई गई, तो चुनाव आयोग को इसका पूरा हिसाब देना चाहिए।
यह कोई मामूली सरकारी फाइल का मामला नहीं है। हर नाम के पीछे एक नागरिक है, उसका परिवार है और लोकतंत्र में उसकी हिस्सेदारी है। किसी का नाम गलत तरीके से काट दिया गया, तो उससे केवल एक रिकॉर्ड नहीं मिटता—उसकी लोकतांत्रिक आवाज भी प्रभावित होती है।
दोषी साबित हों तो फांसी तक की सजा की मांग हो
अगर स्वतंत्र जांच में यह साबित हो कि किसी व्यक्ति या समूह ने जानबूझकर साजिश के तहत मतदाताओं के अधिकार छीनने, फर्जी दस्तावेज तैयार करने या चुनावी प्रक्रिया को अपराधपूर्ण तरीके से प्रभावित करने का काम किया, तो उसके खिलाफ कानून की सबसे कठोर धाराओं में मुकदमा चलना चाहिए। ऐसे अपराध की गंभीरता के अनुरूप उम्रकैद और, जहां कानून अनुमति देता हो, मृत्युदंड तक की सजा की मांग की जानी चाहिए।
लोकतंत्र को नुकसान पहुंचाने वालों के लिए कोई राजनीतिक ढाल नहीं होनी चाहिए। पद बड़ा हो या छोटा, प्रभाव कितना भी हो, सत्ता से नजदीकी कितनी भी हो—यदि अपराध प्रमाणित है, तो दोषी को बख्शने का सवाल ही नहीं उठना चाहिए।
जनता के मताधिकार पर हमला करने वालों के लिए रहम नहीं, कठोरतम कानूनी सजा की मांग होनी चाहिए।
चुनाव आयोग जवाब दे, देश को सच जानने का अधिकार है
चुनाव आयोग की जिम्मेदारी निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करना है। इसलिए उसे नाम हटाने की पूरी प्रक्रिया, Form-7 के रिकॉर्ड, डिजिटल हस्ताक्षरों, अधिकारियों के आदेशों और प्रभावित मतदाताओं की शिकायतों का विवरण सार्वजनिक करना चाहिए। यदि प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई है, तो उसकी स्वतंत्र जांच हो और जिम्मेदार लोगों की भूमिका उजागर की जाए।
देश यह जानना चाहता है कि मतदाता सूची में हुई कथित गड़बड़ियों के लिए कौन जिम्मेदार है। किसी भी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी घोषित करना न्याय नहीं होगा, लेकिन प्रमाणित अपराध को राजनीतिक संरक्षण देकर दबा देना उससे भी बड़ा अन्याय होगा।
जनता का वोट कोई खिलौना नहीं
लोकतंत्र की हत्या करने की साजिश साबित होती है, तो दोषियों को ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो भविष्य में किसी को जनता के मताधिकार से खिलवाड़ करने की हिम्मत न दे। उम्रकैद हो या कानून के दायरे में मृत्युदंड—सजा अपराध की गंभीरता और अदालत में साबित तथ्यों के आधार पर तय होनी चाहिए।
14 करोड़ वोट काटे जाने के आरोपों का जवाब चाहिए। वोट चोरी के आरोपों की निष्पक्ष जांच चाहिए। दोषियों की पहचान चाहिए। और यदि लोकतंत्र के खिलाफ गंभीर अपराध साबित होता है, तो दोषियों के लिए कठोरतम सजा—यहां तक कि कानूनन संभव होने पर फांसी—की मांग होनी चाहिए। क्योंकि सत्ता किसी की भी हो सकती है, लेकिन वोट जनता का है। जनता के वोट से विश्वासघात करने वालों को जवाब देना ही होगा।



