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ओपिनियन: जंतर-मंतर ने एक नायिका को जन्म दिया—नेहा बोरा, जिसने दूसरों के सपनों के लिए अपनी भूख तक भुला दी

एक पिता के भावुक शब्दों में एक बेटी का साहस, संघर्ष और इंसानियत की कहानी

ओपिनियन | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 अक्टूबर 2026

कुछ लोग इतिहास में अपनी जगह बड़े पदों, भाषणों या सत्ता के गलियारों से नहीं बनाते। वे अपनी पहचान तब बनाते हैं, जब दूसरों के दर्द को अपना दर्द समझकर उनके साथ खड़े हो जाते हैं। नेहा बोरा की कहानी भी ऐसी ही है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET परीक्षा में पेपर लीक के खिलाफ छात्रों के लिए आवाज उठाने वाली 29 वर्षीय नेहा ने केवल एक आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया, बल्कि यह सवाल भी खड़ा किया कि क्या आज के समाज में किसी अनजान व्यक्ति के टूटे हुए सपनों के लिए अपना सुख, आराम और सेहत दांव पर लगाने वाले लोग अब भी मौजूद हैं?

चेन्नई में रहने वाले के. शरद हक्सर ने नेहा के नाम लिखे अपने भावुक संदेश में एक पिता की नजर से इस संघर्ष को देखा है। यह किसी राजनीतिक भाषण की भाषा नहीं है। इसमें एक ऐसे पिता की बेचैनी है, जो अपनी बेटी को सुरक्षित देखना चाहता है, लेकिन दूसरी ओर एक ऐसी युवती को देखकर अभिभूत है, जिसने अपने परिवार से बाहर निकलकर सैकड़ों अनजान बच्चों के भविष्य को अपना सवाल बना लिया।

23 दिन का अनशन, लेकिन लड़ाई सिर्फ अपनी नहीं

नेहा बोरा उत्तराखंड के खटीमा से आती हैं। वह 29 वर्ष की हैं, जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में पीएचडी कर रही हैं और रंगमंच से भी जुड़ी हैं। NEET पेपर लीक के विरोध में वह उन छात्रों के साथ जंतर-मंतर पर बैठीं, जिनके लिए परीक्षा केवल एक प्रश्नपत्र नहीं, बल्कि वर्षों की मेहनत, परिवार की बचत और भविष्य की उम्मीद थी।

शरद हक्सर के संदेश के अनुसार, नेहा ने 23 दिनों तक अनशन किया। इस दौरान उनका वजन सात किलोग्राम से अधिक घट गया। आखिरी दिनों में डॉक्टरों को दिन में कई बार उनकी जांच करनी पड़ रही थी। अनशन के बाद नेहा ने बताया कि उनका शरीर खाना खाना तक भूल गया था और उन्हें दोबारा सामान्य भोजन शुरू करना पड़ा।

एक पिता के लिए इन पंक्तियों को पढ़ना आसान नहीं। हक्सर लिखते हैं कि जिस रात उन्होंने नेहा के संघर्ष के बारे में पढ़ा, उन्हें नींद नहीं आई। बार-बार उन्हें अपनी बेटी का चेहरा याद आता रहा—दिल्ली की गर्म सड़क पर बैठी हुई, कमजोर और थकी हुई।

उनके मन में एक स्वाभाविक सवाल उठा: अगर अपनी बेटी इस हालत में होती, तो क्या वह उसे अनशन जारी रखने देते? शायद नहीं। वह उसे समझाते, हाथ जोड़ते और कहते कि अब बस करो, कुछ खा लो।

लेकिन यहीं नेहा की कहानी एक अलग मोड़ लेती है। वह अपनी सेहत की कीमत समझने के बावजूद उन छात्रों के लिए डटी रहीं, जिनके भविष्य पर परीक्षा में गड़बड़ी के आरोपों ने सवाल खड़े कर दिए थे।

भूख से बड़ी थी दूसरों के दर्द की चिंता

नेहा का संघर्ष केवल अनशन तक सीमित नहीं रहा। हक्सर के संदेश के मुताबिक, अनशन खत्म होने के बाद भी वह आराम करने घर नहीं गईं। वह बिहार गईं, जहां 600 से अधिक गिरफ्तार छात्रों से मिलने की बात कही गई है।

यहां एक बुनियादी सवाल सामने आता है—आखिर एक व्यक्ति को उन लोगों के लिए इतना कुछ करने की प्रेरणा कहां से मिलती है, जिन्हें वह निजी तौर पर जानता भी नहीं?

हक्सर अपने अनुभव का जिक्र करते हुए लिखते हैं कि गुस्सा इंसान को जल्दी थका देता है। उनके अनुसार, केवल गुस्से के सहारे कोई 23 दिन तक भूखा रहकर दूसरों के लिए संघर्ष नहीं कर सकता। इतनी लंबी लड़ाई में साथ निभाने वाली ताकत शायद दूसरों के लिए महसूस किया गया प्यार है।

यही इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। नेहा की लड़ाई को केवल विरोध, नारे या राजनीतिक घटनाक्रम तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। यह उस संवेदना की भी कहानी है, जिसमें किसी अनजान छात्र का भविष्य भी उतना ही महत्वपूर्ण हो जाता है जितना अपना भविष्य।

फौजी परिवारों से मिली हिम्मत?

हक्सर अपने संदेश में नेहा के पिता की सैन्य पृष्ठभूमि का उल्लेख करते हैं। उन्हें अपनी पत्नी के बचपन की याद आती है, जिनके पिता भी सेना में थे। पोस्टिंग बदलने के साथ परिवार को बार-बार नए शहरों में जाना पड़ता था। उनकी पत्नी ने 13 स्कूलों में पढ़ाई की।

बार-बार नया स्कूल, नए दोस्त, नई जगह और फिर पुरानी दुनिया को पीछे छोड़ देना—यह अनुभव बच्चों को जल्दी ढलना सिखाता है। लेकिन इसके साथ बार-बार बिछड़ने का दर्द भी जुड़ा होता है।

हक्सर को अपनी पत्नी में जो साहस दिखाई देता है, वही उन्हें नेहा में भी नजर आता है। यह कहना कठिन है कि किसी व्यक्ति के संघर्ष का एकमात्र कारण उसका पारिवारिक परिवेश होता है, लेकिन जीवन के अनुभव हमारे भीतर धैर्य, अनुकूलन और कठिन परिस्थितियों से जूझने की क्षमता जरूर विकसित कर सकते हैं।

चेहरे पर स्याही फेंकी गई, लेकिन आवाज नहीं रुकी

हक्सर ने अपने संदेश में रांची की उस घटना का भी जिक्र किया है, जिसमें नेहा के चेहरे पर स्याही फेंके जाने और उन्हें देशद्रोही कहे जाने की बात कही गई। संदेश के मुताबिक, नेहा ने जवाब दिया कि दिल्ली में वह छर्रे और लाठियां झेल चुकी हैं, इसलिए स्याही उन्हें नहीं डरा सकती।

किसी व्यक्ति के विचारों से असहमति होना लोकतंत्र का हिस्सा है। लेकिन असहमति का जवाब अपमान या शारीरिक हमले से देना किसी स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद की पहचान नहीं हो सकता। यदि किसी आंदोलनकारी के खिलाफ आरोप हैं, तो उनका जवाब तथ्यों और तर्कों से दिया जाना चाहिए।

नेहा की प्रतिक्रिया उनके संकल्प को सामने रखती है। हालांकि, साहस का अर्थ यह नहीं कि किसी को अपनी सुरक्षा की अनदेखी करनी चाहिए। किसी आंदोलन की सफलता के लिए संघर्ष करने वालों का सुरक्षित और स्वस्थ रहना भी जरूरी है।

परिवार की चिंता और बेटी का फैसला

हक्सर बताते हैं कि नेहा के परिवार को उनके फैसलों से असहमति थी। लेकिन अनशन के दौरान उनकी मां जंतर-मंतर पहुंचीं। मां-बेटी के बीच क्या बातचीत हुई, यह वह नहीं जानते। फिर भी एक पिता होने के नाते वह उस दृश्य की कल्पना कर सकते हैं, जब कोई मां अपनी कमजोर पड़ती बेटी को सामने देखती है।

उस पल वैचारिक मतभेद छोटे पड़ सकते हैं। मन में सबसे पहले यही आता है कि बच्चा सुरक्षित रहे, स्वस्थ रहे और घर लौट आए।

नेहा ने अपने पिता से बातचीत नहीं होने की बात कही थी। हक्सर इस स्थिति पर कोई फैसला नहीं सुनाते। वह बस एक पिता की ओर से अपनी भावना व्यक्त करते हैं—नेहा, हमें तुम पर गर्व है। अब ठीक से खाना खाओ और अपनी सेहत का भी खयाल रखो।

उनके शब्दों में एक ऐसी आत्मीयता है, जो किसी राजनीतिक खेमे से नहीं आती। वह उस रिश्ते से आती है, जिसमें एक पिता अपनी बेटी के संघर्ष को समझने की कोशिश करता है, भले ही वह बेटी उसकी अपनी न हो।

हमें अपने बच्चों को क्या सिखाना चाहिए?

इस पूरे संदेश का सबसे गहरा सवाल आखिर में आता है। हम अपने बच्चों को सुरक्षित रखने, उन्हें अच्छी शिक्षा देने और जीवन में आगे बढ़ाने के लिए पूरी ताकत लगा देते हैं। लेकिन क्या हम उन्हें यह भी सिखाते हैं कि अपने रास्ते पर आगे बढ़ते हुए पीछे छूट गए लोगों को देखें? किसी टूटे हुए सपने को समझें? किसी ऐसे व्यक्ति के साथ खड़े हों, जिसके पास अपनी लड़ाई लड़ने के पर्याप्त साधन नहीं हैं?

और अगर हमारा बच्चा किसी दूसरे के लिए खड़ा हो जाए, तो हम क्या करेंगे? क्या हम केवल अपने डर के कारण उसे चुप रहने को कहेंगे, या उसकी सुरक्षा की चिंता करते हुए उसके भीतर की संवेदना को भी बचाए रखेंगे?

शरद हक्सर अपनी दूसरी बेटी होने की कल्पना करते हैं—नेहा जैसी बेटी। इसका अर्थ अपनी बेटी के लिए उनके प्यार में कमी नहीं है। बल्कि नेहा के संघर्ष ने उन्हें यह समझने का अवसर दिया कि माता-पिता होने का अर्थ केवल अपने बच्चे को दुनिया से बचाना नहीं, बल्कि उसके भीतर दूसरों के लिए खड़े होने का साहस विकसित करना भी है।

जंतर-मंतर ने एक नायिका को जन्म दिया

नेहा बोरा की कहानी को किसी एक आंदोलन की जीत या हार से नहीं मापा जाना चाहिए। NEET विवाद से जुड़े सवालों का समाधान जांच, जवाबदेही और संस्थागत सुधारों से ही होगा। किसी भी आरोप की सच्चाई का फैसला प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन इन सबके बीच नेहा ने एक मानवीय सवाल जरूर उठाया है—जब दूसरों के सपने टूटते हैं, तो क्या हम केवल दर्शक बने रहेंगे?

जंतर-मंतर ने नेहा को रातोंरात नायिका नहीं बनाया। उनकी कहानी में वह साहस दिखाई देता है, जो तब सामने आता है जब कोई व्यक्ति अपने निजी हितों से आगे बढ़कर दूसरों की तकलीफ को महसूस करता है। उनका संघर्ष यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल चुनावों, संसद और अदालतों से नहीं चलता; वह उन नागरिकों से भी मजबूत होता है, जो किसी अनजान व्यक्ति के अधिकारों के लिए खड़े होने का साहस रखते हैं।

शायद किसी समाज की असली उम्मीद यही है—हमारे बच्चे केवल सफल न बनें, संवेदनशील भी बनें। वे अपने लिए रास्ते बनाएं, लेकिन उन लोगों को भी न भूलें जिनके रास्ते बंद कर दिए गए हैं।

और नेहा से एक पिता की अपील भी उतनी ही जरूरी है: दूसरों के सपनों के लिए लड़ो, लेकिन अपनी सेहत को भी संभालकर रखो। तुम्हारी आवाज महत्वपूर्ण है, और तुम्हारा सुरक्षित रहना भी।

नोट: यह लेख के. शरद हक्सर के मूल अंग्रेज़ी संदेश के हिंदी अनुवाद और उसमें व्यक्त विचारों पर आधारित है। इसमें वर्णित व्यक्तिगत अनुभवों और घटनाओं का विवरण मूल संदेश के अनुसार प्रस्तुत किया गया है।

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