अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 8 अक्टूबर 2026
अमेरिका में पढ़ाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों, खासकर भारतीय और चीनी छात्रों के लिए ट्रंप प्रशासन की नई प्रस्तावित नीति बड़ा झटका साबित हो सकती है। अमेरिकी Department of Homeland Security (DHS) ने एक प्रस्ताव रखा है जिसके तहत F-1 वीजा पर अमेरिका में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों को पढ़ाई के दौरान या उसके बाद अपने क्षेत्र में काम करने की अनुमति देने वाले Optional Practical Training यानी OPT के लिए कम से कम 70,000 डॉलर का शुल्क देना पड़ सकता है। इसके अलावा अतिरिक्त कार्य-प्रशिक्षण के लिए 30,000 डॉलर तक का शुल्क प्रस्तावित किया गया है। यह व्यवस्था अभी प्रस्ताव के स्तर पर है और अंतिम नियम बनने से पहले सार्वजनिक टिप्पणियों की प्रक्रिया से गुजरेगी। मौजूदा व्यवस्था में OPT से जुड़ा शुल्क करीब 500 डॉलर बताया गया है, ऐसे में प्रस्तावित राशि मौजूदा लागत की तुलना में बेहद बड़ी छलांग है।
OPT अमेरिकी विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विदेशी छात्रों के लिए बेहद महत्वपूर्ण व्यवस्था है। इसके तहत F-1 वीजा वाले छात्र अपनी पढ़ाई के दौरान और कुछ परिस्थितियों में पढ़ाई पूरी करने के बाद अपने अध्ययन से जुड़े क्षेत्र में व्यावहारिक काम का अनुभव हासिल कर सकते हैं। STEM यानी Science, Technology, Engineering और Mathematics जैसे क्षेत्रों में डिग्री हासिल करने वाले छात्रों के लिए यह अवसर और महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि उन्हें सामान्य OPT अवधि के अतिरिक्त प्रशिक्षण का अवसर मिल सकता है। दशकों से OPT को अंतरराष्ट्रीय छात्रों के लिए अमेरिकी शिक्षा और रोजगार के बीच एक महत्वपूर्ण पुल माना जाता रहा है। कई छात्र इसी अनुभव के आधार पर आगे चलकर H-1B वीजा के जरिए अमेरिका में पेशेवर करियर बनाने की कोशिश करते हैं।
सबसे बड़ा सवाल अब यह है कि यदि यह प्रस्ताव अंतिम नियम बनता है तो इसका असर उन भारतीय छात्रों पर कितना पड़ेगा जो अमेरिका की यूनिवर्सिटियों में पढ़ाई करने के बाद वहीं अपने करियर की शुरुआत करने की योजना बना रहे हैं। भारत और चीन लंबे समय से अमेरिका के विश्वविद्यालयों और तकनीकी क्षेत्र के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिभाओं के प्रमुख स्रोत रहे हैं। बड़ी संख्या में भारतीय छात्र इंजीनियरिंग, कंप्यूटर साइंस, डेटा, टेक्नोलॉजी, मेडिकल और दूसरे विशेषज्ञता वाले क्षेत्रों में उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए अमेरिका जाते हैं। पढ़ाई के बाद OPT के जरिए उन्हें अमेरिकी कंपनियों में व्यावहारिक अनुभव मिलता है और कई मामलों में यही अनुभव आगे H-1B रोजगार व्यवस्था में प्रवेश का आधार बनता है। प्रस्तावित 70,000 डॉलर की फीस ऐसे छात्रों के लिए आर्थिक बाधा को बहुत बड़ा बना सकती है, खासकर उन विद्यार्थियों के लिए जिनके परिवार पहले ही अमेरिका में उच्च शिक्षा की भारी फीस और रहने के खर्च का बोझ उठा रहे हैं।
अमेरिकी सरकार का कहना है कि इस प्रस्ताव का उद्देश्य विदेशी छात्रों को परेशान करना नहीं, बल्कि व्यवस्था में धोखाधड़ी को रोकना, आव्रजन प्रणाली की विश्वसनीयता मजबूत करना और अमेरिकी कामगारों के हितों की रक्षा करना है। DHS के मुताबिक प्रस्तावित शुल्क यह सुनिश्चित करने की दिशा में है कि नियोक्ता, छात्र और शिक्षण संस्थान F-1 वीजा के तहत अनुमत गतिविधियों के अनुरूप ही प्रशिक्षण कार्यक्रमों का इस्तेमाल करें। ट्रंप प्रशासन पहले से ही विदेशी वीजा धारकों को लेकर अधिक सख्त नीतियों की दिशा में आगे बढ़ रहा है और OPT पर प्रस्तावित यह शुल्क उसी व्यापक नीति का हिस्सा माना जा रहा है।
यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब ट्रंप प्रशासन की आव्रजन और विदेशी छात्रों से जुड़ी नीतियों को लेकर अमेरिका में लगातार बहस चल रही है। दिलचस्प बात यह भी है कि 2024 के राष्ट्रपति चुनाव अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप ने विदेशी छात्रों को अमेरिका में पढ़ाई पूरी करने के बाद देश में बने रहने और आगे बढ़ने के अधिक अवसर देने की बात कही थी। उन्होंने यहां तक सुझाव दिया था कि अमेरिका में कॉलेज से स्नातक होने वाले विदेशी छात्रों को ग्रीन कार्ड देने की व्यवस्था आसान बनाई जानी चाहिए। लेकिन सत्ता में लौटने के बाद उनकी सरकार ने वीजा और विदेशी नागरिकों से संबंधित कई क्षेत्रों में सख्ती बढ़ाई है।
प्रस्ताव को लेकर कानूनी चुनौती की संभावना भी जताई जा रही है। आव्रजन और शिक्षा नीति से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह नियम अंतिम रूप लेता है तो अदालतों में इसे चुनौती दी जा सकती है। Reuters के अनुसार प्रस्ताव पर अभी 30 दिनों तक सार्वजनिक टिप्पणियां आमंत्रित की जाएंगी और अंतिम रूप दिए जाने के बाद नियम को लागू करने से पहले 60 दिन का समय देने का प्रस्ताव है, ताकि विश्वविद्यालयों, छात्रों और नियोक्ताओं को नई व्यवस्था के लिए तैयारी का अवसर मिल सके।
इस प्रस्ताव का असर केवल छात्रों की जेब तक सीमित नहीं हो सकता। अमेरिकी विश्वविद्यालयों के लिए भी अंतरराष्ट्रीय छात्र महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे उच्च शिक्षा व्यवस्था में बड़ी संख्या में आते हैं और कई संस्थानों की आर्थिक व्यवस्था में योगदान देते हैं। यदि अमेरिका में पढ़ाई के बाद काम करने का रास्ता अत्यधिक महंगा और जटिल होता है तो कुछ प्रतिभाशाली विद्यार्थी दूसरे देशों की ओर रुख कर सकते हैं। ऐसे में यह सवाल भी उठेगा कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था को वैश्विक प्रतिभाओं से मिलने वाले लाभ और घरेलू रोजगार की सुरक्षा के बीच ट्रंप प्रशासन किस तरह संतुलन कायम करता है।
भारतीय छात्रों के लिए यह खबर इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका लंबे समय से उच्च शिक्षा, टेक्नोलॉजी और रिसर्च के क्षेत्र में भारतीय प्रतिभाओं के प्रमुख गंतव्यों में रहा है। अमेरिका की बड़ी टेक कंपनियों में भारतीय मूल के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों की मौजूदगी इस वैश्विक प्रतिभा प्रवाह की तस्वीर पेश करती है। H-1B व्यवस्था ने भी दशकों तक दुनिया के विभिन्न देशों, खासकर भारत और चीन के कुशल पेशेवरों को अमेरिकी रोजगार बाजार से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। OPT इसी पूरी यात्रा की शुरुआती महत्वपूर्ण कड़ियों में से एक है।
अब सबकी नजरें प्रस्ताव पर होने वाली सार्वजनिक टिप्पणियों और उसके बाद की कानूनी प्रक्रिया पर होंगी। फिलहाल 70,000 डॉलर का शुल्क अंतिम नियम नहीं है, लेकिन प्रस्ताव ने अमेरिका में पढ़ाई और करियर का सपना देखने वाले हजारों अंतरराष्ट्रीय छात्रों के बीच चिंता जरूर बढ़ा दी है। भारतीय छात्रों के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अमेरिका की शिक्षा के बाद काम करने का रास्ता अब इतना महंगा हो जाएगा कि सामान्य मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए वहां पढ़ाई के बाद करियर बनाना और मुश्किल हो जाए। आने वाले हफ्तों में इस प्रस्ताव पर अमेरिकी विश्वविद्यालयों, छात्रों, नियोक्ताओं और आव्रजन विशेषज्ञों की प्रतिक्रियाएं इस बहस की दिशा तय कर सकती हैं।
ABC NATIONAL NEWS की नजर में यह सिर्फ 70,000 डॉलर की फीस की खबर नहीं है—यह अमेरिका में पढ़ाई करने वाले अंतरराष्ट्रीय छात्रों के भविष्य, वैश्विक प्रतिभा की आवाजाही और अमेरिका की बदलती आव्रजन नीति से जुड़ा बड़ा सवाल है।



