राष्ट्रीय/राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अक्टूबर
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष के आंदोलन के बीच चुनाव आयोग ने अब अपने रुख को स्पष्ट किया है। INDIA ब्लॉक के सांसदों के आठ घंटे से अधिक चले धरने के एक दिन बाद निर्वाचन आयोग ने कहा कि विपक्षी सांसदों ने पूरी चुनाव आयोग के साथ ऐसी जगह बैठक करने की मांग की थी, जो आयोग के परिसर से बाहर थी। ECI के अनुसार, राजनीतिक प्रतिनिधिमंडलों के साथ बैठक आयोग के अपने परिसर में करने का प्रोटोकॉल है और इसी वजह से बाहर प्रस्तावित स्थल पर पूरी चुनाव आयोग के साथ बैठक की मांग स्वीकार नहीं की जा सकी। आयोग ने यह भी कहा कि उसने विपक्षी सांसदों का ज्ञापन लेने के लिए प्रस्तावित स्थल पर अपने ड्यूटी पर मौजूद वरिष्ठतम अधिकारी को भेजने की पेशकश की थी, लेकिन प्रदर्शनकारी नेताओं ने इस विकल्प को भी स्वीकार नहीं किया।
चुनाव आयोग का यह स्पष्टीकरण ऐसे समय आया है जब मंगलवार को राहुल गांधी के नेतृत्व में INDIA ब्लॉक के सांसदों ने संसद से निर्वाचन आयोग मुख्यालय की ओर मार्च किया था। विपक्षी सांसदों की मांग थी कि उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों से सीधे मुलाकात करने का अवसर दिया जाए। पुलिस ने मार्च को रास्ते में रोक दिया, जिसके बाद विपक्षी सांसद आकाशवाणी भवन परिसर में धरने पर बैठ गए। राहुल गांधी, प्रियंका गांधी वाड्रा और कई अन्य नेताओं को हिरासत में लिया गया। बाद में पुलिस ने राहुल गांधी और अन्य कांग्रेस नेताओं को रिहा कर दिया। पूरे घटनाक्रम ने चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच बढ़ते टकराव को और सामने ला दिया है।
ECI का कहना है कि उसने विपक्ष को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया था। आयोग के मुताबिक, उसके वरिष्ठतम अधिकारी को मौके पर भेजकर सांसदों से ज्ञापन लेने का प्रस्ताव दिया गया था। आयोग ने इसे असाधारण कदम बताते हुए कहा कि इसके बावजूद विपक्षी नेताओं ने इसे स्वीकार नहीं किया। दूसरी ओर विपक्ष का तर्क है कि उसका उद्देश्य केवल ज्ञापन सौंपना नहीं था, बल्कि चुनाव आयुक्तों के सामने सीधे अपने सवाल रखना था। विपक्षी नेताओं का कहना है कि जब मामला मतदाता सूची, SIR और चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता से जुड़ा है, तो केवल ज्ञापन लेने के बजाय चुनाव आयोग को विपक्षी सांसदों से संवाद करना चाहिए।
यहीं से पूरा विवाद और गंभीर हो जाता है। अगर विपक्ष के आरोप गलत हैं तो चुनाव आयोग के पास उन्हें तथ्यों के साथ खारिज करने का पूरा अधिकार और अवसर है, लेकिन क्या देश के प्रमुख विपक्षी दलों के निर्वाचित सांसदों के साथ सीधे संवाद का रास्ता बंद होना लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए बेहतर स्थिति है? दूसरी तरफ ECI यह स्पष्ट कर रहा है कि उसकी ओर से संवाद का रास्ता पूरी तरह बंद नहीं किया गया था और बाहर जाकर पूरे आयोग की बैठक की मांग निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुरूप नहीं थी। इसलिए अब विवाद केवल ‘बैठक हुई या नहीं’ का नहीं, बल्कि इस बात का है कि संवैधानिक संस्था और विपक्ष के बीच संवाद का उचित मंच और तरीका क्या होना चाहिए।
SIR को लेकर विपक्ष पहले से ही चुनाव आयोग पर गंभीर आरोप लगा रहा है। मतदाता सूची में बदलाव, नाम हटाए जाने और Form-6 तथा Form-7 को लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठा रहे हैं। इसी बीच सुप्रीम कोर्ट में भी चुनावी प्रक्रिया और Form-6 से जुड़े मुद्दों पर सुनवाई का मामला सामने आया है। चुनाव आयोग ने अपने स्तर पर कई आरोपों और दावों को खारिज करते हुए स्पष्टीकरण जारी किए हैं। ऐसे माहौल में चुनाव आयोग और विपक्ष के बीच सीधा संवाद राजनीतिक तनाव को कम कर सकता था। लेकिन मंगलवार की घटनाओं ने इसके उलट दोनों पक्षों के बीच दूरी और बढ़ा दी।
विपक्ष के लिए यह आंदोलन अब केवल CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक सीमित नहीं दिख रहा। राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेता SIR को लोकतंत्र और मताधिकार से जोड़कर लगातार बड़ा राजनीतिक मुद्दा बना रहे हैं। वहीं BJP और चुनाव आयोग का कहना है कि विपक्ष राजनीतिक लाभ के लिए चुनाव प्रक्रिया पर संदेह पैदा कर रहा है। मंगलवार को BJP ने राहुल गांधी के प्रदर्शन को राजनीतिक ड्रामा बताते हुए उनके आरोपों को खारिज किया था। ऐसे में अब ECI का नया बयान विपक्ष के उस आरोप का जवाब है कि चुनाव आयोग उनसे बात करने को तैयार नहीं था।
लेकिन विपक्ष के लिए सबसे बड़ा सवाल अब भी वही है—जब देश के इतने बड़े राजनीतिक दलों के सांसद चुनाव आयोग के सामने सामूहिक रूप से अपने सवाल रखना चाहते हैं, तो क्या उन्हें सिर्फ ज्ञापन सौंपने तक सीमित कर देना पर्याप्त है? और चुनाव आयोग के लिए भी उतना ही बड़ा सवाल है—जब उसकी निष्पक्षता पर राजनीतिक दलों के एक बड़े हिस्से का भरोसा कमजोर होने का दावा किया जा रहा है, तो क्या अधिकतम संवाद और पारदर्शिता ही संस्था के पक्ष में सबसे मजबूत जवाब नहीं हो सकता?
मंगलवार की हिरासत और अब बुधवार सुबह सामने आया ECI का स्पष्टीकरण इस पूरे विवाद को एक नए चरण में ले गया है। विपक्ष कह रहा है कि वह जवाब चाहता है, चुनाव आयोग कह रहा है कि उसने प्रक्रिया के तहत रास्ता दिया था। अब असली परीक्षा यह है कि दोनों पक्ष टकराव से आगे बढ़कर संवाद की मेज तक पहुंचते हैं या नहीं।



