राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 5 अक्टूबर 2026
Special Intensive Revision यानी SIR को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर अब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त एस.वाई. कुरैशी ने ही गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। कुरैशी के मुताबिक SIR के दौरान करीब 13.37 करोड़ नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से गायब होने के बाद अब चुनाव आयोग ने उन्हीं पात्र मतदाताओं को दोबारा पहचानकर सूची में शामिल कराने के निर्देश दिए हैं। उन्होंने आयोग के इस कदम का स्वागत तो किया, लेकिन साथ ही सबसे बुनियादी सवाल उठाया—जो व्यक्ति पहले से मतदाता था और जिसका नाम गलत तरीके से हट गया, उसे नया मतदाता मानकर दोबारा पंजीकरण क्यों कराया जा रहा है?
कुरैशी का कहना है कि पहली बार मतदाता बनने वाले व्यक्ति के लिए Form-6 है, लेकिन जिस मतदाता का नाम गलती से हट गया है, उसकी स्थिति अलग है। उनके अनुसार ऐसे मतदाता के लिए बहाली की अलग प्रक्रिया होनी चाहिए। उन्होंने सुझाव दिया कि कानून मंत्रालय Registration of Electors Rules, 1960 में संशोधन कर कुछ घंटों में Form-6X जैसा अलग फॉर्म बनाया जा सकता है, जिसके जरिए गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं का पंजीकरण बहाल किया जाए।
सबसे बड़ा सवाल: गलत हटे वोटर से गलत घोषणा क्यों?
कुरैशी ने चुनावी प्रक्रिया की उस विडंबना पर सवाल उठाया है जिसमें पहले से मतदाता रहे व्यक्ति को दोबारा ऐसा आवेदन करने की स्थिति में डाल दिया जाता है, मानो वह पहली बार मतदाता बन रहा हो। उनका सवाल बेहद सीधा है—नागरिकों को ऐसी स्थिति में क्यों डाला जाए जहां अपना पुराना चुनावी पंजीकरण वापस पाने के लिए उन्हें ऐसी घोषणा पर हस्ताक्षर करना पड़े जो तथ्यात्मक रूप से गलत हो और इसलिए कानूनी रूप से भी सवालों के घेरे में आ सकती है?
यानी विवाद सिर्फ नाम कटने का नहीं है। सवाल यह है कि जिस नागरिक का वोट पहले से मौजूद था, उसके अधिकार की बहाली के लिए कानून में सही और अलग रास्ता क्यों नहीं बनाया जा रहा?
13 करोड़ नाम गायब होने के बाद बदला आयोग का रुख
कुरैशी के मुताबिक चुनाव आयोग की हालिया हिदायतें SIR को लेकर उसके पहले के रुख में बड़ा बदलाव दिखाती हैं। उनका कहना है कि करीब 13 करोड़ नाम ड्राफ्ट मतदाता सूचियों से गायब होने के बाद आयोग ने अब अपने तंत्र को उन पात्र मतदाताओं की पहचान और पुनः नामांकन के लिए सक्रिय किया है जिन्हें गलत तरीके से सूची से बाहर कर दिया गया हो सकता है।
29 सितंबर को जारी निर्देशों और 1 अक्टूबर को मुख्य निर्वाचन अधिकारियों के साथ बैठक में आयोग ने 20 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों, जहां SIR पूरा हो चुका है, वहां विशेष नामांकन अभियान चलाने को कहा है। अधिकारियों को SIR से पहले और बाद की मतदाता सूचियों की तुलना करने, गायब मतदाताओं की पहचान करने और उनके घर जाकर पुनः नामांकन में मदद करने के निर्देश दिए गए हैं। राजनीतिक दलों को भी इस प्रक्रिया में सहयोग करने की अनुमति दी गई है।
पहले नाम हटे, अब घर-घर खोजे जाएंगे वोटर
यही बदलाव SIR पर सबसे बड़ा राजनीतिक और प्रशासनिक सवाल खड़ा करता है। अगर आयोग अब खुद मशीनरी को यह निर्देश दे रहा है कि पुरानी और नई मतदाता सूचियों की तुलना करके गायब पात्र मतदाताओं को खोजा जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि ऐसे मतदाता पहले सूची से बाहर कैसे हुए?
और उससे भी बड़ा सवाल—क्या मतदाता को अपना वोट बचाने के लिए पहले खुद यह साबित करना होगा कि वह वही नागरिक है जिसका नाम पहले से मतदाता सूची में था?
कुरैशी का तर्क इसी बिंदु पर केंद्रित है। उनके मुताबिक गलत तरीके से हटाए गए मतदाता को नए मतदाता की श्रेणी में डालना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि प्रक्रिया को और जटिल बना सकता है।
SIR की पूरी प्रक्रिया पर बढ़ता दबाव
Form-6 को लेकर सुप्रीम कोर्ट में उठे सवालों और अब पूर्व CEC की इस टिप्पणी ने SIR की प्रक्रिया को लेकर बहस और तेज कर दी है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट यह देख रहा है कि Form-6 में अतिरिक्त प्रावधान किसने और किस अधिकार के तहत जोड़े। दूसरी तरफ पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त कह रहे हैं कि गलत तरीके से हटाए गए पुराने मतदाताओं के लिए अलग बहाली व्यवस्था होनी चाहिए।
यह सवाल अब सीधे चुनावी अधिकार से जुड़ गया है—मतदाता सूची से नाम हटाना आसान है या वापस जोड़ना?
लोकतंत्र में किसी नागरिक का वोट सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि उसका संवैधानिक राजनीतिक अधिकार है। इसलिए SIR की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं हो सकता कि नई सूची कितनी साफ दिखाई देती है। असली कसौटी यह होगी कि कितने वैध मतदाता बिना गलती के सूची में बने रहे और जिनका नाम गलत तरीके से हटा, उन्हें कितनी आसानी और बिना किसी झूठी घोषणा के उनका अधिकार वापस मिला।
यही वह सवाल है जिस पर अब चुनाव आयोग को सिर्फ प्रशासनिक आदेश नहीं, बल्कि स्पष्ट कानूनी जवाब देना होगा।



