शिक्षा/ पंजाब | ABC NATIONAL NEWS | चंडीगढ़ | 4 अक्टूबर 2026
पंजाब में सरकारी स्कूलों की तस्वीर बदलने और शिक्षा के क्षेत्र में राज्य को शीर्ष पर पहुंचाने के मुख्यमंत्री भगवंत मान के दावों के बीच आम आदमी पार्टी के भीतर से ही एक ऐसा सवाल उठा है, जिसने सरकार के दावों पर नई बहस छेड़ दी है। बठिंडा की मौड़ विधानसभा सीट से AAP विधायक सुखवीर सिंह मैसरखाना ने अपने इलाके के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की भारी कमी का मुद्दा उठाया और आरोप लगाया कि बार-बार अनुरोध के बावजूद सरकार ने समस्या का समाधान नहीं किया। इसके बाद पार्टी ने उन्हें निलंबित कर दिया। सवाल अब केवल एक विधायक के निलंबन का नहीं है—सवाल यह है कि अगर सरकारी स्कूलों में शिक्षक ही पर्याप्त नहीं हैं, तो शिक्षा व्यवस्था के चमकदार दावों की जमीन पर असली तस्वीर क्या है?
मुख्यमंत्री के दावे और विधायक की शिकायत आमने-सामने
यह घटनाक्रम उस समय सामने आया जब मुख्यमंत्री भगवंत मान अपनी सरकार के कामकाज का बचाव करते हुए पंजाब के विकास और शिक्षा व्यवस्था में सुधार के बड़े दावे कर रहे थे। मुख्यमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने महज साढ़े चार साल में कांग्रेस और अकाली दल की दो दशकों की सरकारों से ज्यादा विकास कार्य किए हैं। उन्होंने सरकारी स्कूलों के बदलाव और शिक्षा के क्षेत्र में पंजाब के शीर्ष स्थान पर पहुंचने को सरकार की उपलब्धियों के तौर पर पेश किया। लेकिन उसी समय उनकी पार्टी के विधायक सुखवीर सिंह मैसरखाना ने अपने निर्वाचन क्षेत्र की जमीनी तस्वीर को लेकर सवाल खड़े कर दिए। उनका आरोप था कि कुछ सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी लंबे समय से बनी हुई है और उन्होंने इस समस्या को सरकार के सामने कई बार उठाया, लेकिन पर्याप्त कार्रवाई नहीं हुई।
यहीं से पंजाब की राजनीति में एक दिलचस्प टकराव पैदा होता है—एक तरफ सरकार का दावा कि शिक्षा व्यवस्था में बड़ा परिवर्तन हो चुका है, दूसरी तरफ सत्तारूढ़ दल का अपना विधायक यह कह रहा है कि उसके क्षेत्र के सरकारी स्कूल शिक्षक संकट से जूझ रहे हैं। दोनों तस्वीरें एक साथ सच नहीं हो सकतीं, जब तक सरकार यह स्पष्ट न करे कि किन स्कूलों में कितने शिक्षकों की कमी है, विधायक की शिकायत पर क्या कार्रवाई हुई और यदि समस्या वास्तव में मौजूद नहीं थी तो विधायक को पार्टी के स्तर पर निलंबित करने की नौबत क्यों आई।
विधायक ने क्या कहा?
मैसरखाना ने शनिवार को आरोप लगाया कि उनके निर्वाचन क्षेत्र के कुछ सरकारी स्कूलों में शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए उन्होंने बार-बार सरकार से अनुरोध किया था। लेकिन उनकी शिकायतों का समाधान नहीं हुआ। एक निर्वाचित विधायक के लिए अपने क्षेत्र के स्कूलों में शिक्षकों की कमी का मुद्दा उठाना स्वाभाविक रूप से स्थानीय जनता की समस्या को विधानसभा और सरकार तक पहुंचाने की जिम्मेदारी का हिस्सा है। ऐसे में उनके निलंबन ने राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
कांग्रेस और विपक्षी दल अब इस घटनाक्रम को सरकार के शिक्षा मॉडल पर हमला करने के मौके के तौर पर इस्तेमाल कर सकते हैं। क्योंकि सवाल सीधा है—क्या पंजाब में सरकार की आलोचना या अपनी विधानसभा के वास्तविक मुद्दे उठाना पार्टी अनुशासन के खिलाफ माना जाएगा?
शिक्षा मॉडल पर सबसे बड़ा सवाल
पंजाब सरकार लगातार सरकारी स्कूलों में सुधार, आधुनिक सुविधाओं और शिक्षा के स्तर में बदलाव की बात करती रही है। लेकिन स्कूल की सबसे बुनियादी जरूरत शिक्षक है। स्मार्ट क्लासरूम, नई इमारतें, डिजिटल सुविधाएं और अन्य योजनाएं अपनी जगह हैं, लेकिन यदि किसी स्कूल में विषयवार पर्याप्त शिक्षक उपलब्ध नहीं हैं, तो विद्यार्थियों की पढ़ाई सीधे प्रभावित होती है।
यही वजह है कि मैसरखाना का आरोप महज एक राजनीतिक बयान नहीं माना जा सकता। इसे आंकड़ों के साथ परखा जाना चाहिए। सरकार को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि पंजाब के सरकारी स्कूलों में स्वीकृत शिक्षकों के कितने पद हैं, कितने भरे हुए हैं और कितने पद खाली हैं। मौड़ विधानसभा क्षेत्र में कितने स्कूल शिक्षक संकट से जूझ रहे हैं और विधायक द्वारा शिकायत किए जाने के बाद शिक्षा विभाग ने क्या कदम उठाए—इन सवालों का जवाब सामने आना जरूरी है।
पहले भी उठते रहे हैं सवाल
The Hindu की रिपोर्ट के अनुसार, मैसरखाना ऐसे पहले AAP विधायक नहीं हैं जिन्होंने पार्टी सरकार की कार्यप्रणाली या नीतियों को लेकर सवाल उठाए हों। इसका मतलब यह है कि यह मामला केवल एक विधायक और उसके निलंबन तक सीमित नहीं है। यह सत्तारूढ़ दल के भीतर उठ रहे असंतोष और जमीनी स्तर पर सामने आने वाली शिकायतों की ओर भी संकेत करता है।
लोकतंत्र में सत्तारूढ़ दल के विधायक केवल सरकार के समर्थक नहीं होते; वे अपने निर्वाचन क्षेत्र के प्रतिनिधि भी होते हैं। जनता ने उन्हें अपने इलाके की समस्याएं उठाने के लिए चुना है। इसलिए यदि कोई विधायक अपने क्षेत्र में शिक्षकों की कमी का सवाल उठाता है, तो आदर्श स्थिति में सरकार को शिकायत की जांच कराकर तथ्य सामने रखने चाहिए। यदि आरोप गलत हैं तो आंकड़ों के साथ जवाब दिया जा सकता है और यदि सही हैं तो समस्या दूर की जा सकती है।
अब सरकार से जवाब की बारी
मैसरखाना के निलंबन के बाद पंजाब की शिक्षा व्यवस्था को लेकर राजनीतिक सवाल और तीखे होंगे। सरकार के सामने अब दो मोर्चे हैं—एक तरफ अपने शिक्षा संबंधी उपलब्धियों के दावों को आंकड़ों के साथ साबित करना और दूसरी तरफ यह स्पष्ट करना कि शिक्षक संकट का मुद्दा उठाने वाले विधायक के खिलाफ पार्टी कार्रवाई क्यों जरूरी समझी गई।
आखिर पंजाब के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे किसी राजनीतिक दल के नहीं, राज्य के भविष्य हैं। उनके स्कूल में शिक्षक हैं या नहीं, यह सवाल पार्टी लाइन से ऊपर होना चाहिए। शिक्षा पर दावा जितना बड़ा होगा, जमीन पर उसकी जांच भी उतनी ही कड़ी होगी।
अब पंजाब की जनता के सामने भी एक सीधा सवाल है—क्या सरकारी स्कूलों की असली कामयाबी चमकती तस्वीरों और बड़े दावों से तय होगी, या हर स्कूल में पर्याप्त शिक्षक और बच्चों की पढ़ाई से?


