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SIR पर अब स्वतंत्र न्यायिक जांच! पूर्व जजों की कमेटी करेगी चुनावी रोल की पूरी पड़ताल

राजनीति/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 3 अक्टूबर 2026

SIR को लेकर देश में बढ़ते विवाद के बीच अब मामला एक नए और गंभीर मोड़ पर पहुंच गया है। Lawyers’ Association for Constitution (LAFC) ने चुनाव आयोग की Special Intensive Revision यानी SIR के बाद पैदा हुए सवालों की स्वतंत्र जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के पांच पूर्व जजों का पैनल गठित किया है। पैनल SIR की संवैधानिक और कानूनी वैधता से लेकर इसकी प्रक्रिया और पात्र मतदाताओं पर पड़े प्रभाव की जांच करेगा।

पूर्व जजों की कमेटी, चुनावी प्रक्रिया पर सीधा सवाल

LAFC के मुताबिक यह पहल नागरिकों की ओर से SIR की डिजाइन, उसके क्रियान्वयन और उसके परिणामों को लेकर उठाई गई चिंताओं के बाद की गई है। यानी अब सवाल सिर्फ राजनीतिक मंचों और सड़कों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूर्व न्यायाधीशों का एक स्वतंत्र पैनल भी इस पूरी प्रक्रिया की कानूनी और संवैधानिक कसौटी पर जांच करेगा।

पैनल की अध्यक्षता पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस मदन बी. लोकुर करेंगे। उनके साथ पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस ए.के. पटनायक, जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस बदर दुर्रेज अहमद, तथा पूर्व हाईकोर्ट जज जस्टिस रेखा शर्मा और जस्टिस अंजना प्रकाश शामिल हैं।

अब जांच होगी—SIR ने किसे बचाया, किसे बाहर किया?

पैनल के सामने सबसे बड़ा सवाल यही रहेगा कि SIR की प्रक्रिया में हर पात्र मतदाता का नाम सुरक्षित रहा या नहीं और अपात्र नामों को हटाने की प्रक्रिया कानून और संवैधानिक सुरक्षा उपायों के अनुरूप हुई या नहीं।

LAFC ने कहा है कि पैनल SIR की संवैधानिक और वैधानिक वैधता, कार्यप्रणाली तथा पात्र मतदाताओं पर उसके समग्र प्रभाव का स्वतंत्र मूल्यांकन करेगा।

देशभर में होंगी सार्वजनिक सुनवाई

यह जांच सिर्फ कागजों तक सीमित रहने वाली नहीं है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार पैनल देश के अलग-अलग हिस्सों में सार्वजनिक सुनवाई करेगा। प्रभावित मतदाता, नागरिक समाज संगठन और विशेषज्ञ अपनी बात पैनल के सामने रख सकेंगे। इसके अलावा SIR के दौरान मतदाता सूची में हुए नामों के जोड़ और हटाए जाने से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन करने के लिए एक अलग शोध इकाई भी बनाई जाएगी।

कानूनी टीम संबंधित कानूनों, अधिसूचनाओं और सत्यापन की प्रक्रियाओं की भी जांच करेगी, ताकि यह देखा जा सके कि मतदाता सूची में बदलाव के दौरान संवैधानिक सुरक्षा उपायों का पालन हुआ या नहीं।

दिसंबर तक रिपोर्ट का लक्ष्य

इस स्वतंत्र आयोग की अंतिम रिपोर्ट दिसंबर 2026 तक सार्वजनिक करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका मतलब है कि आने वाले महीनों में SIR को लेकर देशभर से सामने आने वाली शिकायतों और दस्तावेजों की व्यवस्थित पड़ताल होगी।

सवाल अब सिर्फ राजनीति का नहीं

SIR को लेकर चल रही राजनीतिक बहस के बीच पूर्व जजों की यह पहल चुनावी प्रक्रिया पर उठ रहे सवालों को एक अलग कानूनी और संवैधानिक मंच देती है।

चुनाव में वोट डालने का अधिकार लोकतांत्रिक व्यवस्था की बुनियादी कड़ी है। इसलिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब रिकॉर्ड, कानून और पारदर्शी प्रक्रिया के आधार पर मिलना जरूरी है।

अब निगाहें इस बात पर होंगी कि यह स्वतंत्र पैनल देशभर में क्या सुनता है, किन दस्तावेजों और आंकड़ों की जांच करता है और दिसंबर में उसकी रिपोर्ट SIR की प्रक्रिया को लेकर क्या निष्कर्ष सामने रखती है।

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