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पार्टियां तोड़ने, पार्टियां हथियाने और लोकतंत्र को खत्म करने वाले गिरोह का पर्दाफाश; ज्ञानेश को जेल भेजा जाए: उद्धव

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 2 अक्टूबर 2026

महाराष्ट्र की राजनीति से चुनाव आयोग के खिलाफ विरोध की आवाज अब और तीखी हो गई है। शिवसेना (UBT) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर गंभीर आरोप लगाते हुए उन्हें तत्काल जेल भेजने की मांग की है। वायरल हो रहे बयान में ठाकरे ने आरोप लगाया कि “पार्टियां तोड़ने, पार्टियां हथियाने और लोकतंत्र को खत्म करने वाले गिरोह का पर्दाफाश हो गया है।” ये ठाकरे के राजनीतिक आरोप हैं; इनके तथ्यात्मक सत्यापन का अंतिम आधार संबंधित दस्तावेज और जांच ही होंगे।

ज्ञानेश कुमार को लेकर विपक्ष और विभिन्न नागरिक समूहों की आपत्तियां ऐसे समय तेज हुई हैं, जब SIR और मतदाता सूची में बदलाव को लेकर चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर लगातार सवाल उठ रहे हैं। निर्वाचन आयोग ने अपने ऊपर लगे आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि उसकी प्रक्रियाएं कानून और निर्धारित नियमों के अनुसार चल रही हैं।

2 अक्टूबर को सड़कों पर विरोध

आज गांधी जयंती के दिन मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ देश के अलग-अलग हिस्सों में विरोध प्रदर्शन की घोषणाएं हुई हैं। मुंबई में CJP ने ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और उनके खिलाफ कार्रवाई की मांग को लेकर ‘जेल भरो आंदोलन’ का ऐलान किया है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर भी विरोध का आह्वान किया गया है।

दिल्ली में प्रस्तावित प्रदर्शन को लेकर सुरक्षा व्यवस्था भी कड़ी की गई है। रिपोर्टों के अनुसार, प्रशासन ने प्रदर्शन को लेकर प्रतिबंधात्मक कदम उठाए हैं।

उद्धव-राज ठाकरे का भी 4 अक्टूबर को मार्च

महाराष्ट्र में चुनाव आयोग के खिलाफ राजनीतिक लामबंदी का एक और बड़ा कार्यक्रम 4 अक्टूबर को प्रस्तावित है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे ने संयुक्त रूप से मुंबई में चुनाव आयोग के खिलाफ मार्च निकालने की घोषणा की है। मार्च बायकुला से BMC मुख्यालय तक प्रस्तावित है।

इससे साफ है कि महाराष्ट्र में चुनावी प्रक्रिया और निर्वाचन आयोग की भूमिका अब राजनीतिक टकराव का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

सवाल सिर्फ ज्ञानेश कुमार का नहीं

पूरे विवाद के केंद्र में SIR, मतदाता सूची में बदलाव और चुनावी प्रक्रिया की पारदर्शिता है। हालिया रिपोर्टों के बाद निर्वाचन आयोग ने मतदाता सूची में हुए बदलावों की समीक्षा के लिए प्रक्रिया शुरू की है और सॉफ्टवेयर से जुड़े पहलुओं की भी जांच की बात सामने आई है। आयोग का कहना है कि उसकी कार्रवाई निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत है।

यही वह बिंदु है जहां राजनीतिक आरोप और तथ्यात्मक जांच अलग-अलग किए जाने जरूरी हैं। यदि मतदाता सूची में किसी योग्य नागरिक का नाम गलत तरीके से हटाया गया है, तो जवाबदेही तय होनी चाहिए; और यदि बदलाव नियमों के अनुसार हुए हैं, तो उसका पूरा रिकॉर्ड भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए।

उद्धव ठाकरे का बयान इसी व्यापक राजनीतिक विवाद को और धार देता है। लेकिन किसी भी व्यक्ति के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई या गिरफ्तारी का अंतिम आधार राजनीतिक बयान नहीं, बल्कि कानूनन स्थापित तथ्य, जांच और न्यायिक प्रक्रिया होती है।

फिलहाल तस्वीर यह है कि चुनाव आयोग के खिलाफ सड़क पर राजनीतिक दबाव बढ़ रहा है, SIR पर कानूनी सवाल अदालत तक पहुंच रहे हैं और मतदाता सूची की पारदर्शिता राष्ट्रीय बहस का केंद्र बन गई है। ऐसे माहौल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही रहेगा—क्या चुनावी संस्थाओं पर उठ रहे सवालों का जवाब राजनीतिक बयानबाजी से मिलेगा या पारदर्शी रिकॉर्ड और स्वतंत्र जांच से?

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