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संभल का सवाल फिर सामने: ससुर CEC, दामाद DM… और वोटरों की शिकायत पर ‘क्लीन चिट’!

राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 1 अक्टूबर 2026

2024 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश के संभल से सामने आए मतदान संबंधी विवाद ने अब मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की भूमिका को लेकर एक नया और बेहद गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है। Scroll की 29 सितंबर 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, 7 मई 2024 को संभल में मतदान के दौरान मुस्लिम मतदाताओं, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं, को पुलिस द्वारा मतदान केंद्रों से बाहर किए जाने और कथित तौर पर वोट डालने से रोकने के आरोप सामने आए थे। इन घटनाओं से जुड़े वीडियो भी सोशल मीडिया और कुछ समाचार माध्यमों में सामने आए थे। इसके बाद निर्वाचन आयोग ने इन आरोपों को गलत और भ्रामक बताते हुए कहा था कि किसी मतदाता को उसके मताधिकार से वंचित नहीं किया गया।

लेकिन इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण और अब तक सबसे असहज सवाल उस समय की प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा है। संभल के तत्कालीन जिलाधिकारी और रिटर्निंग ऑफिसर मनीष बंसल थे। Scroll की रिपोर्ट के मुताबिक, मनीष बंसल का विवाह मेधा रूपम से हुआ है, जो ज्ञानेश कुमार की बेटी हैं। उस समय ज्ञानेश कुमार स्वयं निर्वाचन आयुक्त थे। यानी संभल में मतदान को लेकर उठी शिकायतों की जांच और रिपोर्टिंग जिस अधिकारी के स्तर पर हुई, उनका रिश्ता उस समय निर्वाचन आयोग में मौजूद एक चुनाव आयुक्त के परिवार से था। यही वह तथ्य है जिसके आधार पर अब Conflict of Interest यानी हितों के संभावित टकराव को लेकर सवाल उठ रहे हैं।

मामला यहीं खत्म नहीं होता। संभल में मतदान के दौरान सामने आए वीडियो और शिकायतों के बाद तत्कालीन रिटर्निंग ऑफिसर मनीष बंसल ने घटनाओं की जांच की। उनकी ओर से कहा गया कि मतदान केंद्र के भीतर जरूरत से अधिक लोग मौजूद थे और पुलिस ने उन्हें बाहर निकाला तथा कतार बनाकर मतदान कराया। इसके अगले दिन निर्वाचन आयोग ने इसी स्पष्टीकरण को आधार बनाते हुए कहा कि किसी मतदाता को वोट डालने के अधिकार से वंचित नहीं किया गया और संबंधित दावा “false” तथा “misleading” था। चुनाव आयोग के अपने Myth vs Reality रिकॉर्ड में भी 8 मई 2024 की इस घटना को दर्ज करते हुए कहा गया है कि संभल के DM की जांच के बाद यह दावा गलत पाया गया था।

अब असली सवाल यही है—क्या उस समय ज्ञानेश कुमार ने इस मामले की चर्चा और निर्णय प्रक्रिया से खुद को अलग किया था? क्या उन्होंने आयोग के सामने यह स्पष्ट किया था कि संभल के रिटर्निंग ऑफिसर उनके परिवार से जुड़े हैं? क्या इस संभावित हितों के टकराव को औपचारिक रूप से दर्ज किया गया था? और अगर इस मामले पर आयोग के स्तर पर कोई निर्णय हुआ, तो उसमें ज्ञानेश कुमार की भूमिका क्या थी? Scroll की रिपोर्ट के अनुसार इन सवालों का स्पष्ट सार्वजनिक उत्तर सामने नहीं आया है। रिपोर्ट ने चुनाव आयोग और ज्ञानेश कुमार से इस संबंध में प्रतिक्रिया भी मांगी है।

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि निर्वाचन आयोग कोई सामान्य सरकारी विभाग नहीं है। यह देश में चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था है और उसके फैसलों का सीधा संबंध करोड़ों मतदाताओं के विश्वास से है। उस समय आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा दो चुनाव आयुक्त भी थे और कानून के तहत मतभेद होने की स्थिति में निर्णय बहुमत के आधार पर लिया जा सकता था। ऐसे में किसी संवेदनशील चुनावी शिकायत पर संभावित व्यक्तिगत संबंध की स्थिति में पारदर्शिता और निर्णय प्रक्रिया को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है।

यहां एक बात स्पष्ट रखना भी जरूरी है—सिर्फ पारिवारिक संबंध होना अपने आप में किसी निर्णय को अवैध साबित नहीं करता। Scroll की रिपोर्ट भी बताती है कि निर्वाचन आयोग के लिए हितों के टकराव को लेकर ऐसी विशिष्ट परिस्थिति पर कोई स्पष्ट अलग नियम मौजूद होने की जानकारी नहीं है। इसलिए यह कहना कि संभल की जांच या आयोग का फैसला केवल रिश्तेदारी के कारण गलत या अवैध था, उपलब्ध तथ्यों से आगे बढ़ना होगा। लेकिन लोकतांत्रिक संस्थाओं में सवाल केवल कानूनी वैधता का नहीं होता; पारदर्शिता, निष्पक्षता और जनता के भरोसे का भी होता है।

और यहीं संभल की कहानी सबसे ज्यादा चुभती है। एक तरफ मतदान के दौरान कथित तौर पर मतदाताओं को रोकने और पुलिस कार्रवाई के वीडियो सामने आए। दूसरी तरफ प्रशासनिक जांच हुई। उसी जांच में रिटर्निंग ऑफिसर ने घटनाओं को अलग तरीके से प्रस्तुत किया। फिर निर्वाचन आयोग ने उस स्पष्टीकरण के आधार पर मतदाता दमन के दावे को गलत बताया। और अब सामने आया है कि उस समय के रिटर्निंग ऑफिसर का पारिवारिक संबंध उस समय के चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से था। यह पूरी कड़ी अपने आप में कई सवाल पैदा करती है, जिनका जवाब आरोपों से नहीं बल्कि रिकॉर्ड से मिलना चाहिए।

सबसे बड़ा सवाल इसलिए यह नहीं है कि किसी एक वीडियो की व्याख्या क्या थी। सवाल यह है कि क्या उस समय पूरी निर्णय प्रक्रिया इतनी पारदर्शी थी कि किसी मतदाता को यह महसूस न हो कि उसकी शिकायत की जांच उसी व्यवस्था के भीतर ऐसे अधिकारी की रिपोर्ट पर निर्भर है जिसका संबंध आयोग के एक सदस्य के परिवार से है? अगर ज्ञानेश कुमार ने खुद को इस प्रक्रिया से अलग किया था, तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों न हो? अगर उन्होंने खुद को अलग नहीं किया था, तो क्या उन्होंने अपने पारिवारिक संबंध को औपचारिक रूप से घोषित किया था? और अगर ऐसी कोई प्रक्रिया ही नहीं थी, तो भविष्य में ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए नियम क्यों नहीं बनाए जाने चाहिए?

आज जब चुनाव आयोग की निष्पक्षता, मतदाता सूची, SIR और चुनावी पारदर्शिता को लेकर राजनीतिक बहस तेज है, संभल का 2024 वाला मामला फिर सामने आना महज एक पुरानी घटना की पुनरावृत्ति नहीं है। यह उस बुनियादी सवाल को सामने रखता है कि चुनाव कराने वाली संस्था अपने फैसलों को केवल सही साबित करने तक सीमित रखेगी या यह भी सुनिश्चित करेगी कि उसकी हर कार्रवाई जनता को निष्पक्ष और पारदर्शी दिखाई दे।

संभल के मतदाताओं की शिकायतों को लेकर चुनाव आयोग ने अपना आधिकारिक पक्ष पहले ही दर्ज कर दिया था—आयोग के मुताबिक किसी मतदाता को मतदान से वंचित नहीं किया गया था और वायरल दावा गलत था। लेकिन अब जो सवाल उठ रहा है, वह उस निष्कर्ष से आगे का है: उस निष्कर्ष तक पहुंचने की पूरी प्रक्रिया क्या थी, उसमें किसकी क्या भूमिका थी और संभावित हितों के टकराव से निपटने के लिए क्या कदम उठाए गए?

सवाल किसी व्यक्ति को दोषी घोषित करने का नहीं, जवाबदेही तय करने का है। संभल की पूरी फाइल, निर्णय प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका सार्वजनिक रूप से स्पष्ट होनी चाहिए—ताकि यह तय हो सके कि 2024 में संभल के मतदाताओं के साथ जो हुआ, उसकी जांच वास्तव में कितनी स्वतंत्र, पारदर्शी और निष्पक्ष थी।

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