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8 साल बाद बहन ने रचा इतिहास, नीरू धांडा ने जीता एशियाई खेलों में गोल्ड

खेल | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 सितंबर 2026

भारतीय निशानेबाजी के लिए एशियाई खेलों से एक बड़ी और ऐतिहासिक खबर सामने आई है। नीरू धांडा ने महिलाओं की ट्रैप शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतकर इतिहास रच दिया है। 26 वर्षीय नीरू ने फाइनल में शानदार प्रदर्शन करते हुए केवल दो शॉट मिस किए और नया एशियाई खेल रिकॉर्ड भी कायम किया। इस जीत के साथ नीरू एशियाई खेलों में महिलाओं की व्यक्तिगत ट्रैप शूटिंग में स्वर्ण पदक जीतने वाली पहली भारतीय महिला निशानेबाज बन गई हैं। खास बात यह है कि नीरू का यह सफर सीधे शूटिंग रेंज से शुरू नहीं हुआ था। वह कभी कबड्डी खेलती थीं और शूटिंग को लेकर उनका सपना उस समय दूर की बात लगता था, जब परिवार के पास गांव में सीमित कृषि भूमि थी। लेकिन एक पारिवारिक सफलता ने उनके भीतर छिपे सपने को दिशा दी और आठ साल बाद उसी परिवार में एक और ऐतिहासिक एशियाई खेल पदक जुड़ गया।

नीरू की कहानी वर्ष 2018 के जकार्ता एशियाई खेलों से जुड़ी है। उस समय उनके चचेरे भाई लक्ष्य श्योराण ने पुरुषों की ट्रैप स्पर्धा में रजत पदक जीता था। नीरू ने अपने परिवार के साथ लक्ष्य की सफलता और उनके भव्य स्वागत को देखा था। उस समय नीरू कबड्डी खेल रही थीं, लेकिन लक्ष्य की उपलब्धि ने उनके मन में शूटिंग को लेकर एक नया सपना पैदा किया। उन्होंने अपनी मां से शूटिंग में करियर बनाने की इच्छा जताई, लेकिन परिवार की आर्थिक परिस्थितियां इस सपने के सामने बड़ी चुनौती थीं। गांव सांगतपुरा में परिवार के पास खेती की जमीन का छोटा हिस्सा था और ऐसे में महंगे शूटिंग उपकरण, प्रशिक्षण और प्रतियोगिताओं का खर्च उठाना आसान नहीं था। इसके बावजूद नीरू ने अपने सपने को छोड़ने के बजाय परिवार को मनाने की कोशिश जारी रखी।

इसके करीब एक साल बाद नीरू को अपने माता-पिता से शूटिंग में हाथ आजमाने की अनुमति मिली। इस सफर में उन्हें अपने चचेरे भाई लक्ष्य श्योराण और उनके पिता सोमवीर श्योराण का भी महत्वपूर्ण सहयोग मिला। सोमवीर स्वयं पूर्व राष्ट्रीय पहलवान रह चुके हैं। नीरू ने दिल्ली के कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में प्रशिक्षण शुरू किया और शुरुआत में लक्ष्य की बंदूकों से अभ्यास किया। एक कबड्डी खिलाड़ी से अंतरराष्ट्रीय स्तर की निशानेबाज बनने का यह बदलाव आसान नहीं था। शूटिंग में एकाग्रता, तकनीक, मानसिक मजबूती और लगातार अभ्यास की जरूरत होती है। नीरू ने इन सभी चुनौतियों के बीच अपनी मेहनत जारी रखी और धीरे-धीरे अपनी पहचान एक प्रतिभाशाली ट्रैप शूटर के रूप में बनाई।

मंगलवार को जब एशियाई खेलों के महिला ट्रैप फाइनल में नीरू उतरीं तो उनके सामने सिर्फ पदक जीतने की चुनौती नहीं थी, बल्कि भारतीय निशानेबाजी के इतिहास में अपना नाम दर्ज कराने का मौका भी था। फाइनल में उन्होंने बेहद सटीक निशाने लगाए और केवल दो शॉट गंवाए। उनके प्रदर्शन ने उन्हें स्वर्ण पदक दिलाने के साथ नया एशियाई खेल रिकॉर्ड भी दिलाया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि महिला ट्रैप शूटिंग में व्यक्तिगत स्वर्ण जीतने वाली वह पहली भारतीय महिला बन गई हैं। नीरू की जीत भारतीय निशानेबाजी के लिए एक और बड़ी उपलब्धि है और यह बताती है कि देश में अलग-अलग खेल पृष्ठभूमि से आने वाले खिलाड़ी भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी जगह बना सकते हैं।

नीरू की इस उपलब्धि में एक खास भावनात्मक पहलू भी है। आठ साल पहले उन्होंने अपने चचेरे भाई लक्ष्य श्योराण को एशियाई खेलों में रजत पदक जीतते देखा था। उस समय शायद किसी ने नहीं सोचा होगा कि वही दृश्य एक दिन नीरू के अपने स्वर्ण पदक के रूप में दोहराया जाएगा। 2018 में लक्ष्य की सफलता से प्रेरित होकर शूटिंग शुरू करने वाली नीरू ने 2026 में उसी एशियाई मंच पर भारत का तिरंगा सबसे ऊंचे पायदान पर पहुंचा दिया। उनके लिए यह सिर्फ एक स्वर्ण पदक नहीं, बल्कि उस सपने की मंजिल है जिसे उन्होंने सीमित संसाधनों और अलग खेल पृष्ठभूमि के बावजूद लगातार मेहनत से हासिल किया।

नीरू धांडा की कहानी भारतीय खेल जगत में उन खिलाड़ियों के लिए भी प्रेरणा है जो संसाधनों की कमी के कारण अपने सपनों को दूर समझते हैं। कबड्डी से शूटिंग तक का सफर, परिवार का समर्थन, लक्ष्य श्योराण से मिली प्रेरणा और कर्णी सिंह शूटिंग रेंज में शुरू हुआ अभ्यास—इन सभी पड़ावों ने मिलकर नीरू को उस मुकाम तक पहुंचाया जहां उन्होंने इतिहास रच दिया। 2018 में परिवार में आया एशियाई खेलों का रजत पदक और 2026 में नीरू का स्वर्ण—आठ साल के अंतराल में एक ही परिवार की दो पीढ़ियों जैसी खेल उपलब्धियों की यह कहानी भारतीय खेल इतिहास के यादगार अध्यायों में शामिल हो गई है।

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