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सुप्रीम कोर्ट में CEC ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिका, SIR पर भी सवाल

राष्ट्रीय/ अपराध | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 29 सितंबर 2026

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के कामकाज को चुनौती देने वाली याचिका पर अगले सप्ताह सुनवाई करने पर सहमति जताई है। इस याचिका में न केवल चुनाव आयोग के कामकाज और उसके भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल उठाए गए हैं, बल्कि देशभर में मतदाता सूची के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR को भी चुनौती दी गई है। याचिकाकर्ता की ओर से SIR की प्रक्रिया को अवैध घोषित करने की मांग की गई है। मामले ने इसलिए भी महत्व हासिल किया है क्योंकि चुनाव आयोग देश में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था है और मतदाता सूची से जुड़ा कोई भी बड़ा फैसला सीधे तौर पर चुनाव प्रक्रिया और मतदाताओं के अधिकारों से जुड़ता है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई के दौरान यह सवाल सामने आ सकता है कि चुनाव आयोग के भीतर महत्वपूर्ण फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए और क्या आयोग के सभी सदस्यों की भूमिका तथा सहमति को निर्णय प्रक्रिया में उचित रूप से शामिल किया गया।

मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने सुप्रीम कोर्ट से जल्द सुनवाई की मांग की। उनका तर्क है कि चुनाव आयोग के कथित सामूहिक निर्णय लेने के तरीके को लेकर उठे सवाल केवल प्रशासनिक प्रकृति के नहीं हैं, बल्कि इनके संवैधानिक महत्व भी हैं। चुनाव आयोग एक बहुसदस्यीय संवैधानिक संस्था है और उसके फैसलों की प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता तथा संस्थागत जवाबदेही महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऐसे में याचिका में उठाए गए सवालों की न्यायिक समीक्षा की मांग की गई है। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने मामले को अगले सप्ताह सुनने पर सहमति जताई है। सुनवाई के दौरान अदालत याचिका में उठाए गए मुद्दों, SIR की प्रक्रिया और चुनाव आयोग के निर्णय लेने के तरीके से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार कर सकती है। हालांकि, किसी भी आरोप या दावे पर अंतिम निष्कर्ष अदालत की सुनवाई और उसके आदेश के बाद ही सामने आएगा।

यह मामला उस समय सामने आया है जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट में चुनाव आयोग के भीतर SIR से जुड़े फैसलों को लेकर कथित मतभेदों का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब 10 महीनों के दौरान SIR से संबंधित फैसलों और आदेशों पर कम-से-कम 14 बार आपत्तियां दर्ज कीं। रिपोर्ट में दावा किया गया कि दोनों चुनाव आयुक्तों ने कुछ मामलों में यह आपत्ति जताई कि संबंधित फैसले उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना लिए गए थे। यदि इस तरह के मतभेद आधिकारिक रिकॉर्ड का हिस्सा हैं, तो इससे चुनाव आयोग के भीतर निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। हालांकि, इन रिपोर्टों में सामने आए दावों को अंतिम तथ्य के रूप में नहीं देखा जा सकता, क्योंकि संबंधित मुद्दों पर चुनाव आयोग का अपना पक्ष भी मौजूद है और मामले की न्यायिक जांच अभी बाकी है।

चुनाव आयोग ने रिपोर्ट में उठाए गए सवालों पर अपना पक्ष स्पष्ट किया है। आयोग के अनुसार, संधू और जोशी की ओर से कैबिनेट सचिव को भेजे गए पत्र एक प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारी से संबंधित थे। आयोग ने यह भी कहा कि इन पत्रों का संबंध चुनाव आयोग की नीति संबंधी मामलों या उसके IT डिवीजन से नहीं था। यानी आयोग ने उन पत्रों को SIR की नीति या चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जोड़कर देखने की व्याख्या को खारिज किया है। यही वजह है कि अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि अदालत के सामने एक ओर याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए संवैधानिक और प्रक्रियात्मक सवाल होंगे, वहीं दूसरी ओर चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष भी रिकॉर्ड पर होगा। अदालत इन दावों और दस्तावेजों को कानूनी कसौटी पर परख सकती है।

SIR यानी स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन मतदाता सूचियों के व्यापक पुनरीक्षण की प्रक्रिया है। मतदाता सूची चुनावी व्यवस्था की बुनियादी कड़ी है, क्योंकि चुनाव में मतदान का अधिकार मतदाता सूची में दर्ज नाम से जुड़ा होता है। इसलिए मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की किसी भी प्रक्रिया को लेकर पारदर्शिता और उचित प्रक्रिया का पालन बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है। SIR को चुनौती देने वाली याचिका में इसी व्यापक प्रक्रिया की वैधानिकता पर सवाल उठाया गया है। आने वाले समय में अदालत यह देख सकती है कि इस प्रक्रिया को लागू करने के लिए चुनाव आयोग के पास कौन-से कानूनी अधिकार हैं, प्रक्रिया किस तरह संचालित की गई और उससे जुड़े निर्णय संवैधानिक तथा वैधानिक प्रावधानों के अनुरूप हैं या नहीं।

अब सभी की नजर सुप्रीम कोर्ट की अगले सप्ताह होने वाली सुनवाई पर है। इस मामले में अदालत के सामने मुख्य रूप से CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज, चुनाव आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया और देशभर में चलाए जा रहे SIR की वैधानिकता से जुड़े सवाल होंगे। फिलहाल अदालत ने केवल मामले को सुनने पर सहमति जताई है और किसी भी पक्ष के दावे को अंतिम रूप से स्वीकार या खारिज नहीं किया गया है। ऐसे में आगे की सुनवाई और अदालत की टिप्पणियां ही यह स्पष्ट करेंगी कि याचिका में उठाए गए सवालों पर न्यायिक दृष्टिकोण क्या है और SIR तथा चुनाव आयोग की निर्णय प्रक्रिया से जुड़े विवाद का कानूनी दायरा कितना व्यापक है।

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