राष्ट्रीय/ राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 26 सितंबर 2026
SIR को लेकर चुनाव आयोग पर उठ रहे सवाल अब सड़कों तक पहुंच गए हैं। शुक्रवार को दिल्ली के जंतर-मंतर पर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और SIR को लेकर विरोध प्रदर्शन हुआ। प्रदर्शन में छात्र संगठनों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक नेताओं के साथ बड़ी संख्या में लोग जुटे। पुलिस ने जंतर-मंतर की ओर जाने वाले रास्तों पर बैरिकेडिंग कर दी और प्रदर्शनकारियों को आगे बढ़ने से रोका। कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया। रिपोर्टों के अनुसार हिरासत में लिए गए लोगों में AISA की अध्यक्ष नेहा बोरा, योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और CPI(ML) नेता दीपांकर भट्टाचार्य समेत कई लोग शामिल थे।

प्रदर्शनकारियों की मांग सीधे चुनाव आयोग के शीर्ष नेतृत्व पर केंद्रित थी। जंतर-मंतर पर ‘ज्ञानेश कुमार को गिरफ्तार करो’ और SIR को वापस लेने की मांग को लेकर नारे लगाए गए। AISA और अन्य नागरिक संगठनों की ओर से आयोजित प्रदर्शन में मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठाए गए। पुलिस के अनुसार प्रदर्शन के लिए अनुमति नहीं ली गई थी और इसी आधार पर प्रदर्शनकारियों को हटाया गया। पुलिस का कहना था कि प्रदर्शन के लिए कोई आवेदन जमा नहीं हुआ था।
इस बीच TMC सांसद महुआ मोइत्रा भी जंतर-मंतर पहुंचीं और उन्होंने प्रदर्शन के दौरान पुलिस व्यवस्था और कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया दी। महुआ मोइत्रा ने कहा कि वह वहां मौजूद थीं और उन्हें लगा कि लोगों के भीतर का डर खत्म हो गया है। उन्होंने दावा किया कि बच्चों ने बिना नेम टैग वाले पुलिसकर्मियों को भी सवालों के घेरे में खड़ा किया। महुआ मोइत्रा ने यह भी सवाल उठाया कि एक छोटे नागरिक प्रदर्शन के लिए ITBP और BSF जैसी केंद्रीय सुरक्षा बलों की तैनाती क्यों की गई। उनके अनुसार यह जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल था।

महुआ मोइत्रा ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह पर भी राजनीतिक निशाना साधा। उन्होंने दावा किया कि दोनों “घबराहट” में हैं और कहा—“It’s done Bro!” यानी उनके शब्दों में अब लोगों के भीतर सत्ता से डर नहीं बचा है। यह महुआ मोइत्रा की राजनीतिक टिप्पणी है और इसे किसी स्वतंत्र तथ्यात्मक निष्कर्ष के रूप में नहीं देखा जा सकता।
जंतर-मंतर पर जिस तरह बैरिकेडिंग की गई और प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया, उसने पूरे विवाद को और राजनीतिक बना दिया। प्रत्यक्षदर्शियों और प्रदर्शन से जुड़े लोगों की ओर से पुलिस कार्रवाई को लेकर सवाल उठाए गए हैं। वहीं पुलिस का कहना है कि प्रदर्शन के लिए आवश्यक अनुमति नहीं ली गई थी और इसी कारण लोगों को आगे बढ़ने से रोका गया। यानी इस पूरे घटनाक्रम में एक तरफ प्रदर्शनकारियों का शांतिपूर्ण विरोध और दूसरी तरफ पुलिस की अनुमति एवं सुरक्षा व्यवस्था का सवाल आमने-सामने है।
प्रदर्शन में नेहा बोरा की मौजूदगी भी महत्वपूर्ण रही। AISA अध्यक्ष के तौर पर वह पहले से ही SIR, छात्र अधिकारों और चुनावी प्रक्रिया को लेकर चल रहे आंदोलनों में सक्रिय रही हैं। शुक्रवार के प्रदर्शन में उनके साथ कई सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक हस्तियां भी मौजूद थीं। प्रदर्शन के दौरान उन्हें हिरासत में लिए जाने की खबर सामने आई।

योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण की हिरासत ने भी प्रदर्शन को राष्ट्रीय राजनीतिक बहस का विषय बना दिया। योगेंद्र यादव लंबे समय से चुनावी प्रक्रिया और मतदाता सूची को लेकर सवाल उठा रहे हैं। वहीं प्रशांत भूषण ने भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से जुड़े मुद्दों पर आपत्ति जताई है। दोनों के हिरासत में लिए जाने की खबर ने इस प्रदर्शन को और ज्यादा ध्यान के केंद्र में ला दिया।
यह प्रदर्शन ऐसे समय हुआ है जब चुनाव आयोग के भीतर 2 चुनाव आयुक्तों की ओर से दर्ज की गई लिखित आपत्तियों को लेकर विवाद पहले से चल रहा है। SIR, Form 6 में बदलाव, मतदाता सूची के डिजिटल डाटाबेस, पश्चिम बंगाल में अपीलों और चुनावी प्रक्रिया को लेकर सामने आई आपत्तियों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार पर विपक्ष का दबाव बढ़ाया है। विपक्ष इन घटनाक्रमों को चुनाव आयोग की पारदर्शिता और स्वतंत्रता से जोड़ रहा है, जबकि चुनाव आयोग का कहना है कि बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था में अलग-अलग राय और आंतरिक विचार-विमर्श सामान्य प्रक्रिया का हिस्सा हैं तथा SIR से जुड़े प्रमुख फैसले सर्वसम्मति से लिए गए।
जंतर-मंतर का यह प्रदर्शन इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि SIR को लेकर राजनीतिक बहस अब सिर्फ संसद, प्रेस कॉन्फ्रेंस और चुनाव आयोग के दस्तावेजों तक सीमित नहीं रही। सड़क पर उतरकर प्रदर्शन, ज्ञानेश कुमार की गिरफ्तारी की मांग और विपक्षी नेताओं तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं की हिरासत ने विवाद को सीधे जनता के बीच ला दिया है। महुआ मोइत्रा का “डर खत्म हो गया” वाला बयान इसी बदलते राजनीतिक माहौल को सामने रखता है, हालांकि इसका व्यापक जनसमर्थन या राजनीतिक असर अलग से प्रमाणित किया जाना बाकी है।
अब सवाल यही है कि क्या जंतर-मंतर पर उठी आवाज सिर्फ एक दिन का प्रदर्शन बनकर रह जाएगी या SIR और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली को लेकर चल रही बहस को और व्यापक बनाएगी? एक तरफ मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया को लेकर दस्तावेजी सवाल हैं, दूसरी तरफ सड़क पर बढ़ता विरोध है। ऐसे में हर हिरासत, हर कार्रवाई और हर आरोप से ज्यादा जरूरी होगा कि मतदाता सूची, SIR और चुनावी प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड जनता के सामने कितने स्पष्ट और पारदर्शी तरीके से रखे जाते हैं।



