अंतरराष्ट्रीय/ टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 23 सितंबर 2026
अमेरिका और चीन के बीच रिश्ते लंबे समय से अविश्वास, व्यापारिक टकराव और तकनीकी प्रतिस्पर्धा से घिरे हैं। लेकिन अब दोनों देशों के बीच एक ऐसा मुद्दा सामने आया है, जहां टकराव के बजाय सहयोग की जरूरत महसूस की जा रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप गुरुवार को व्हाइट हाउस में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मेजबानी करने वाले हैं और इस मुलाकात के बीच दुनिया की नजर एक संभावित AI समझौते पर भी है। सवाल यह है कि क्या दोनों नेता ऐसी व्यवस्था बनाने पर सहमत हो सकते हैं, जो बेहद शक्तिशाली AI प्रणालियों के विकास और इस्तेमाल से जुड़े जोखिमों पर कुछ सीमाएं तय करे?
यह विचार इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिका और चीन इस समय AI की दौड़ में एक-दूसरे के सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी हैं। दोनों देश उन्नत कंप्यूटिंग, चिप्स और AI मॉडल विकसित करने में भारी निवेश कर रहे हैं। ऐसे माहौल में किसी भी तरह का समझौता आसान नहीं होगा। दोनों देशों को डर है कि अगर उन्होंने AI के विकास पर अपनी रफ्तार धीमी की और दूसरा देश आगे निकल गया तो इसका असर तकनीक से लेकर अर्थव्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा तक पड़ सकता है।
फिर भी अमेरिका और चीन के मौजूदा नेतृत्व की एक खासियत इस बातचीत को दूसरे दौर की कूटनीति से अलग बनाती है। ट्रंप व्यक्तिगत स्तर पर शी जिनपिंग के साथ अपने रिश्ते को काफी महत्व देते रहे हैं और दोनों देशों के बीच कई बड़े फैसलों में शीर्ष नेतृत्व की भूमिका दिखाई देती है। ऐसे में किसी संभावित AI समझौते को नीचे से ऊपर तक लंबी प्रक्रिया के बजाय सीधे दोनों नेताओं के स्तर पर आगे बढ़ाने की संभावना पर चर्चा हो रही है। हालांकि यह अभी एक संभावना और विश्लेषण है, कोई तय समझौता नहीं।
AI को लेकर अमेरिका में भी बहस तेजी से बदल रही है। कुछ समय पहले तक मुख्य चिंता यह थी कि कहीं अमेरिका AI की दौड़ में चीन से पीछे न रह जाए। अब इसके साथ यह सवाल भी तेजी से उठ रहा है कि अगर AI प्रणालियां लगातार अधिक शक्तिशाली होती गईं तो उन्हें नियंत्रित कैसे किया जाएगा। AI क्षेत्र के प्रमुख नामों में शामिल सैम ऑल्टमैन, एलन मस्क और डारियो अमोदेई की ओर से AI जोखिमों पर चिंता व्यक्त किए जाने को इस बदलते माहौल के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
चीन के सामने भी AI से जुड़े अलग तरह के खतरे हैं। वहां चिंता सिर्फ तकनीकी सुरक्षा की नहीं बल्कि इस बात की भी है कि AI का इस्तेमाल सामाजिक अस्थिरता या सरकार के नियंत्रण से बाहर गतिविधियों को बढ़ाने में न हो। हाल ही में एक कैलिफोर्निया की कंपनी द्वारा AI की मदद से वीचैट जैसे बड़े चीनी मंच को हैक करने वाला उपकरण तेजी से तैयार किए जाने की खबर ने भी सुरक्षा से जुड़े सवाल बढ़ाए हैं। वीचैट का इस्तेमाल चीन में 1 अरब से ज्यादा लोग करते हैं।
संभावित समझौते में दोनों देश अपनी-अपनी जनता के सामने इसकी अलग तस्वीर पेश कर सकते हैं। अमेरिका इसे अपनी तकनीकी बढ़त सुरक्षित रखने और चीन की कुछ गतिविधियों पर नियंत्रण हासिल करने के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, जबकि चीन इसे वैश्विक AI शासन में अपनी भूमिका और मानव नियंत्रण पर आधारित व्यवस्था की दिशा में कदम के रूप में पेश कर सकता है। ऐसी स्थिति में दोनों नेताओं के लिए घरेलू राजनीतिक स्तर पर समझौते को स्वीकार कराना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।
लेकिन असली चुनौती समझौते को लागू करने की होगी। अगर दोनों देश AI के सबसे शक्तिशाली मॉडल विकसित करने की गति सीमित करने पर सहमत होते हैं तो यह तय करना होगा कि इसकी निगरानी कौन करेगा और नियमों के पालन की जांच कैसे होगी। अमेरिका और चीन दोनों अपने सबसे संवेदनशील तकनीकी ढांचे की जानकारी दूसरे देश के साथ साझा करने से बचेंगे। इसलिए किसी बड़े समझौते की निगरानी और सत्यापन सबसे कठिन सवालों में से एक होगा।
दूसरी तरफ केवल बातचीत जारी रखने की घोषणा भी पर्याप्त नहीं मानी जाएगी। अमेरिका और चीन ने शी जिनपिंग की यात्रा से पहले AI को लेकर एक नया संवाद शुरू करने की घोषणा की है। लेकिन अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के अनुसार अगली बैठक 2 महीने बाद होनी है। AI जिस तेजी से आगे बढ़ रहा है, उसके मुकाबले इतनी लंबी अवधि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
ऐसे में कुछ छोटे और व्यावहारिक कदम दोनों देशों के लिए ज्यादा आसान हो सकते हैं। उदाहरण के लिए वॉशिंगटन और बीजिंग के बीच AI संकट के समय तत्काल संपर्क के लिए एक आपातकालीन हॉटलाइन बनाई जा सकती है। इससे किसी तकनीकी घटना या AI से जुड़ी गलतफहमी के कारण दोनों देशों के बीच अचानक तनाव बढ़ने का खतरा कम हो सकता है। इसी तरह AI का इस्तेमाल जैविक हथियार तैयार करने जैसे गंभीर खतरों में न हो, इसके लिए सुरक्षा उपायों पर सहयोग दोनों देशों के साझा हित में हो सकता है।
हालांकि अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि ट्रंप और शी किसी बड़े AI समझौते तक पहुंचेंगे। अमेरिका और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा, सुरक्षा चिंताएं और एक-दूसरे पर अविश्वास ऐसे समझौते के रास्ते में बड़ी बाधाएं हैं। लेकिन गुरुवार की व्हाइट हाउस बैठक एक ऐसा मौका जरूर दे रही है जहां दुनिया के दो सबसे शक्तिशाली देशों के नेता AI की रफ्तार के साथ-साथ उसके जोखिमों पर भी सीधी बातचीत कर सकते हैं। अगर बातचीत केवल AI की दौड़ जीतने तक सीमित रहने के बजाय इस तकनीक को सुरक्षित रखने के नियमों तक पहुंचती है, तो यह मुलाकात आने वाले वर्षों की वैश्विक AI व्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है।



