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1971 की जंग में भारत ने सुनी पाकिस्तान की ‘गुप्त आवाज’, कैसे रॉ ने पहले ही भांप लिया था हमला?

रक्षा/ इतिहास/ शिक्षा | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 सितंबर 2026

 

1971 की जंग सिर्फ मोर्चे पर लड़ी गई लड़ाई नहीं थी। इसके पीछे ऐसी खुफिया जंग भी चल रही थी, जिसमें एक-एक सूचना हजारों सैनिकों की जान और पूरे युद्ध की दिशा बदल सकती थी। इसी खुफिया तंत्र ने नवंबर 1971 के आखिरी दिनों में भारत को ऐसी खबर दी, जिसने पाकिस्तान की रणनीति को समय रहते समझने में मदद की। पाकिस्तान भारत के पश्चिमी हिस्से के एयरबेस पर अचानक हवाई हमला करने की तैयारी कर रहा था और भारत को इसकी भनक पहले ही लग चुकी थी।

इस पूरी कहानी के केंद्र में थे Rameshwar Nath Kao, जिन्हें भारत की बाहरी खुफिया एजेंसी Research and Analysis Wing यानी RAW का संस्थापक प्रमुख माना जाता है। Kao ने जिस खुफिया ढांचे को खड़ा किया, उसने सिर्फ एजेंटों का नेटवर्क नहीं बनाया, बल्कि ऐसे लोगों, कौशल और काम करने की संस्कृति को विकसित किया जो राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी बेहद संवेदनशील सूचनाओं पर काम कर सके।

नवंबर 1971 के अंतिम सप्ताह में भारत को पाकिस्तान के भीतर से एक बेहद महत्वपूर्ण सूचना मिली। K Sankaran Nair के पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान के अंदर मौजूद एक स्रोत ने जानकारी दी कि पाकिस्तान भारतीय वायुसेना के पश्चिमी क्षेत्र के ठिकानों पर अचानक हवाई हमला करने की तैयारी कर रहा है। यह कोई सामान्य सैन्य गतिविधि की खबर नहीं थी। अगर हमला अचानक होता और भारत तैयार नहीं रहता, तो उसके शुरुआती प्रभाव गंभीर हो सकते थे।

Nair ने यह सूचना आगे पहुंचाई और भारतीय वायुसेना को सतर्क कर दिया गया। एयरबेस पर तैयारी बढ़ा दी गई और संभावित हमले को देखते हुए सुरक्षा व्यवस्था मजबूत की गई। कुछ ही दिनों बाद पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को भारतीय एयरबेस पर हवाई हमले शुरू किए। लेकिन इस बार भारत उस हमले से अनजान नहीं था। चेतावनी पहले ही मिल चुकी थी और भारतीय पक्ष तैयार था।

यही वह क्षण था जब खुफिया जानकारी और सैन्य तैयारी के बीच का संबंध साफ दिखाई दिया। युद्ध के मैदान में सैनिकों और हथियारों की भूमिका दिखाई देती है, लेकिन उससे पहले पर्दे के पीछे जुटाई गई सूचना अक्सर यह तय करती है कि सेना किस स्थिति में युद्ध में प्रवेश करेगी। 1971 की इस घटना में भी एक खुफिया चेतावनी ने भारत को पाकिस्तान की शुरुआती कार्रवाई के लिए तैयार रहने का अवसर दिया।

इसके बाद युद्ध तेजी से आगे बढ़ा। पूर्वी पाकिस्तान में पाकिस्तानी सेना के खिलाफ भारतीय सेना और मुक्ति वाहिनी की कार्रवाई निर्णायक चरण में पहुंची। महज 13 दिनों बाद, 16 दिसंबर 1971 को ढाका में पाकिस्तानी सेना ने आत्मसमर्पण किया और बांग्लादेश एक स्वतंत्र देश के रूप में अस्तित्व में आया।

इस पूरी कहानी में Rameshwar Nath Kao की भूमिका इसलिए महत्वपूर्ण मानी जाती है क्योंकि उन्होंने भारत के बाहरी खुफिया तंत्र को एक व्यवस्थित रूप देने में बड़ी भूमिका निभाई। उनका जोर सिर्फ सूचनाएं इकट्ठी करने पर नहीं था, बल्कि ऐसे पेशेवर नेटवर्क और कार्यसंस्कृति तैयार करने पर था जिसमें संवेदनशील सूचनाओं को हासिल करना, उनका विश्लेषण करना और सही समय पर निर्णय लेने वालों तक पहुंचाना संभव हो।

1971 के युद्ध की यह कहानी यह भी दिखाती है कि खुफिया युद्ध हमेशा बंदूक और सीमा के दिखाई देने वाले मोर्चे पर नहीं होता। कई बार एक एजेंट की दी हुई सूचना, किसी अधिकारी का विश्लेषण और सही समय पर जारी की गई चेतावनी युद्ध की दिशा पर असर डाल सकती है। पाकिस्तान के भीतर से मिली उस सूचना ने भारत को 3 दिसंबर के हवाई हमले से पहले सतर्क कर दिया था।

1971 की जीत को अक्सर 13 दिनों की सैन्य कार्रवाई और 16 दिसंबर के आत्मसमर्पण के रूप में याद किया जाता है। लेकिन उस जीत के पीछे महीनों से चल रही खुफिया तैयारी भी थी। पाकिस्तान की योजनाओं की जानकारी समय रहते जुटाना, उसे सही जगह पहुंचाना और उसके आधार पर भारतीय वायुसेना को तैयार करना उस दौर की खुफिया व्यवस्था की अहम भूमिका को सामने लाता है। Rameshwar Nath Kao और K Sankaran Nair की यह कहानी इसी अदृश्य मोर्चे की याद दिलाती है—जहां युद्ध शुरू होने से पहले ही एक महत्वपूर्ण लड़ाई लड़ी जा चुकी थी।

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