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पवन खेड़ा ने शेयर किया अश्नीर ग्रोवर का वीडियो: ‘यूपीआई पर शुल्क असल में टैक्स है?’ BJP सरकार पर कांग्रेस का सीधा हमला

राजनीति/ अर्थव्यवस्था | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 सितंबर 2026

अश्नीर ग्रोवर के सवाल को हथियार बनाकर पवन खेड़ा का BJP पर हमला

यूपीआई पर 2,000 रुपये से ऊपर के चुनिंदा दुकानदारों वाले भुगतान पर 0.4% एमडीआर लागू करने के फैसले को लेकर राजनीतिक घमासान तेज हो गया है। इसी बीच कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने भारतपे के पूर्व एमडी अश्नीर ग्रोवर का वीडियो साझा करते हुए BJP सरकार पर तीखा हमला बोला है। ग्रोवर ने सवाल उठाया था कि जब यूपीआई से व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान पर कोई शुल्क नहीं है, तो दुकानदार को किए जाने वाले बड़े भुगतान पर शुल्क लगाने का तर्क क्या है। 15 अक्टूबर 2026 से 2,000 रुपये से ऊपर के व्यक्ति-से-दुकानदार यूपीआई भुगतान पर 0.4% एमडीआर लागू होना है, जबकि व्यक्ति-से-व्यक्ति भुगतान मुफ्त रहेगा।

पवन खेड़ा बोले—‘यह टैक्स जैसा ही है’

पवन खेड़ा ने अश्नीर ग्रोवर के वीडियो को साझा करते हुए आरोप लगाया कि सरकार एमडीआर को एक नए तरह के टैक्स के रूप में पेश कर रही है। उनका तर्क है कि फिनटेक क्षेत्र घाटे में नहीं चल रहा और इसलिए भुगतान व्यवस्था को बनाए रखने के नाम पर दुकानदारों पर अतिरिक्त लागत डालने के फैसले पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

कांग्रेस का हमला यही है कि अगर डिजिटल भुगतान व्यवस्था इतनी बड़ी और सफल है, तो उसकी लागत का समाधान व्यापारी से शुल्क लेकर ही क्यों निकाला जाए? और अगर शुल्क व्यापारी देगा, तो भविष्य में उसका असर वस्तुओं और सेवाओं की कीमतों पर पड़ने की आशंका से इनकार कैसे किया जा सकता है?

अश्नीर ग्रोवर का सवाल—‘इसमें सरकार का कौन सा खर्च आता है?’

ग्रोवर ने बेहद सीधा उदाहरण देते हुए कहा कि अगर कोई व्यक्ति अपने दोस्त को 1 लाख रुपये यूपीआई करता है तो शुल्क नहीं लगता, लेकिन दुकानदार को 2,500 रुपये देने पर शुल्क लगाने की व्यवस्था क्यों बनाई जा रही है? उनका सवाल है—लेन-देन तो दोनों जगह डिजिटल है, फिर व्यापारी वाले भुगतान की अलग कीमत क्यों?

उन्होंने आरबीआई के सरप्लस, बैंकों के मुनाफे और एनपीसीआई के मुनाफे का हवाला देते हुए भी सवाल उठाया कि अगर भुगतान व्यवस्था में पैसा आ रहा है तो फिर व्यापारी से अतिरिक्त वसूली की जरूरत क्यों है।

हालांकि यहां एक तथ्य स्पष्ट करना जरूरी है—सरकार और भुगतान उद्योग का तर्क है कि यूपीआई के विशाल नेटवर्क को चलाने, साइबर सुरक्षा, धोखाधड़ी रोकने, तकनीकी ढांचे और ग्राहक सेवा पर लगातार खर्च होता है। सरकार ने इसी आधार पर यूपीआई के लंबे समय तक टिकाऊ वित्तीय मॉडल की जरूरत बताई है।

असल फैसला अब साफ हो चुका है—2,000 से ऊपर 0.4% एमडीआर

इस मुद्दे पर अब सिर्फ संभावना की बात नहीं है। एनपीसीआई ने 15 अक्टूबर से 2,000 रुपये से ऊपर के व्यक्ति-से-दुकानदार यूपीआई भुगतान पर 0.4% एमडीआर की घोषणा की है। 75,000 रुपये या उससे अधिक के सामान्य व्यापारी भुगतान पर शुल्क की अधिकतम सीमा 300 रुपये प्रति लेन-देन रखी गई है। रेलवे, दूरसंचार, बीमा और ईंधन जैसे कुछ क्षेत्रों के लिए 5 रुपये की तय दर बताई गई है।

लेकिन ग्राहक से सीधे पैसा नहीं लिया जाएगा

यहां सरकार की स्थिति भी साफ समझना जरूरी है। ग्राहक के बैंक खाते से यूपीआई इस्तेमाल करने का अलग शुल्क नहीं काटा जाएगा। व्यक्ति-से-व्यक्ति यूपीआई भुगतान भी मुफ्त रहेगा। नया एमडीआर मुख्य रूप से व्यापारी पक्ष पर लागू होगा। एनपीसीआई ने भी कहा है कि दुकानदारों पर लगाया गया एमडीआर ग्राहक से अलग से वसूल नहीं किया जा सकता।

लेकिन पवन खेड़ा और अश्नीर ग्रोवर जैसे आलोचकों का सवाल यही है कि अगर व्यापारी की लागत बढ़ती है तो वह लागत आखिरकार कहां जाएगी? व्यापारी उसे खुद वहन करेगा, मुनाफे में कटौती करेगा या अपने कारोबार की कीमतों में किसी रूप में शामिल करेगा—यह आगे की बड़ी बहस है।

यूपीआई मुफ्त रहेगा, लेकिन कारोबार की लागत बढ़ सकती है?

यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत उसकी सरलता रही है। ग्राहक ने क्यूआर कोड स्कैन किया, पैसा भेजा और भुगतान खत्म। लेकिन अब बड़े व्यापारी भुगतान पर एमडीआर आने से डिजिटल भुगतान व्यवस्था में एक नया आर्थिक मॉडल बन रहा है।

2025-26 में 2,000 रुपये से ऊपर के व्यक्ति-से-दुकानदार भुगतान कुल संख्या का सिर्फ करीब 4% थे, लेकिन इन्हीं लेन-देन में यूपीआई के कुल भुगतान मूल्य का लगभग दो-तिहाई शामिल था। यानी संख्या कम है, लेकिन इन बड़े भुगतान का पैसा बहुत ज्यादा है।

कांग्रेस का बड़ा सवाल—फिर फायदा किसे और बोझ किस पर?

यहीं से पवन खेड़ा का राजनीतिक हमला तेज होता है। कांग्रेस का कहना है कि अगर एमडीआर से भुगतान कंपनियों, बैंकों और पूरे डिजिटल भुगतान उद्योग को नया राजस्व मिलेगा, तो सरकार को यह भी साफ बताना चाहिए कि इस व्यवस्था का वास्तविक फायदा किसे होगा और लागत कौन उठाएगा।

ब्रोकरेज फर्म बर्नस्टीन का अनुमान है कि अगर 40 बेसिस पॉइंट यानी 0.4% एमडीआर को यूपीआई के आधे लेन-देन मूल्य पर लागू किया जाए तो वित्त वर्ष 2028 तक करीब 22,000 करोड़ रुपये सालाना का राजस्व पूल बन सकता है। यानी मामला छोटा नहीं है—यूपीआई अब सिर्फ भुगतान की सुविधा नहीं, बल्कि बहुत बड़ा आर्थिक बाजार भी बन चुका है।

यही वजह है कि अश्नीर ग्रोवर का वीडियो कांग्रेस के लिए बड़ा हथियार बना

पवन खेड़ा ने जिस वीडियो को साझा किया है, उसमें ग्रोवर का सवाल सरकार के सामने बिल्कुल सीधे तरीके से खड़ा होता है—जब यूपीआई से होने वाले भुगतान की संख्या और रकम दोनों इतनी विशाल हैं, तो इसकी लागत का मॉडल क्या होना चाहिए?

कांग्रेस इस मुद्दे को सिर्फ तकनीकी बदलाव नहीं मान रही। वह इसे आम दुकानदार, छोटे कारोबारी और डिजिटल अर्थव्यवस्था से जुड़े करोड़ों लोगों की जेब से जोड़ रही है।

‘सरकार से सवाल पूछना गोदी मीडिया का काम क्यों नहीं?’

पवन खेड़ा के हमले का दूसरा निशाना मीडिया भी है। कांग्रेस का आरोप है कि सरकार के फैसलों पर गंभीर सवाल उठाने के बजाय कई मीडिया प्लेटफॉर्म अक्सर सरकारी सफाई को ही मुख्य खबर बना देते हैं।

लेकिन यहां सवाल बेहद सरल है—अगर सरकार कह रही है कि ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा, तो व्यापारी से कितना लिया जाएगा, क्यों लिया जाएगा और उसका आर्थिक असर क्या होगा?

इन सवालों का जवाब सरकार और एनपीसीआई को आंकड़ों के साथ देना चाहिए। सिर्फ यह कह देना कि “ग्राहक से शुल्क नहीं लिया जाएगा” पूरी बहस खत्म नहीं करता।

यूपीआई की सफलता को कमाई का जरिया बनाना सही या गलत?

यूपीआई ने भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था को नई पहचान दी है। लेकिन अब सवाल यह है कि क्या इसे लंबे समय तक सरकारी सहायता और दूसरे स्रोतों के सहारे चलाया जाए या बड़े व्यापारिक भुगतान पर शुल्क लगाकर इसके लिए नया राजस्व मॉडल बनाया जाए।

सरकार का तर्क है कि साइबर सुरक्षा, बुनियादी ढांचे, नवाचार और बढ़ते लेन-देन की जरूरतों के लिए टिकाऊ वित्तीय मॉडल जरूरी है। दूसरी तरफ आलोचकों का सवाल है कि अगर शुल्क लगाया ही जा रहा है तो इसकी दर, दायरा और आर्थिक बोझ पूरी तरह पारदर्शी क्यों न हो?

असली सवाल—‘पैसा कौन देगा?’

पवन खेड़ा ने अश्नीर ग्रोवर के वीडियो को साझा करके जो राजनीतिक सवाल उठाया है, उसकी ताकत इसी एक सवाल में है—यूपीआई की कीमत आखिर कौन चुकाएगा?

सरकार कह रही है कि आम ग्राहक से सीधे शुल्क नहीं लिया जाएगा। लेकिन व्यापारी पर एमडीआर आने के बाद उसका कारोबार पर क्या असर होगा, यह देखने वाली बात होगी। और अगर व्यापारी की लागत बढ़ती है, तो क्या बाजार में सामान और सेवाओं की कीमतें भी प्रभावित हो सकती हैं?

यूपीआई को मजबूत करना है तो सवाल भी मजबूत होने चाहिए। सरकार से पूछा जाना चाहिए—अगर 2,000 रुपये तक भुगतान मुफ्त रह सकता है, तो उससे ऊपर के भुगतान पर 0.4% एमडीआर लगाने की जरूरत क्यों पड़ी? इस पैसे का अंतिम फायदा किसे मिलेगा? और सबसे बड़ा सवाल—क्या डिजिटल इंडिया की सफलता का अगला बिल अब दुकानदार के नाम पर आने वाला है?

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