व्यापार/ डिजिटल भुगतान/ टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 15 सितंबर 2026
यूपीआई पर शुल्क का सवाल, अश्नीर ग्रोवर ने सीधे सरकार को घेरा
भारत में डिजिटल भुगतान की पहचान बन चुके यूपीआई को लेकर भारतपे के पूर्व एमडी अश्नीर ग्रोवर ने मोदी सरकार पर बेहद तीखा हमला बोला है। उन्होंने एक बेहद सीधा सवाल उठाया है—अगर कोई व्यक्ति अपने दोस्त को 1 लाख रुपये यूपीआई से भेजता है तो कोई शुल्क नहीं लगता, लेकिन वही व्यक्ति किसी दुकानदार को 2,500 रुपये का भुगतान करता है तो दुकानदार से शुल्क लेने की बात क्यों हो रही है? आखिर इस लेन-देन में ऐसा क्या बदल जाता है कि एक भुगतान मुफ्त है और दूसरे भुगतान पर शुल्क लगाने की जरूरत पड़ती है?
‘इसका क्या लॉजिक है?’—ग्रोवर का सीधा सवाल
अश्नीर ग्रोवर ने इसी अंतर को लेकर सरकार और व्यवस्था पर सवाल उठाया। उनका कहना है कि अगर यूपीआई के जरिए 2,500 रुपये का भुगतान किसी दुकानदार को किया जाता है, तो उससे शुल्क लेने का तर्क आखिर क्या है? उन्होंने पूछा कि इस भुगतान को कराने में सरकार का ऐसा कौन-सा अतिरिक्त खर्च आता है, जिसके नाम पर दुकानदार से पैसा लिया जाना चाहिए?
उनका सवाल सिर्फ 2,500 रुपये के भुगतान का नहीं है। असली सवाल यह है कि जिस डिजिटल भुगतान व्यवस्था को देश की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है, उसी व्यवस्था की लागत अब आखिर किससे वसूलने की तैयारी है?
आरबीआई के सरप्लस से लेकर बैंकों के मुनाफे तक ग्रोवर ने रखे आंकड़े
ग्रोवर ने अपनी बात को सिर्फ भावनात्मक बयान तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने आरबीआई, बैंकों और एनपीसीआई के आंकड़ों का हवाला देते हुए पूछा कि जब पूरी व्यवस्था में पैसा मौजूद है और यूपीआई को लेकर कोई बड़ा घाटा सामने नहीं है, तो दुकानदारों से शुल्क वसूलने की जरूरत आखिर क्यों पड़ रही है।
उनके मुताबिक, आरबीआई ने करीब 3 लाख करोड़ रुपये का सरप्लस सरकार को दिया है। 2026 में सभी बैंकों का कुल मुनाफा करीब 4 लाख करोड़ रुपये है और एनपीसीआई का प्री-टैक्स मुनाफा करीब 1,900 करोड़ रुपये है। ग्रोवर का तर्क है कि जब व्यवस्था में इतना पैसा और मुनाफा मौजूद है, तो फिर छोटे-बड़े दुकानदारों पर अतिरिक्त भुगतान का बोझ डालने का औचित्य क्या है?
‘जब नुकसान किसी को नहीं है तो दुकानदारों से वसूली किस बात की?’
ग्रोवर का सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर यूपीआई के मौजूदा ढांचे में किसी पक्ष को ऐसा भारी नुकसान नहीं हो रहा, तो दुकानदार से शुल्क लेने की जरूरत क्यों पैदा हुई? उनका कहना है कि इस पूरे मामले में सरकार को साफ-साफ बताना चाहिए कि शुल्क क्यों लगाया जा रहा है और इसका वास्तविक फायदा किसे होगा।
उन्होंने बेहद आक्रामक अंदाज में इसे “सरकारी मूर्खता” तक बताया और कहा कि उन्होंने इससे बड़ी सरकारी मूर्खता नहीं देखी।
यूपीआई बना तो देश की जेब और कारोबार दोनों आसान हुए
यूपीआई ने भारत में भुगतान का तरीका ही बदल दिया। सड़क किनारे चाय बेचने वाले से लेकर बड़े कारोबारी तक, आज कुछ सेकंड में मोबाइल से भुगतान स्वीकार कर सकते हैं। ग्राहक को नकद रखने की जरूरत कम हुई और दुकानदार के लिए भुगतान लेना आसान हुआ।
यही वजह है कि यूपीआई सिर्फ एक तकनीकी प्लेटफॉर्म नहीं रहा, बल्कि आम भारतीय की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है। ग्रोवर का सवाल इसी बिंदु पर सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है—जिस व्यवस्था को व्यापक इस्तेमाल और कम लागत वाले डिजिटल भुगतान के लिए बनाया गया, क्या उसकी लागत अब धीरे-धीरे व्यापारी पर डालने की कोशिश की जा रही है?
दुकानदार पर खर्च बढ़ा तो आखिर पैसा कौन देगा?
यूपीआई भुगतान पर किसी भी तरह की अतिरिक्त लागत का सबसे बड़ा सवाल यह है कि उसका अंतिम भार कौन उठाएगा। अगर दुकानदार को हर डिजिटल लेन-देन पर शुल्क देना पड़ा, तो उसके सामने दो रास्ते होंगे—या तो वह अपनी कमाई में से यह खर्च उठाए या फिर अपने सामान और सेवाओं की कीमत में किसी न किसी तरीके से इस लागत को शामिल करे।
यानी सवाल सिर्फ दुकानदार की जेब का नहीं है। अगर कारोबारी की लागत बढ़ती है, तो उसका असर आखिरकार ग्राहक तक पहुंचने की आशंका भी रहती है। यही वह बिंदु है जिस पर सरकार को स्पष्ट जवाब देना चाहिए।
छोटे दुकानदारों के लिए हर छोटी लागत भी बड़ी होती है
बड़ी कंपनियों के लिए किसी भुगतान प्रणाली का छोटा शुल्क शायद मामूली दिखाई दे, लेकिन छोटे दुकानदार, रेहड़ी-पटरी वाले, छोटे कारोबारी और कम मार्जिन पर काम करने वाले व्यापारियों के लिए लगातार होने वाले डिजिटल लेन-देन की लागत मायने रखती है।
अगर हर दिन सैकड़ों यूपीआई भुगतान होते हैं, तो छोटी-सी फीस भी महीने के अंत में एक बड़ी रकम बन सकती है। इसलिए ग्रोवर का सवाल केवल बड़े व्यापारियों का सवाल नहीं है, बल्कि डिजिटल अर्थव्यवस्था में शामिल करोड़ों छोटे कारोबारियों के हित से भी जुड़ा हुआ है।
क्या यूपीआई की सफलता की कीमत अब व्यापारी चुकाएगा?
यूपीआई की सबसे बड़ी ताकत यही रही है कि इसने भुगतान को आसान बनाया और इसके इस्तेमाल को बड़े पैमाने पर बढ़ाया। अगर व्यापारी को यह महसूस होने लगे कि डिजिटल भुगतान स्वीकार करने पर उसे अतिरिक्त लागत उठानी पड़ेगी, तो इससे डिजिटल भुगतान को बढ़ावा देने की पूरी नीति पर भी सवाल उठ सकते हैं।
यही वजह है कि सरकार को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि शुल्क लगाया जा सकता है या नहीं। उसे यह भी बताना होगा कि किस भुगतान पर, किससे, कितना और क्यों शुल्क लिया जाएगा।
ग्रोवर का हमला सिर्फ फीस पर नहीं, सरकारी सोच पर है
अश्नीर ग्रोवर की नाराज़गी का असली निशाना केवल कोई एक शुल्क नहीं है। वह उस सोच पर सवाल उठा रहे हैं जिसमें पहले डिजिटल भुगतान को बढ़ावा दिया जाता है और फिर उसकी लागत को लेकर नए सवाल खड़े होते हैं।
उनका तर्क है कि अगर बैंक अरबों रुपये का मुनाफा कमा रहे हैं, आरबीआई सरकार को भारी सरप्लस दे रहा है और एनपीसीआई भी मुनाफे में है, तो फिर दुकानदारों और छोटे कारोबारियों से अतिरिक्त पैसा लेने की जरूरत का ठोस आर्थिक कारण सामने आना चाहिए।
और यहीं सवाल मीडिया पर भी खड़ा होता है
सबसे दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि ऐसी बहस में कई बार असली सवाल पर चर्चा करने के बजाय राजनीतिक नैरेटिव की लड़ाई शुरू हो जाती है। सरकार से यह पूछा जाना चाहिए कि यूपीआई की लागत का मॉडल क्या है, शुल्क का प्रस्ताव क्यों आया, इसका बोझ किस पर पड़ेगा और आम ग्राहक पर इसका अप्रत्यक्ष असर क्या होगा?
लेकिन अगर सवाल पूछने के बजाय सरकार के बचाव में पूरा नैरेटिव खड़ा कर दिया जाए, तो समस्या और बड़ी हो जाती है। गोदी मीडिया का काम सरकार का प्रवक्ता बनना नहीं, सरकार से सवाल पूछना है।
यूपीआई को बचाना है तो सवाल पूछना भी जरूरी है
भारत ने यूपीआई के जरिए दुनिया के सामने डिजिटल भुगतान का एक बेहद मजबूत मॉडल रखा है। लेकिन किसी भी व्यवस्था की सफलता सिर्फ इस बात से तय नहीं होती कि उसका इस्तेमाल कितना हो रहा है। यह भी देखना पड़ता है कि उसकी लागत कौन उठा रहा है और उसका फायदा किसे मिल रहा है।
अश्नीर ग्रोवर का सवाल इसलिए सीधा और महत्वपूर्ण है—अगर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति को 1 लाख रुपये यूपीआई से भेज सकता है और उससे कोई शुल्क नहीं लिया जाता, तो दुकानदार को 2,500 रुपये देने पर शुल्क क्यों? आखिर इस लेन-देन में ऐसा क्या बदल गया कि व्यापारी भुगतान करे?
सरकार को इसका साफ जवाब देना चाहिए—यूपीआई की सफलता का खर्च आखिर दुकानदार क्यों उठाए? और अगर नुकसान किसी को नहीं हो रहा, जैसा ग्रोवर सवाल उठा रहे हैं, तो फिर यह शुल्क लगाने की जरूरत पैदा ही क्यों हुई?



