अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 15 सितंबर 2026
ट्रंप की योजना पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई ब्रेक
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को डाक से होने वाली वोटिंग यानी मेल-इन बैलेट के मामले में सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने ट्रंप प्रशासन की उस योजना को आगे बढ़ने से रोक दिया है, जिसके तहत नवंबर में होने वाले मध्यावधि चुनाव से पहले डाक से भेजे जाने वाले मतपत्रों के लिए नए नियम लागू किए जाने थे। अदालत ने निचली अदालत के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसने अमेरिकी डाक सेवा यानी यूएसपीएस को इन नए नियमों पर आगे बढ़ने से अस्थायी रूप से रोक दिया था।
ट्रंप ने मार्च में जारी किया था कार्यकारी आदेश
डोनाल्ड ट्रंप ने मार्च में एक कार्यकारी आदेश जारी किया था। इसमें अमेरिकी डाक सेवा को डाक से आने वाले मतपत्रों के लिए नए नियम बनाने का निर्देश दिया गया था। प्रस्तावित व्यवस्था में मतपत्रों के लिफाफों पर विशेष बारकोड लगाने और डाक से वोट पाने वाले मतदाताओं की जानकारी एक ऑनलाइन व्यवस्था में उपलब्ध कराने जैसे कदम शामिल थे। ट्रंप प्रशासन का तर्क था कि इससे चुनावी धोखाधड़ी और गैर-नागरिकों द्वारा मतदान जैसी समस्याओं से निपटने में मदद मिलेगी। हालांकि, राज्यों और चुनाव अधिकारियों ने इन बदलावों के समय और कानूनी अधिकार को लेकर गंभीर आपत्ति जताई।
अदालत ने कहा—चुनाव के इतने करीब नियम बदलना ठीक नहीं
सुप्रीम कोर्ट के फैसले में सबसे अहम बात यह है कि अदालत ने फिलहाल नए नियमों को 2026 के मध्यावधि चुनाव में लागू होने से रोक दिया है। अदालत के कंजरवेटिव जज ब्रेट कावानॉ ने भी इस फैसले का समर्थन किया, हालांकि उन्होंने संकेत दिया कि मुकदमा आगे बढ़ने पर अंतिम फैसला अलग हो सकता है और भविष्य में ट्रंप प्रशासन के पक्ष में फैसला आने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।
कावानॉ के अनुसार, अंतिम नियम कुछ हद तक डाक सेवा के कानूनी अधिकार के दायरे में आ सकता है, लेकिन 2026 के चुनाव में इसे इतनी जल्दी लागू करना मनमाना और अनुचित हो सकता है।
24 राज्यों ने भी जताई थी बड़ी चिंता
ट्रंप की योजना के खिलाफ 24 डेमोक्रेटिक नेतृत्व वाले राज्यों और वॉशिंगटन डीसी के चुनाव अधिकारियों ने अदालत में चिंता जताई थी। उनका कहना था कि चुनाव से ठीक पहले नियम बदलने से स्थानीय चुनाव व्यवस्था में भारी भ्रम पैदा हो सकता है और बड़ी संख्या में मतदाताओं के मतपत्र समय पर पहुंचने में समस्या हो सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ रिपब्लिकन नेतृत्व वाले राज्यों ने भी ट्रंप की योजना का समर्थन नहीं किया। फ्लोरिडा, लुइसियाना और मोंटाना जैसे राज्यों ने अदालत में राष्ट्रपति के पक्ष में दस्तावेज जरूर दाखिल किए, लेकिन सात रिपब्लिकन राज्य चुनाव अधिकारियों ने भी सुप्रीम कोर्ट को चेतावनी दी कि चुनाव के इतने करीब बड़े बदलाव गलतियों, देरी और भ्रम को जन्म दे सकते हैं।
सबसे बड़ा डर—मतदाता वोट ही न डाल पाए
जॉर्जिया के चेरोकी काउंटी की चुनाव निदेशक ऐनी डोवर ने बीबीसी को बताया कि अगर नए नियम लागू होते तो हजारों लोग मतदान के अधिकार से वंचित हो सकते थे। यह काउंटी 2024 के चुनाव में करीब 69 प्रतिशत वोट ट्रंप के पक्ष में दे चुकी थी। वहां लगभग 10,000 लोगों ने डाक से मतदान किया था।
यानी यह मामला सिर्फ डेमोक्रेटिक मतदाताओं का नहीं है। डाक से मतदान का इस्तेमाल रिपब्लिकन मतदाता भी करते हैं। यही वजह है कि कई स्थानीय चुनाव अधिकारियों ने कहा कि नियम बदलने से किसी एक पार्टी के बजाय पूरी चुनाव व्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
अमेरिका में करीब 30 प्रतिशत मतदाता करते हैं डाक से वोट
अमेरिका में डाक से मतदान कोई छोटी व्यवस्था नहीं है। दो साल पहले हुए आम चुनाव में करीब 30 प्रतिशत मतदाताओं ने डाक के जरिए मतदान किया था और कई राज्यों में इसकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
ओरेगन, वॉशिंगटन और कोलोराडो जैसे राज्यों में तो चुनाव व्यवस्था डाक से मतदान पर काफी हद तक निर्भर करती है। ऐसे राज्यों में अचानक नियम बदलना केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं, बल्कि लाखों मतदाताओं की चुनावी प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
कोलोराडो में पहले ही छप चुके थे मतपत्र
कोलोराडो के एडम्स काउंटी के चुनाव अधिकारी जोश जिगिलबॉम ने अदालत के फैसले से पहले बताया था कि अगर नए नियम लागू करने पड़े तो इसका असर बहुत बड़ा और खर्चीला होगा। वहां मतपत्रों के लिफाफे पहले ही छप चुके थे।
ऐसे में नियम बदलने का मतलब नए लिफाफे और दूसरी चुनाव सामग्री तैयार करना हो सकता था। चुनाव अधिकारियों ने इसी खतरे को देखते हुए पहले से वैकल्पिक योजनाएं बनानी शुरू कर दी थीं।
निचली अदालत से ही ट्रंप प्रशासन को मिल रही थी चुनौती
ट्रंप की योजना को सबसे पहले बोस्टन की संघीय जज इंदिरा तलवानी ने 4 सितंबर को रोक दिया था। उन्होंने कहा था कि नवंबर के चुनाव के इतने करीब इन बदलावों को लागू करने से मतदाताओं को मतदान से वंचित होने का खतरा है।
इसके बाद अपील अदालत ने भी उस आदेश को रोकने से इनकार कर दिया। रविवार को एक अन्य संघीय जज कार्ल निकोल्स ने भी ट्रंप के आदेश के खिलाफ फैसला दिया। अब सुप्रीम कोर्ट ने भी फिलहाल निचली अदालत के आदेश को बरकरार रखकर ट्रंप प्रशासन की योजना को चुनाव से पहले लागू होने से रोक दिया है।
सुप्रीम कोर्ट में भी पूरी तरह एक राय नहीं
हालांकि सुप्रीम कोर्ट का फैसला ट्रंप के लिए झटका है, लेकिन यह मामला अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। जस्टिस ब्रेट कावानॉ ने संकेत दिया है कि आगे की कानूनी लड़ाई में तस्वीर बदल सकती है। वहीं जस्टिस सैमुअल अलिटो और क्लेरेंस थॉमस ने फैसले से असहमति जताई और ट्रंप के आदेश को व्यापक डाक सेवा अधिकारों के दायरे में बताया।
इसका मतलब साफ है—अभी ट्रंप की योजना रुकी है, लेकिन कानूनी लड़ाई खत्म नहीं हुई है।
ट्रंप खुद भी डाक से वोट कर चुके हैं
इस पूरे विवाद की एक दिलचस्प बात यह भी है कि ट्रंप खुद डाक से मतदान कर चुके हैं। इसके बावजूद वह लंबे समय से मेल-इन वोटिंग को लेकर सवाल उठाते रहे हैं और दावा करते रहे हैं कि इससे गैर-नागरिकों के मतदान और चुनावी धोखाधड़ी का खतरा बढ़ता है।
हालांकि अमेरिकी चुनावों में व्यापक स्तर पर धोखाधड़ी के उनके पुराने दावों को लेकर भी विवाद रहा है। 2020 के राष्ट्रपति चुनाव में हार के बाद ट्रंप ने चुनाव में बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी के दावे किए थे, लेकिन उनके इन दावों को व्यापक प्रमाण नहीं मिला।
जून में भी ट्रंप को मिल चुका है झटका
डाक से मतदान के मामले में यह ट्रंप प्रशासन के लिए पहला बड़ा न्यायिक झटका नहीं है। जून में भी सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि कुछ राज्यों में चुनाव के दिन की मुहर वाले डाक मतपत्रों को चुनाव के बाद प्राप्त होने पर भी गिना जा सकता है। ट्रंप प्रशासन ने देर से पहुंचने वाले ऐसे मतपत्रों की गिनती रोकने की कोशिश की थी।
अब सितंबर में फिर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव से कुछ ही हफ्ते पहले मेल-इन वोटिंग के नियम बदलने की योजना पर ब्रेक लगा दिया है।
नवंबर का चुनाव और भी महत्वपूर्ण
अमेरिका में नवंबर 2026 के मध्यावधि चुनाव होने हैं। इन चुनावों से यह तय होगा कि कांग्रेस के दोनों सदनों में किस पार्टी की पकड़ मजबूत होगी। ऐसे में मतदान के नियमों को लेकर हर बदलाव राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील हो जाता है।
ट्रंप प्रशासन के लिए चुनौती यह है कि वह चुनावी सुरक्षा और धोखाधड़ी रोकने के अपने तर्क को आगे बढ़ाते हुए भी ऐसी व्यवस्था बनाए, जिससे वास्तविक मतदाताओं को वोट डालने में परेशानी न हो।
अब असली सवाल चुनावी अधिकार का
सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला फिलहाल यह सुनिश्चित करता है कि ट्रंप प्रशासन के नए डाक-मतपत्र नियम नवंबर के चुनाव से पहले लागू नहीं होंगे। लेकिन आगे की कानूनी लड़ाई जारी रहेगी और संभव है कि अदालत बाद में नियमों की वैधता पर व्यापक फैसला दे।
अब सवाल सिर्फ ट्रंप बनाम सुप्रीम कोर्ट का नहीं है। सवाल यह है कि चुनाव सुधार और चुनावी सुरक्षा के नाम पर नियम बदलते समय मतदाता के अधिकार को कितना सुरक्षित रखा जाएगा?
क्या चुनाव से कुछ ही हफ्ते पहले मतदान की व्यवस्था बदलना लोकतांत्रिक प्रक्रिया को मजबूत करेगा या लाखों मतदाताओं के लिए नई मुश्किलें पैदा कर सकता है? और क्या अमेरिका जैसे लोकतंत्र में सबसे पहली प्राथमिकता यह नहीं होनी चाहिए कि हर योग्य मतदाता बिना भ्रम, बिना बाधा और बिना डर के अपना वोट डाल सके?



