राष्ट्रीय/उत्तराखंड | ABC NATIONAL NEWS | देहरादून | 13 सितंबर 2026
सरकारी जमीन, निजी फायदा और जनता के हिस्से में सवाल!
उत्तराखंड में सरकारी जमीन को लेकर सियासी संग्राम तेज हो गया है। कांग्रेस ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार पर आरोप लगाया है कि निवेश, विकास और इन्वेस्टमेंट मीट के नाम पर राज्य की बेशकीमती जमीन को निजी संस्थाओं और कंपनियों को फायदा पहुंचाने वाली शर्तों पर दिया जा रहा है। कांग्रेस के नेताओं ने जमीन की कीमत, लीज की अवधि, सब-लीज, निविदा प्रक्रिया, कंपनियों की पात्रता, सरकारी विभागों की मंजूरी और भूमि के वास्तविक उपयोग को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए हैं। इन आरोपों की स्वतंत्र जांच से अंतिम पुष्टि अभी नहीं हुई है, इसलिए इन्हें कांग्रेस के आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए। लेकिन उत्तराखंड जैसे राज्य में, जहां जल-जंगल-जमीन सिर्फ संपत्ति नहीं बल्कि पहचान, आजीविका और भविष्य की पीढ़ियों का सवाल है, वहां इतने गंभीर आरोपों का जवाब केवल राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि दस्तावेजों के साथ देना होगा। सवाल सीधा है—सरकारी जमीन आखिर किसके लिए है, जनता के लिए या चुनिंदा निवेशकों के लिए?
कांग्रेस का सीधा आरोप—‘निवेश’ के नाम पर जमीन का खेल!
उत्तराखंड कांग्रेस के नेताओं का कहना है कि सरकार ने निवेश लाने के नाम पर ऐसी व्यवस्थाएं बनाई हैं जिनसे सरकारी जमीन लंबे समय तक निजी या संस्थागत इस्तेमाल में जा सकती है। कांग्रेस का सवाल है कि जब राज्य के पास सीमित जमीन है, जब पहाड़ों में जमीन का दबाव लगातार बढ़ रहा है और जब राज्य के गठन के बाद से भूमि संरक्षण सबसे संवेदनशील राजनीतिक मुद्दों में रहा है, तो सरकार को जमीन देने से पहले यह बताना चाहिए कि राज्य को बदले में क्या मिलेगा? कितने करोड़ का निवेश आएगा? कितने स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलेगा? कितने स्थानीय कारोबार खड़े होंगे? सरकार को कितनी आय होगी? परियोजना कितने समय में पूरी होगी? और अगर निवेशक शर्तों का पालन नहीं करता तो जमीन वापस लेने की व्यवस्था क्या है? जमीन देना विकास हो सकता है, लेकिन बिना पारदर्शी हिसाब-किताब के जमीन देना सवालों का पहाड़ खड़ा करता है।
यूआईआईडीबी के तहत जमीन—90 साल तक का अधिकार, जवाबदेही कितने साल की?
उत्तराखंड निवेश एवं आधारिक संरचना विकास बोर्ड यानी यूआईआईडीबी के जरिए सरकारी जमीन को लंबे समय की लीज पर देने की व्यवस्था ने इस बहस को और गंभीर बना दिया है। सरकारी जमीन को किसी परियोजना के लिए दशकों तक इस्तेमाल करने का अधिकार देना कोई छोटा फैसला नहीं है। जमीन कागज पर सरकार की रह सकती है, लेकिन अगर किसी संस्था को उस जमीन का लंबे समय तक आर्थिक उपयोग करने का अधिकार मिल जाता है, तो उसका वास्तविक आर्थिक महत्व बहुत बड़ा हो जाता है। ऐसे में सरकार को जनता के सामने साफ करना चाहिए कि किस जमीन की कितने में कीमत तय हुई, किस आधार पर तय हुई, कितने लोगों ने बोली लगाई, किसे जमीन मिली और उस जमीन से राज्य को कितने रोजगार और कितनी आय मिलने वाली है। जनता को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं कि जमीन बेची नहीं गई, लीज पर दी गई है। असली सवाल यह है कि लीज की शर्तों में जनता का हित कितना मजबूत है।
सब-लीज पर कांग्रेस का बड़ा सवाल
कांग्रेस ने लीज की जमीन को आगे सब-लीज देने और लीज के नवीनीकरण की संभावनाओं को लेकर भी सवाल उठाया है। पार्टी का आरोप है कि ऐसी व्यवस्था में मूल बोली लगाने वाला व्यक्ति या संस्था कम शुरुआती रकम देकर जमीन पर अधिकार हासिल कर सकता है और बाद में उस अधिकार का आर्थिक लाभ किसी दूसरे पक्ष को पहुंचा सकता है। यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि हर सरकारी लीज में सब-लीज अपने आप अवैध नहीं होती और अलग-अलग योजनाओं में अलग नियम हो सकते हैं। इसलिए असली जांच संबंधित जमीन की मूल लीज डीड और निविदा की शर्तों से ही होगी। अगर किसी जमीन की निविदा में सब-लीज पर रोक थी और फिर भी उसे अनुमति दी गई, तो यह बेहद गंभीर सवाल होगा। और अगर सब-लीज की अनुमति नियमों में थी, तो सरकार को बताना चाहिए कि अनुमति किस अधिकारी ने दी, किस शर्त पर दी और राज्य के हितों की रक्षा कैसे की गई।
25 प्रतिशत जमा, 75 प्रतिशत बाद में—किसके लिए आसान रास्ता?
कांग्रेस ने जमीन की भुगतान व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाया है। पार्टी का आरोप है कि बोली जीतने वाले को शुरुआत में केवल 25 प्रतिशत रकम जमा करनी होती है और बाकी रकम के लिए उसे समय मिलता है। ऐसी भुगतान व्यवस्था अपने आप में भ्रष्टाचार का प्रमाण नहीं है, लेकिन इसके दुरुपयोग की संभावना पर सवाल जरूर उठ सकता है। अगर कोई बोलीदाता कम शुरुआती रकम में जमीन का अधिकार हासिल करता है और उसी अधिकार को आगे अधिक कीमत पर इस्तेमाल या हस्तांतरित करने की स्थिति में पहुंच जाता है, तो सवाल उठेगा कि सरकार ने जमीन का आर्थिक लाभ किसे दिया और वास्तविक फायदा किसे मिला? क्या सरकार ने यह सुनिश्चित किया कि बोली लगाने वाला खुद परियोजना विकसित करेगा? क्या उसके पास पर्याप्त पूंजी थी? क्या उसकी वित्तीय क्षमता की जांच हुई? और अगर उसने बाद में अधिकार किसी दूसरे पक्ष को दिया तो राज्य को उसका हिस्सा मिला या नहीं?
सिडकुल की 23,137 वर्गमीटर जमीन—टेंडर से लेकर कंपनी तक सवाल
कांग्रेस ने सिडकुल क्षेत्र में अस्पताल के लिए लगभग 23,137 वर्गमीटर जमीन से जुड़ी प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए हैं। कांग्रेस के अनुसार 13 दिसंबर 2024 को अस्पताल परियोजना के लिए निविदा निकाली गई थी, लेकिन बाद में फरवरी 2025 में इसे निरस्त कर दिया गया और फिर दूसरी कंपनी से जुड़ी प्रक्रिया आगे बढ़ी। कांग्रेस का आरोप है कि इस पूरे घटनाक्रम में स्वास्थ्य विभाग को पर्याप्त जानकारी नहीं दी गई और बाद में जिस कंपनी या समूह को परियोजना से जोड़ने की कोशिश हुई, उसकी तकनीकी और वित्तीय पात्रता पर भी सवाल थे। अगर यह आरोप गलत है तो सरकार के पास इसका जवाब बेहद आसान है—टेंडर से लेकर अंतिम निर्णय तक पूरी फाइल सार्वजनिक कर दीजिए। तकनीकी मूल्यांकन क्या था, वित्तीय दस्तावेज क्या थे, पात्रता किसने जांची और किस समिति ने अंतिम फैसला लिया—हर सवाल का जवाब रिकॉर्ड में होना चाहिए।
सिक्का डेवलपर्स को लेकर कांग्रेस ने लगाए गंभीर आरोप
कांग्रेस ने इस मामले में सिक्का डेवलपर्स का नाम लेते हुए नोएडा प्राधिकरण से जुड़ी कार्रवाई, आर्थिक देनदारियों और अन्य कानूनी विवादों का हवाला दिया है। कांग्रेस की ओर से दावा किया गया है कि कंपनी पर बड़ी रकम की देनदारी और नियामकीय कार्रवाई हुई है। लेकिन यहां एक जरूरी बात साफ है—किसी कंपनी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई या आर्थिक देनदारी होना अपने आप यह साबित नहीं करता कि उसने उत्तराखंड की किसी निविदा में भी नियम तोड़ा है। इसलिए असली सवाल कंपनी पर आरोप लगाने से ज्यादा यह है कि उत्तराखंड सरकार ने उसकी पात्रता कैसे जांची। क्या वित्तीय क्षमता देखी गई? क्या पिछले कामों का रिकॉर्ड देखा गया? क्या सभी बोलीदाताओं के लिए समान मानदंड लागू हुए? अगर हां, तो सरकार वह मूल्यांकन रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं करती?
छरबा की 325 बीघा जमीन—122 करोड़ बनाम 244 करोड़ का सवाल
कांग्रेस ने छरबा क्षेत्र की लगभग 325 बीघा जमीन को पेट्रोलियम विश्वविद्यालय यानी यूपीईएस को दिए जाने पर सबसे बड़ा सवाल जमीन की कीमत को लेकर उठाया है। कांग्रेस के अनुसार यह जमीन पहले छोटे उद्यमियों और कारोबार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अधिग्रहित की गई थी, लेकिन बाद में इसे विश्वविद्यालय को दे दिया गया। पार्टी का दावा है कि जमीन करीब 122.36 करोड़ रुपये, यानी लगभग 37.65 लाख रुपये प्रति बीघा के हिसाब से दी गई, जबकि कांग्रेस के अनुसार उस समय बाजार मूल्य करीब 1.5 करोड़ रुपये प्रति बीघा था। कांग्रेस ने यह भी दावा किया कि जमीन दिए जाने के लगभग तीन महीने बाद सर्किल रेट बढ़ा और नई दर करीब 75.20 लाख रुपये प्रति बीघा हो गई, जिससे उसके हिसाब से जमीन का मूल्य करीब 244 करोड़ रुपये बैठता है। अगर इन आंकड़ों की दस्तावेजों से पुष्टि होती है तो यह सामान्य प्रशासनिक फैसला नहीं रहेगा, बल्कि सरकार के भूमि मूल्यांकन और सार्वजनिक संपत्ति प्रबंधन पर बहुत बड़ा सवाल होगा।
अगर बाजार मूल्य ज्यादा था तो नीलामी क्यों नहीं?
यहीं कांग्रेस का सबसे तीखा सवाल सामने आता है—अगर जमीन इतनी मूल्यवान थी तो सरकार ने खुली नीलामी क्यों नहीं कराई? अगर किसी विश्वविद्यालय को जमीन देना सार्वजनिक हित में था तो क्या सरकार ने स्वतंत्र मूल्यांकन कराया? क्या दूसरे संस्थानों को भी समान अवसर दिया गया? क्या जमीन की कीमत तय करते समय भविष्य का मूल्य ध्यान में रखा गया? और क्या विश्वविद्यालय को जमीन देने से मिलने वाला शैक्षणिक, रोजगार और आर्थिक लाभ किसी दस्तावेज में दर्ज किया गया? सरकारी जमीन का कम मूल्य पर आवंटन तभी उचित ठहराया जा सकता है जब उसके पीछे मजबूत सार्वजनिक उद्देश्य और स्पष्ट आर्थिक-सामाजिक लाभ हो। सिर्फ यह कह देना कि इससे निवेश आएगा, जनता के सवाल का पूरा जवाब नहीं है।
तीन महीने बाद सर्किल रेट बदला—संयोग या सवाल?
कांग्रेस ने खास तौर पर यह सवाल उठाया है कि जमीन आवंटित होने के करीब तीन महीने बाद सर्किल रेट में बदलाव हुआ। यह अपने आप में किसी गड़बड़ी का प्रमाण नहीं है, क्योंकि सर्किल रेट प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत बदले जा सकते हैं। लेकिन अगर जमीन के आवंटन और नए सर्किल रेट के बीच इतना कम अंतर था कि जमीन के मूल्य में बहुत बड़ा अंतर दिखाई देने लगा, तो सरकार को पूरा रिकॉर्ड सार्वजनिक करना चाहिए। पुराना सर्किल रेट क्या था? नया सर्किल रेट किस आधार पर तय हुआ? मूल्यांकन समिति ने क्या रिपोर्ट दी? जमीन आवंटित करते समय किस दर को आधार बनाया गया? इन सवालों का जवाब दस्तावेजों से ही मिल सकता है।
इन्वेस्टमेंट मीट या जमीन बांटने का मॉडल?
कांग्रेस ने उत्तराखंड की इन्वेस्टमेंट मीट को भी निशाने पर लेते हुए आरोप लगाया है कि निवेश आकर्षित करने के नाम पर सरकारी जमीन को निजी और बाहरी संस्थाओं तक पहुंचाने का रास्ता तैयार किया गया। यहां सरकार के सामने भी एक महत्वपूर्ण तर्क है—उत्तराखंड को उद्योग चाहिए, अस्पताल चाहिए, विश्वविद्यालय चाहिए, पर्यटन चाहिए, रोजगार चाहिए और पलायन रोकने के लिए आर्थिक अवसर चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या निवेश लाने के लिए जनता की संपत्ति को जरूरत से ज्यादा सस्ता करना जरूरी है? अगर कोई कंपनी करोड़ों का निवेश करती है और हजारों रोजगार पैदा करती है तो जमीन देना समझ में आता है। लेकिन अगर निवेश का बड़ा हिस्सा जमीन के मूल्य में ही पैदा होने वाले लाभ में चला जाए और स्थानीय जनता को सीमित फायदा मिले, तो नीति पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जल-जंगल-जमीन—उत्तराखंड की सबसे संवेदनशील विरासत
उत्तराखंड का सवाल बाकी राज्यों से अलग है। यहां जमीन का मतलब सिर्फ प्लॉट नहीं है। एक जमीन के साथ जंगल जुड़ा है, पानी जुड़ा है, स्थानीय समुदाय जुड़ा है, खेती जुड़ी है, पर्यटन जुड़ा है और आने वाली पीढ़ियों का भविष्य जुड़ा है। राज्य बनने के समय भूमि संरक्षण और स्थानीय लोगों के अधिकार का सवाल आंदोलन की प्रमुख चिंताओं में रहा। इसलिए जब हजारों बीघा सरकारी जमीन के इस्तेमाल की बात होती है, तो सरकार को सिर्फ निवेश का आंकड़ा नहीं बताना चाहिए। उसे यह भी बताना चाहिए कि इस जमीन के इस्तेमाल से स्थानीय जनता को क्या मिला और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या बचा?
भू-कानून में बदलावों पर भी कांग्रेस का हमला
कांग्रेस नेता मनोज रावत ने उत्तराखंड के भूमि कानूनों में समय-समय पर हुए बदलावों को लेकर भी बीजेपी सरकारों पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने भूमि कानून की धाराओं में हुए बदलावों का हवाला देते हुए दावा किया कि इससे बाहरी लोगों के लिए उत्तराखंड में जमीन खरीदने और उसका उपयोग करने के रास्ते आसान हुए। इन दावों की कानूनी व्याख्या अलग-अलग प्रावधानों के आधार पर करनी होगी, लेकिन राजनीतिक सवाल साफ है—जिस राज्य को बनाने के पीछे पहाड़ की जमीन और स्थानीय पहचान बचाने की चिंता थी, क्या आज वही जमीन सबसे बड़ा कारोबारी अवसर बनती जा रही है?
सरकारी जमीन पर सबसे पहले जनता का अधिकार होना चाहिए
कांग्रेस के प्रदेश नेताओं का मूल आरोप यही है कि बीजेपी सरकार के दौर में सरकारी जमीन को निवेश का साधन बनाते हुए ऐसे फैसले किए जा रहे हैं जिनसे आम जनता के हितों पर सवाल उठते हैं। कांग्रेस ने यूआईआईडीबी के तहत हजारों बीघा जमीन से जुड़ी प्रक्रियाओं पर भी सवाल उठाए हैं और पूछा है कि जिस जमीन का मूल्यांकन जनता की संपत्ति के रूप में होना चाहिए, उसे निजी या संस्थागत परियोजनाओं के लिए किस आधार पर दिया जा रहा है। यहां सरकार को विपक्ष पर पलटवार करने के बजाय जमीन-दर-जमीन जवाब देना चाहिए। यही पारदर्शिता होगी और यही जनता का अधिकार भी।
सरकार से मांग—एक-एक जमीन का हिसाब सार्वजनिक करो
अब सबसे जरूरी कदम यह होना चाहिए कि यूआईआईडीबी या किसी भी अन्य सरकारी संस्था के जरिए दी गई बड़ी जमीनों की पूरी सूची सार्वजनिक की जाए। किस जिले में कितनी जमीन दी गई? किस संस्था को दी गई? कितने साल की लीज है? जमीन का सरकारी मूल्यांकन कितना था? बोली कितनी लगी? कितने बोलीदाता थे? किसे चुना गया? कितनी रकम जमा हुई? कितनी बाकी है? सब-लीज की अनुमति है या नहीं? परियोजना कब पूरी होनी है? कितने रोजगार का वादा किया गया? अब तक कितना निवेश हुआ? अगर सरकार इन सवालों का जवाब दे देती है तो राजनीतिक आरोपों का बड़ा हिस्सा खुद साफ हो जाएगा। लेकिन अगर रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में हिचकिचाहट होती है, तो सवाल और गहरे होंगे।
आक्रामक सवाल, लेकिन जवाब दस्तावेज से
उत्तराखंड को निवेश चाहिए और निवेश का विरोध करना राज्य के हित में नहीं है। लेकिन निवेश के नाम पर सरकारी जमीन का इस्तेमाल ऐसा विषय है जिसमें पारदर्शिता से कोई समझौता नहीं होना चाहिए। कांग्रेस के आरोप सही हैं या राजनीतिक हैं—इसका अंतिम फैसला जांच और दस्तावेज करेंगे। लेकिन सरकार से सवाल पूछना बिल्कुल जायज है। सरकारी जमीन किसी नेता की निजी संपत्ति नहीं है। यह जनता की संपत्ति है। सरकार सिर्फ उसकी संरक्षक है। इसलिए जनता को यह जानने का पूरा अधिकार है कि उसकी जमीन किसे, कितने में, किस शर्त पर और क्यों दी जा रही है।
अब सवाल धामी सरकार से है
1. उत्तराखंड की जमीन किसके लिए बचाई जा रही है—उत्तराखंड के लोगों के लिए या बड़े निवेशकों के लिए?
2. अगर जमीन बाजार मूल्य से कम पर दी गई, तो इसकी वजह क्या थी?
3. अगर कंपनियां पात्र थीं तो उनकी तकनीकी और वित्तीय जांच की रिपोर्ट सार्वजनिक क्यों नहीं?
4. अगर सब-लीज की अनुमति है तो उसकी शर्तें क्या हैं?
5. अगर निवेश के नाम पर जमीन दी गई तो जमीन के बदले कितने रोजगार और कितना निवेश आया?
6. और अगर सरकार को पूरा भरोसा है कि हर फैसला उत्तराखंड के हित में हुआ है, तो फिर एक-एक जमीन का पूरा हिसाब जनता के सामने रखने में परेशानी क्या है?
7. उत्तराखंड की जमीन सिर्फ आज की सरकार की संपत्ति नहीं है। यह आने वाली पीढ़ियों की विरासत है।
8. विकास चाहिए—लेकिन ऐसा विकास नहीं, जिसमें पहाड़ की जमीन चली जाए और पहाड़ के लोगों के हिस्से में सिर्फ सवाल बचें।



