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भारत-चीन संबंध : मोदी-शी जिनपिंग की बड़ी मुलाकात; सीमा पर शांति से लेकर व्यापार तक, रिश्तों को नई दिशा देने की कोशिश

राष्ट्रीय/ अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 13 सितंबर 2026

सात साल बाद भारत आए शी, मोदी से आमने-सामने बातचीत

नई दिल्ली में ब्रिक्स सम्मेलन के बीच भारत और चीन के रिश्तों को लेकर एक अहम तस्वीर सामने आई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने शनिवार को ब्रिक्स सम्मेलन से अलग मुलाकात की। यह मुलाकात इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि दोनों देशों के रिश्ते पिछले कुछ वर्षों में सीमा विवाद, व्यापार असंतुलन और आपसी अविश्वास जैसी चुनौतियों से गुजरते रहे हैं। शी जिनपिंग करीब सात साल बाद भारत आए हैं और उनकी यह यात्रा ऐसे समय हुई है जब नई दिल्ली और बीजिंग दोनों ही अपने रिश्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं।

मोदी ने साफ कहा—सीमा पर शांति सबसे जरूरी

बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने साफ संदेश दिया कि भारत-चीन संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए सीमा क्षेत्रों में शांति और स्थिरता बेहद जरूरी है। विदेश मंत्रालय के अनुसार, मोदी ने कहा कि दोनों देशों के रिश्तों को तीन बातों से मार्गदर्शन मिलना चाहिए—आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित। यह संदेश बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि सीमा पर तनाव का असर केवल सुरक्षा पर नहीं बल्कि दोनों देशों के व्यापार, निवेश, लोगों के संपर्क और राजनीतिक रिश्तों पर भी पड़ता है। यानी दिल्ली की तरफ से संकेत साफ है—रिश्ते आगे बढ़ सकते हैं, लेकिन सीमा पर शांति और भरोसा इसकी बुनियादी शर्त होगी।

शी जिनपिंग का संदेश—रणनीतिक और लंबे समय की सोच जरूरी

दूसरी तरफ चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी भारत के साथ संबंधों को रणनीतिक और लंबे समय के नजरिए से देखने की बात कही। चीन की सरकारी समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, शी ने कहा कि भारत और चीन एक-दूसरे की ताकत से सीख सकते हैं और साझा विकास हासिल कर सकते हैं। उन्होंने दोनों देशों से अधिक सहयोग और बहुपक्षीय दुनिया को आगे बढ़ाने की बात भी कही। इसका मतलब यह है कि बीजिंग भी यह संदेश देना चाहता है कि भारत-चीन संबंधों को केवल सीमा विवाद के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।

सीमा विवाद के साथ व्यापार भी बातचीत की मेज पर

बैठक में केवल सीमा का मुद्दा नहीं था। दोनों नेताओं ने व्यापार, निवेश, लोगों के बीच संपर्क और बाजार तक पहुंच पर भी बात की। भारत ने लंबे समय से चीन के साथ व्यापार में बड़े असंतुलन की चिंता जताई है। भारतीय बाजार में चीनी सामान की बड़ी मौजूदगी है, जबकि भारतीय कंपनियों के लिए चीन के बाजार तक पहुंच कई क्षेत्रों में आसान नहीं रही है। दोनों नेताओं ने व्यापार से जुड़े एक-दूसरे के मुद्दों, आपूर्ति श्रृंखला और बाजार तक बेहतर तथा भरोसेमंद पहुंच की जरूरत को स्वीकार किया। अब असली परीक्षा यही होगी कि बातचीत के बाद जमीन पर कितना बदलाव आता है।

दोनों देशों के बीच व्यापार का सवाल क्यों बड़ा है?

भारत और चीन एशिया की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। दोनों के बीच व्यापार जितना बड़ा है, उतनी ही बड़ी चिंता व्यापार असंतुलन को लेकर भी है। भारत चाहता है कि उसके उद्योगों और कंपनियों को चीन में ज्यादा बाजार मिले और जरूरी आपूर्ति श्रृंखलाएं ज्यादा भरोसेमंद बनें। चीन दूसरी तरफ भारत के साथ आर्थिक संबंधों को स्थिर रखना चाहता है। ऐसे में अगर दोनों देश व्यापार को राजनीतिक तनाव से कुछ हद तक अलग रखने में सफल होते हैं, तो इससे दोनों अर्थव्यवस्थाओं को फायदा हो सकता है। लेकिन सवाल यही है—क्या सीमा पर भरोसा बढ़े बिना आर्थिक भरोसा पूरी तरह मजबूत हो सकता है?

लोगों के रिश्ते और यात्रा भी बढ़ाने पर जोर

मोदी और शी ने दोनों देशों के बीच लोगों के संपर्क, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, व्यापारिक संबंधों और आवाजाही को बढ़ाने की जरूरत पर भी जोर दिया। पिछले वर्षों में तनाव का असर आम लोगों, छात्रों, कारोबारियों और यात्रियों के संपर्क पर भी पड़ा है। इसलिए रिश्तों को सामान्य बनाने का मतलब सिर्फ नेताओं की बैठक नहीं है। असली बदलाव तब दिखाई देगा जब दोनों देशों के नागरिकों, कारोबारियों और संस्थानों के बीच संपर्क फिर से बढ़ेगा।

ब्रिक्स ने भारत और चीन को बातचीत का बड़ा मंच दिया

इस पूरी मुलाकात की एक खास बात यह भी है कि दोनों नेता ब्रिक्स के मंच पर आमने-सामने आए। भारत ने 2026 में ब्रिक्स की अध्यक्षता करते हुए अलग-अलग देशों के बीच मतभेदों के बावजूद सहमति बनाने की कोशिश की है। भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली घोषणा भी सर्वसम्मति से स्वीकार की गई। इसमें वैश्विक संस्थाओं में सुधार, विकासशील देशों की ज्यादा भागीदारी, आतंकवाद के खिलाफ सहयोग और विवादों के शांतिपूर्ण समाधान जैसी बातें शामिल हैं। ऐसे में मोदी-शी मुलाकात केवल द्विपक्षीय रिश्तों तक सीमित नहीं है; इसका असर ब्रिक्स और व्यापक वैश्विक राजनीति पर भी पड़ सकता है।

एक ही मंच पर मोदी, शी और पुतिन—बदलती दुनिया की तस्वीर

ब्रिक्स सम्मेलन में भारत, चीन और रूस की मौजूदगी ने दुनिया का ध्यान खींचा है। मोदी, शी जिनपिंग और व्लादिमीर पुतिन की एक साथ तस्वीर भी चर्चा में रही। लेकिन इसे किसी नए सैन्य या राजनीतिक गठबंधन का प्रमाण मानना जल्दबाजी होगी। तीनों देशों के अपने-अपने हित और मतभेद हैं। भारत के अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ भी मजबूत संबंध हैं, चीन के साथ सीमा विवाद है और रूस की अपनी वैश्विक रणनीति है। इसलिए ब्रिक्स का मंच ज्यादा सही मायने में बातचीत, आर्थिक सहयोग और वैश्विक व्यवस्था में विकासशील देशों की आवाज बढ़ाने का मंच बनता दिखाई देता है।

ब्रिक्स घोषणा में दुनिया के लिए बड़ा संदेश

नई दिल्ली घोषणा में ब्रिक्स देशों ने वैश्विक व्यवस्था को ज्यादा प्रतिनिधित्व वाला, निष्पक्ष और समावेशी बनाने की जरूरत बताई। संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में सुधार की मांग भी सामने आई। विकासशील देशों को वैश्विक निर्णय प्रक्रिया में ज्यादा जगह देने पर जोर दिया गया। भारत ने खास तौर पर कहा कि ग्लोबल साउथ को केवल दूसरे देशों द्वारा बनाए गए नियमों का पालन करने वाला नहीं, बल्कि नियम बनाने में भूमिका निभाने वाला बनना चाहिए। यह भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता की बड़ी प्राथमिकताओं में से एक है।

गाजा से लेकर पश्चिम एशिया तक—ब्रिक्स की साझा भाषा

ब्रिक्स घोषणा में गाजा में युद्धविराम बनाए रखने और मानवीय सहायता को बिना रुकावट पहुंचाने की अपील भी की गई। फिलिस्तीनियों के जबरन विस्थापन की नीतियों का विरोध किया गया और दो-राष्ट्र समाधान के समर्थन को दोहराया गया। पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के बीच ईरान और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों के बीच भी बातचीत हुई। यह दिखाता है कि ब्रिक्स के सामने चुनौती सिर्फ आर्थिक नहीं है। उसे ऐसे समय में राजनीतिक और सुरक्षा मुद्दों पर भी साझा भाषा तैयार करनी पड़ रही है, जब उसके सदस्य देशों के हित कई बार एक-दूसरे से अलग होते हैं।

भारत की कूटनीतिक परीक्षा अभी खत्म नहीं हुई

मोदी-शी की यह बैठक रिश्तों में सुधार का संकेत जरूर देती है, लेकिन इसे अंतिम समाधान मानना जल्दबाजी होगी। सीमा पर शांति, व्यापार असंतुलन, बाजार तक पहुंच और आपूर्ति श्रृंखला जैसे मुद्दे अभी भी महत्वपूर्ण हैं। दोनों देशों ने बातचीत जारी रखने और साझा हितों पर आगे बढ़ने की बात कही है। अब सवाल यह है कि क्या यह मुलाकात केवल अच्छी तस्वीर और सकारात्मक बयान तक सीमित रहेगी, या सीमा और व्यापार के वास्तविक मुद्दों पर भी ठोस प्रगति होगी?

तीन शब्दों में भारत का संदेश—सम्मान, संवेदनशीलता और हित

मोदी की ओर से दिए गए तीन शब्द—आपसी सम्मान, आपसी संवेदनशीलता और आपसी हित—भारत की मौजूदा चीन नीति को समझने की एक महत्वपूर्ण कुंजी हैं। भारत चीन से टकराव नहीं चाहता, लेकिन अपनी सुरक्षा और आर्थिक हितों से समझौता भी नहीं करना चाहता। दूसरी तरफ भारत यह भी समझता है कि चीन को पूरी तरह नजरअंदाज करके एशिया और दुनिया की बड़ी आर्थिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना आसान नहीं होगा।

अब असली सवाल—क्या दिल्ली से बीजिंग तक भरोसे का रास्ता खुलेगा?

मोदी और शी की मुलाकात ने भारत-चीन रिश्तों में संवाद का दरवाजा खुला रखने का संदेश दिया है। लेकिन दरवाजा खुलना और मंजिल तक पहुंचना दो अलग बातें हैं। अगर सीमा पर शांति बनी रहती है, व्यापार की बड़ी समस्याओं पर समाधान निकलता है, लोगों की आवाजाही बढ़ती है और दोनों देश एक-दूसरे की संवेदनशीलताओं का सम्मान करते हैं, तो रिश्तों में नया अध्याय शुरू हो सकता है। लेकिन अगर पुराने विवाद फिर सामने आते हैं, तो आज की सकारात्मक बातचीत भी सीमित साबित हो सकती है।

ब्रिक्स के मंच से दिल्ली का संदेश इसलिए महत्वपूर्ण है—भारत चीन से दोस्ती भी चाहता है, लेकिन बराबरी और सम्मान के साथ; सहयोग भी चाहता है, लेकिन अपने राष्ट्रीय हितों की कीमत पर नहीं। अब दुनिया की नजर इस बात पर है कि मोदी-शी की यह मुलाकात सिर्फ कूटनीतिक मुस्कान बनकर रह जाती है या सचमुच भारत-चीन रिश्तों में एक नई शुरुआत करती है।

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