अंतरराष्ट्रीय/ संयुक्त राष्ट्र | ABC NATIONAL NEWS | न्यूयॉर्क | 5 सितंबर 2026
दुनिया वही, लेकिन नक्शे की तस्वीर बदलने की तैयारी
दुनिया की जमीन नहीं बदली, समुद्र अपनी जगह है और महाद्वीप भी वहीं हैं, लेकिन उन्हें कागज और स्क्रीन पर दिखाने का तरीका बदलने की बड़ी कोशिश संयुक्त राष्ट्र तक पहुंच गई है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने शुक्रवार को ऐसे प्रस्ताव का समर्थन किया, जिसका उद्देश्य दुनिया के महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात के ज्यादा करीब दिखाना है। प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला, जबकि अमेरिका ने इसके खिलाफ मतदान किया और छह देश मतदान से अलग रहे। नए ‘इक्वल अर्थ’ मानचित्र में अफ्रीका पहले की तुलना में बड़ा दिखाई देगा, जबकि उत्तरी अमेरिका और यूरोप का दृश्य आकार छोटा नजर आएगा। पहली नजर में यह सिर्फ नक्शे की तकनीकी बात लग सकती है, लेकिन इसके पीछे सवाल बहुत बड़ा है—क्या सदियों से दुनिया को जिस तरह नक्शे पर दिखाया जाता रहा, उसने दुनिया को देखने और समझने की हमारी सोच को भी प्रभावित किया?
टाइमलाइन: 1569 से 2026 तक कैसे बदली दुनिया की तस्वीर
1569: जेरार्डस मर्केटर ने अपना प्रसिद्ध नक्शा बनाया। इसका मुख्य उद्देश्य समुद्री यात्रियों के लिए दिशा और कोणों को उपयोगी तरीके से दिखाना था।
सदियों तक: मर्केटर प्रोजेक्शन समुद्री यात्रा से आगे बढ़कर शिक्षा और दुनिया की सामान्य भौगोलिक तस्वीर का हिस्सा बन गया।
2018: नक्शानवीसों के एक समूह ने ‘इक्वल अर्थ’ प्रोजेक्शन विकसित किया, जिसमें महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात को ज्यादा सही दिखाने पर जोर दिया गया।
5 सितंबर 2026: संयुक्त राष्ट्र महासभा में ‘इक्वल अर्थ’ को बढ़ावा देने वाले प्रस्ताव को 164 देशों का समर्थन मिला। अमेरिका ने विरोध किया।
अब: बहस यह है कि दुनिया को ऐसा नक्शा चाहिए जो दिशा और कोण को प्राथमिकता दे या ऐसा नक्शा जो महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही दिखाए।
मर्केटर नक्शे में अफ्रीका इतना छोटा क्यों दिखाई देता है?
मर्केटर नक्शे की गलती कहना पूरी तरह सही नहीं होगा, क्योंकि इसे एक खास जरूरत के लिए बनाया गया था। पृथ्वी गोल है और उसे सपाट कागज पर दिखाना आसान नहीं है। जब गोल पृथ्वी को सपाट नक्शे में बदला जाता है तो किसी न किसी चीज में बदलाव करना पड़ता है। मर्केटर प्रोजेक्शन में दिशा और कोण को सही रखने पर ज्यादा जोर दिया गया, लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्र नक्शे पर वास्तविक क्षेत्रफल से काफी बड़े दिखाई देने लगे। इसी वजह से यूरोप, उत्तरी अमेरिका और ग्रीनलैंड जैसे क्षेत्र अपनी वास्तविक जमीन की तुलना में ज्यादा बड़े नजर आते हैं, जबकि अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका अपेक्षाकृत छोटे दिखाई देते हैं।
ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण पूरी कहानी समझा देता है
मर्केटर नक्शे को समझने के लिए ग्रीनलैंड और अफ्रीका का उदाहरण सबसे आसान है। नक्शे पर दोनों कई बार लगभग बराबर आकार के दिखाई देते हैं, लेकिन वास्तविकता बिल्कुल अलग है। अफ्रीका का क्षेत्रफल ग्रीनलैंड से कई गुना ज्यादा है। यानी आंखों के सामने दिखाई देने वाली तस्वीर और जमीन पर मौजूद वास्तविक आकार में बहुत बड़ा अंतर हो सकता है। यही वह बात है जिसे ‘इक्वल अर्थ’ प्रोजेक्शन ज्यादा सही तरीके से दिखाने की कोशिश करता है।
‘इक्वल अर्थ’ में क्या बदलेगा?
‘इक्वल अर्थ’ प्रोजेक्शन को 2018 में विकसित किया गया था और इसका मुख्य उद्देश्य महाद्वीपों के क्षेत्रफल का अनुपात ज्यादा सही रखना है। इसलिए इसमें अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका, दक्षिण एशिया और ओशिनिया जैसे क्षेत्र पहले की तुलना में ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका का दृश्य आकार कम हो जाता है। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं कि अमेरिका या यूरोप की जमीन कम हो रही है या अफ्रीका की जमीन बढ़ रही है। धरती वही है, सिर्फ उसे दिखाने का तरीका बदला है।
टोगो बोला—नक्शे सिर्फ नक्शे नहीं होते
इस प्रस्ताव को टोगो ने आगे बढ़ाया। उसके विदेश मंत्री रॉबर्ट ड्यूसी का कहना है कि नक्शे केवल रास्ता बताने के लिए इस्तेमाल होने वाली तस्वीरें नहीं हैं। वे बच्चों की शिक्षा, लोगों की कल्पना और दुनिया को समझने के तरीके को भी प्रभावित करते हैं। अगर किसी क्षेत्र को पीढ़ियों तक उसकी वास्तविकता से छोटा या बड़ा दिखाया जाता है, तो उससे दुनिया के बारे में हमारी सामूहिक धारणा पर असर पड़ सकता है। यही कारण है कि समर्थक देशों के लिए यह केवल नक्शे का तकनीकी बदलाव नहीं, बल्कि दुनिया को ज्यादा सही तरीके से प्रस्तुत करने का सवाल है।
अमेरिका ने क्यों जताई नाराजगी?
अमेरिका ने प्रस्ताव का विरोध किया और संयुक्त राष्ट्र की प्राथमिकताओं पर सवाल उठाया। अमेरिकी प्रतिनिधि यारिना फेरेन्सिविच ने कहा कि संयुक्त राष्ट्र को दुनिया की ज्यादा गंभीर समस्याओं पर ध्यान देना चाहिए। उनके नजरिए में जब युद्ध, गरीबी, भूख और जलवायु संकट जैसी बड़ी चुनौतियां सामने हैं, तब नक्शे से जुड़े इस मुद्दे को इतनी प्राथमिकता देना उचित नहीं है। इस तरह संयुक्त राष्ट्र में बहस सिर्फ इस बात पर नहीं रही कि कौन-सा नक्शा ज्यादा सही है, बल्कि इस बात पर भी पहुंच गई कि अंतरराष्ट्रीय संस्था को अपनी ऊर्जा किन मुद्दों पर लगानी चाहिए।
फ्रांस का जवाब—दुनिया नहीं बदलेगी, लेकिन तस्वीर सुधर सकती है
फ्रांस ने प्रस्ताव का समर्थन किया और उसके विदेश मंत्री जीन-नोएल बैरो ने इस मुद्दे को एक अलग नजरिए से देखा। उन्होंने कहा कि मर्केटर नक्शे में अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण-पूर्व एशिया की तुलना में दृश्य रूप से ज्यादा बड़े दिखाई देते हैं। उन्होंने ग्रीनलैंड का उदाहरण देते हुए कहा कि वह नक्शे पर अफ्रीका के लगभग बराबर दिखाई दे सकता है, जबकि वास्तविकता अलग है। उनका संदेश साफ था—नक्शा बदलने से दुनिया नहीं बदलती, लेकिन दुनिया की गलत तस्वीर को सुधारना सच के करीब जाने जैसा कदम हो सकता है।
क्या अब अमेरिका नक्शे पर छोटा हो जाएगा?
बिल्कुल नहीं। यह समझना सबसे जरूरी है। अमेरिका की जमीन एक इंच भी कम नहीं हो रही और यूरोप भी छोटा नहीं हो रहा। इसी तरह अफ्रीका की जमीन अचानक बढ़ नहीं रही। फर्क सिर्फ इतना है कि पृथ्वी को सपाट नक्शे पर दिखाने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया जाता है। मर्केटर नक्शा दिशाओं और कोणों के लिए उपयोगी था, जबकि ‘इक्वल अर्थ’ महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल के अनुपात को ज्यादा सही दिखाने पर जोर देता है।
क्या नक्शे हमारी सोच बदल सकते हैं?
यहीं से यह कहानी और दिलचस्प हो जाती है। कोई बच्चा जब वर्षों तक एक ही नक्शे में दुनिया देखता है तो उसके दिमाग में देशों और महाद्वीपों की एक तस्वीर बनती है। अगर अफ्रीका छोटा और उत्तरी क्षेत्र बड़े दिखाई दें तो संभव है कि लोगों की भौगोलिक समझ पर उसका असर पड़े। हालांकि किसी महाद्वीप की ताकत सिर्फ उसके क्षेत्रफल से तय नहीं होती। अर्थव्यवस्था, आबादी, प्राकृतिक संसाधन, तकनीक, सैन्य क्षमता और राजनीतिक प्रभाव भी दुनिया में उसकी भूमिका तय करते हैं। इसलिए नक्शे का बदलाव दुनिया की शक्ति का बदलाव नहीं, बल्कि दुनिया की भौगोलिक तस्वीर को प्रस्तुत करने का बदलाव है।
1569 का नक्शा आज 2026 में फिर चर्चा में क्यों?
जब मर्केटर ने अपना नक्शा बनाया था, तब समुद्री यात्रा दुनिया के नक्शों के सबसे महत्वपूर्ण इस्तेमालों में से एक थी। नाविकों के लिए दिशा और कोण बेहद जरूरी थे। आज स्थिति बदल चुकी है। नक्शे अब मोबाइल फोन, स्कूल की किताबों, इंटरनेट, समाचार और डिजिटल माध्यमों में हर दिन करोड़ों लोगों के सामने आते हैं। इसलिए सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या आज दुनिया को दिखाने के लिए वही तरीका सबसे उपयुक्त है, जो साढ़े चार सौ साल पहले समुद्री यात्रियों की जरूरतों के लिए बनाया गया था?
असल बदलाव नक्शे में नहीं, नजरिए में है
आखिर में बात बहुत सीधी है—अफ्रीका बड़ा नहीं हुआ, अमेरिका छोटा नहीं हुआ और दुनिया उलट-पुलट नहीं गई। सिर्फ दुनिया को देखने का चश्मा बदलने की कोशिश हुई है। संयुक्त राष्ट्र में 164 देशों का समर्थन बताता है कि बड़ी संख्या में देश महाद्वीपों के वास्तविक क्षेत्रफल को ज्यादा सही तरीके से दिखाने की जरूरत महसूस करते हैं। वहीं अमेरिका का विरोध यह बताता है कि इस मुद्दे को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्राथमिकताओं और जरूरतों पर मतभेद भी हैं।
शायद इस पूरी कहानी का सबसे बड़ा सबक यही है कि नक्शे सिर्फ जमीन की तस्वीर नहीं बनाते, वे हमारी नजर भी बनाते हैं। अब सवाल यह है कि आने वाली पीढ़ियां दुनिया को सदियों पुरानी विकृत तस्वीर से समझेंगी या फिर उसके वास्तविक आकार के ज्यादा करीब पहुंचने वाली नई तस्वीर से।



