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हर ₹100 की लॉन्डर की गई संपत्ति में सिर्फ ₹1 की वसूली, CJI सूर्यकांत ने बताई आर्थिक अपराधों की बड़ी चुनौती

अपराध/राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 31 अगस्त 2026

भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत ने वैश्विक आर्थिक अपराध और मनी लॉन्ड्रिंग के खिलाफ चल रही कार्रवाई की प्रभावशीलता पर गंभीर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि हर 100 हिस्से की लॉन्डर की गई संपत्ति में से केवल एक हिस्सा ही वास्तव में अधिकारियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों के जरिए वापस हासिल किया जा पाता है, जबकि बाकी 99 हिस्से कार्रवाई, रिपोर्टों और कानूनी प्रक्रियाओं के बीच फंसे रह जाते हैं। CJI ने यह टिप्पणी ब्रिटेन के कैम्ब्रिज में आयोजित 43वें International Symposium on Economic Crime को संबोधित करते हुए की। उनके मुताबिक आर्थिक अपराधियों की कार्यप्रणाली और धन के अंतरराष्ट्रीय प्रवाह की गति इतनी तेज हो चुकी है कि दुनिया की मौजूदा कानूनी और अंतरराष्ट्रीय सहयोग व्यवस्था कई बार उसके पीछे छूट जाती है।

CJI सूर्यकांत ने आर्थिक अपराध की बदलती प्रकृति को रेखांकित करते हुए कहा कि आज अवैध धन को एक देश से दूसरे देश में पहुंचाना पहले की तुलना में कहीं आसान हो गया है। अपराधी बैंक खातों, कंपनियों, ट्रस्ट, निवेश संरचनाओं, संपत्तियों और अलग-अलग देशों में मौजूद वित्तीय संस्थानों का इस्तेमाल कर धन की वास्तविक उत्पत्ति और उसके लाभार्थी मालिक यानी beneficial owner को छिपाने की कोशिश कर सकते हैं। जब जांच एजेंसी किसी संदिग्ध लेन-देन तक पहुंचती है, तब तक धन कई खातों, कंपनियों या देशों से गुजर चुका होता है। इसके बाद उस धन को फ्रीज करना, संपत्ति की पहचान करना, अदालत से जब्ती का आदेश हासिल करना और अंततः उसे उस देश में वापस लाना जहां अपराध हुआ है—एक लंबी और जटिल प्रक्रिया बन जाती है। CJI ने इसी अंतर को आर्थिक अपराधों के खिलाफ वैश्विक लड़ाई की बड़ी कमजोरी के रूप में सामने रखा।

अपराधी की गति तेज, अंतरराष्ट्रीय कानून की प्रक्रिया धीमी

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CJI सूर्यकांत ने कहा कि अवैध संपत्ति और आर्थिक अपराध अंतरराष्ट्रीय संधियों के अनुमोदन और उनकी प्रक्रिया से कहीं तेज गति से आगे बढ़ते हैं। किसी एक देश की जांच एजेंसी के पास दूसरे देश में मौजूद बैंक खाते, कंपनी, जमीन या दूसरी संपत्ति पर सीधे कार्रवाई करने का अधिकार नहीं होता। उसे संबंधित देश की सरकार, अदालत और जांच एजेंसियों के साथ सहयोग करना पड़ता है। यही वजह है कि आर्थिक अपराधों के मामले में केवल अपराधी की पहचान कर लेना पर्याप्त नहीं होता। असली चुनौती उस धन और संपत्ति तक पहुंचना है, जिसे अपराधी ने सीमा पार भेजकर सुरक्षित समझ लिया हो।

उन्होंने कहा कि दुनिया के पास आर्थिक अपराधों से निपटने के लिए कई कानूनी औजार मौजूद हैं। इनमें non-conviction based forfeiture, unexplained wealth orders, beneficial ownership registers और financial intelligence sharing जैसी व्यवस्थाएं शामिल हैं। समस्या इन औजारों की अनुपलब्धता नहीं, बल्कि उनके बीच प्रभावी और तेज अंतरराष्ट्रीय समन्वय की है। यदि एक देश किसी संदिग्ध संपत्ति के बारे में जानकारी हासिल करता है तो दूसरे देश की संबंधित एजेंसी को केवल सूचना प्राप्त करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जरूरत पड़ने पर खाते या संपत्ति को समय रहते फ्रीज करने, न्यायिक आदेश लागू करने और संपत्ति की जब्ती की प्रक्रिया आगे बढ़ानी चाहिए।

CJI ने कौटिल्य के अर्थशास्त्र का किया उल्लेख

अपने संबोधन में CJI सूर्यकांत ने प्राचीन भारतीय राज्यशास्त्री और अर्थशास्त्री कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि हजारों वर्ष पहले लिखे गए इस ग्रंथ में भी राजस्व की चोरी और भ्रष्टाचार जैसी समस्याओं को पहचाना गया था तथा प्रशासन में निगरानी, लेखा-परीक्षण, रिकॉर्ड की जांच और अवैध लाभ पर कार्रवाई जैसे उपायों पर जोर दिया गया था। CJI के इस संदर्भ का महत्व इसलिए भी है क्योंकि इससे पता चलता है कि आर्थिक अपराध कोई नई समस्या नहीं है; बदलाव सिर्फ इतना है कि आधुनिक वित्तीय व्यवस्था ने इसके तरीकों को बेहद जटिल और अंतरराष्ट्रीय बना दिया है। आज डिजिटल लेन-देन और वैश्विक वित्तीय नेटवर्क के कारण अवैध धन का पता लगाने के लिए जांच एजेंसियों को कई देशों और संस्थाओं के बीच काम करना पड़ता है।

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विजय माल्या और नीरव मोदी के मामलों का उदाहरण

CJI ने भारत से जुड़े हाई-प्रोफाइल आर्थिक अपराध मामलों का संदर्भ देते हुए विजय माल्या और नीरव मोदी के प्रत्यर्पण प्रयासों का भी उल्लेख किया। इन मामलों ने यह दिखाया है कि किसी आर्थिक अपराध के आरोपी के विदेश में मौजूद होने के बाद उसे भारत वापस लाने की प्रक्रिया कितनी लंबी और कानूनी रूप से जटिल हो सकती है। भारत ने विजय माल्या के प्रत्यर्पण के लिए ब्रिटेन के साथ प्रक्रिया शुरू की थी और नीरव मोदी के मामले में भी विदेश में कानूनी प्रक्रिया चली। लेकिन किसी आरोपी को वापस लाने के साथ-साथ विदेशों में मौजूद संपत्तियों की पहचान, उन्हें फ्रीज करना और कानूनी रूप से जब्त कराना एक अलग चुनौती है। इसीलिए आर्थिक अपराध के खिलाफ सफलता का मूल्यांकन केवल गिरफ्तारी या मुकदमे से नहीं, बल्कि अवैध धन की वास्तविक रिकवरी से भी किया जाना चाहिए।

सिर्फ गिरफ्तारी नहीं, पैसा वापस आना भी जरूरी

CJI सूर्यकांत की टिप्पणी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही है कि आर्थिक अपराध के मामलों में “फॉलो द मनी” यानी धन के प्रवाह का पीछा करना बेहद जरूरी है। यदि अपराध से अर्जित पैसा बरामद नहीं होता और संपत्ति अपराधी या उसके नेटवर्क के पास बनी रहती है तो केवल आपराधिक मुकदमा आर्थिक अपराध से हुए वित्तीय नुकसान की भरपाई नहीं कर सकता। इसी कारण जांच एजेंसियों को अपराधी के बैंक खातों के साथ-साथ कंपनियों, निवेश, संपत्ति और वास्तविक लाभार्थी मालिकों तक पहुंचना पड़ता है। सीमा पार धन के मामलों में यह काम तभी प्रभावी हो सकता है जब संबंधित देश तेजी से वित्तीय जानकारी साझा करें और एक-दूसरे के न्यायिक आदेशों को प्रभावी ढंग से लागू करें।

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वैश्विक सहयोग के बिना मुश्किल है आर्थिक अपराध पर लगाम

CJI ने स्पष्ट किया कि कोई भी देश, चाहे उसके पास कितने ही संसाधन क्यों न हों, अकेले वैश्विक आर्थिक अपराध के पूरे नेटवर्क से प्रभावी ढंग से नहीं लड़ सकता। आर्थिक अपराधियों के नेटवर्क कई देशों में फैले हो सकते हैं और धन को एक न्यायिक क्षेत्र से दूसरे में स्थानांतरित किया जा सकता है। इसलिए जांच एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने, संदिग्ध संपत्तियों को तेजी से फ्रीज करने, वास्तविक लाभार्थी मालिकों की पहचान करने और अदालतों के आदेशों को दूसरे देशों में समय पर लागू कराने की व्यवस्था मजबूत करनी होगी।

CJI का ₹100 में से केवल ₹1 की वास्तविक वसूली वाला उदाहरण इसी चुनौती को बेहद स्पष्ट तरीके से सामने रखता है। समस्या सिर्फ यह नहीं कि आर्थिक अपराधी पैसा चोरी या लॉन्डर कर लेते हैं; बड़ी समस्या यह है कि उस पैसे को वापस हासिल करने की प्रक्रिया कई बार अपराधी की धन छिपाने की रणनीति से धीमी पड़ जाती है। इसलिए भविष्य की लड़ाई केवल नए कानून बनाने की नहीं, बल्कि मौजूदा कानूनों और अंतरराष्ट्रीय सहयोग तंत्र को तेज, समन्वित और परिणामोन्मुख बनाने की होगी। CJI का संदेश मूलतः यही है कि आर्थिक अपराधियों के पास वैश्विक नेटवर्क है तो कानून प्रवर्तन एजेंसियों को भी वैश्विक स्तर पर उतनी ही तेजी और समन्वय के साथ काम करना होगा।

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