अपराध/ अंतरराष्ट्रीय/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 31 अगस्त 2026
जम्मू-कश्मीर में आतंकी गतिविधियों पर नजर रख रही भारतीय सुरक्षा एजेंसियों ने ऑनलाइन नेटवर्किंग को लेकर एक नया और गंभीर खुलासा किया है। अधिकारियों के अनुसार, पाकिस्तान-आधारित आतंकी संगठन और पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI अब पारंपरिक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म से आगे बढ़कर ऐसे डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिनकी निगरानी और पहचान करना सुरक्षा एजेंसियों के लिए अधिक चुनौतीपूर्ण है।
समाचार एजेंसी PTI के हवाले से Hindustan Times की रिपोर्ट के मुताबिक, आतंकी नेटवर्क कथित तौर पर पोर्न वेबसाइटों और ऐप्स में मौजूद रियल-टाइम चैट सुविधाओं का इस्तेमाल भर्ती से जुड़े संपर्क और सूचनाओं के आदान-प्रदान के लिए कर रहे हैं। इससे पहले सुरक्षा एजेंसियां ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म के कथित दुरुपयोग का भी पता लगा चुकी हैं।
WhatsApp और Facebook Messenger से आगे बढ़ा नेटवर्क
अधिकारियों के अनुसार, आतंकियों के डिजिटल संचार के तरीकों में बदलाव आया है। पहले जहां WhatsApp, Facebook Messenger और अन्य लोकप्रिय सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल किया जाता था, वहीं अब आतंकी नेटवर्क कथित तौर पर कम लोकप्रिय और विशेष एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म तलाश रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों का मानना है कि ऐसे प्लेटफॉर्म का चुनाव इस वजह से किया जा रहा है कि आमतौर पर इन पर उपयोगकर्ताओं की संख्या कम होती है और इनके संचार तंत्र की निगरानी अपेक्षाकृत कठिन हो सकती है।
रिपोर्ट के अनुसार, इन माध्यमों का इस्तेमाल खास तौर पर जम्मू-कश्मीर में नए लोगों की भर्ती और उनसे संपर्क स्थापित करने के लिए किए जाने की आशंका है।
पोर्न साइट्स के चैट फीचर का कथित इस्तेमाल
रिपोर्ट में अधिकारियों के हवाले से बताया गया है कि भारत में प्रतिबंधित कई पोर्नोग्राफिक वेबसाइटों और ऐप्स में चैट की सुविधाएं मौजूद होती हैं। इनका उद्देश्य सामान्यतः उपयोगकर्ताओं को बातचीत अथवा डेटिंग जैसी सेवाएं उपलब्ध कराना होता है।
आरोप है कि आतंकी हैंडलर इन्हीं चैट सुविधाओं का गलत इस्तेमाल कर संभावित भर्ती से संपर्क स्थापित करने और संदेश पहुंचाने की कोशिश कर रहे हैं।
हालांकि, यह महत्वपूर्ण है कि हर पोर्न साइट या चैट सेवा को आतंकी गतिविधियों से जोड़ना सही नहीं होगा। सुरक्षा एजेंसियों द्वारा बताए गए मामलों में विशिष्ट प्लेटफॉर्म और संदिग्ध नेटवर्क की जांच की जा रही है।
Tor आधारित ऐप्स पर भी नजर
सुरक्षा एजेंसियों ने कथित तौर पर Tor आधारित मैसेजिंग एप्लिकेशन को भी जांच के दायरे में रखा है। रिपोर्ट में Coatex और Conion जैसे प्लेटफॉर्म का उल्लेख किया गया है।
Tor यानी The Onion Router एक ओपन-सोर्स नेटवर्क है, जिसे मूल रूप से ऑनलाइन गोपनीयता और सेंसरशिप से बचने जैसे वैध उद्देश्यों के लिए बनाया गया है। इसका नेटवर्क इंटरनेट ट्रैफिक को कई स्तरों और रिले के जरिए रूट करता है, जिससे उपयोगकर्ता की वास्तविक लोकेशन या संचार के स्रोत का पता लगाना कठिन हो सकता है।
यही गोपनीयता सुविधा कथित तौर पर आपराधिक और आतंकी नेटवर्क द्वारा दुरुपयोग किए जाने की चिंता पैदा कर रही है।
बिना फोन नंबर वाले एन्क्रिप्टेड प्लेटफॉर्म
रिपोर्ट के मुताबिक, जांच एजेंसियां ऐसे प्राइवेसी-केंद्रित ऐप्स पर भी नजर रख रही हैं जो बिना SIM कार्ड या फोन नंबर के एंड-टू-एंड एन्क्रिप्टेड बातचीत की सुविधा देते हैं।
ऐसे सिस्टम में किसी व्यक्ति की वास्तविक पहचान को उसके डिजिटल अकाउंट से जोड़ना चुनौतीपूर्ण हो सकता है। एजेंसियों के सामने चुनौती केवल संदेशों को ट्रैक करने की नहीं, बल्कि यह पता लगाने की भी है कि संदेश भेजने वाला व्यक्ति वास्तव में कौन है और वह किस नेटवर्क से जुड़ा है।
Moonchat समेत अन्य प्लेटफॉर्म की भी जांच
PTI की रिपोर्ट के अनुसार, एजेंसियां कुछ Vietnam-based ऐप्स और Moonchat जैसे अनाम संचार प्लेटफॉर्म की गतिविधियों पर भी नजर रख रही हैं। रिपोर्ट में ऐसे संस्करणों का उल्लेख है जिनमें PGP encryption जैसी तकनीकों के इस्तेमाल की बात कही गई है।
इन प्लेटफॉर्मों के अलग-अलग संस्करण और अलग-अलग रजिस्ट्रेशन प्रणालियां जांच एजेंसियों के लिए डिजिटल जांच को और जटिल बना सकती हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने नई चुनौती
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि आतंकी नेटवर्क कथित तौर पर मुख्यधारा के सोशल मीडिया से हटकर छोटे, कम चर्चित और गोपनीयता-केंद्रित डिजिटल प्लेटफॉर्म तलाश रहे हैं।
सुरक्षा विशेषज्ञों के मुताबिक, Tor जैसे नेटवर्क में डेटा कई रिले से होकर गुजर सकता है। इससे संचार के मूल स्रोत और अंतिम गंतव्य की पहचान कठिन हो सकती है।
हालांकि Tor स्वयं कोई आतंकी प्लेटफॉर्म नहीं है। इसका इस्तेमाल पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और ऐसे लोगों द्वारा भी किया जाता है जिन्हें ऑनलाइन गोपनीयता या सेंसरशिप से बचने की जरूरत होती है। चिंता इसका आतंकी नेटवर्क द्वारा कथित दुरुपयोग है।
सुरक्षा एजेंसियों के लिए अब चुनौती यह है कि वे वैध डिजिटल गोपनीयता और आतंकवादी गतिविधियों के बीच अंतर करते हुए उन नेटवर्क की पहचान करें जो इन तकनीकों का इस्तेमाल भर्ती, संपर्क और आतंकी गतिविधियों के समन्वय के लिए कर रहे हैं।




