राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 21 अगस्त 2026
ABVP-SFI टकराव के बीच दिलीप घोष का बयान
पश्चिम बंगाल की जादवपुर यूनिवर्सिटी एक बार फिर छात्र राजनीति के टकराव के केंद्र में है। ABVP और वामपंथी छात्र संगठनों के बीच तनाव के बीच पश्चिम बंगाल के मंत्री और वरिष्ठ BJP नेता दिलीप घोष ने शुक्रवार को ऐसा बयान दिया, जिसने विवाद को और बढ़ा दिया। घोष ने कहा कि अगर यूनिवर्सिटी परिसर में कथित तौर पर “राष्ट्रविरोधी” नारे या गतिविधियां दिखाई दीं तो वहां फिर से ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जाएगी। उनका यह बयान ऐसे समय आया है जब यूनिवर्सिटी परिसर में ABVP और SFI से जुड़े छात्रों के बीच तनाव और झड़पों के बाद दोनों पक्ष आमने-सामने हैं।
‘फिर सर्जिकल स्ट्राइक करेंगे’—दिलीप घोष
दिलीप घोष ने कहा कि पहले भी वहां ऐसी कार्रवाई की जा चुकी है और उन्होंने दावा किया कि उस दौरान SFI का कार्यालय गिराया गया था। उन्होंने कहा कि अगर फिर से “राष्ट्रविरोधी आंदोलन” या नारे दिखाई दिए तो ऐसी कार्रवाई दोबारा की जाएगी। घोष के बयान ने यूनिवर्सिटी परिसर में राजनीतिक हस्तक्षेप और छात्र संगठनों के बीच विवाद को लेकर नई बहस छेड़ दी है। खास तौर पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ जैसे सैन्य शब्द का इस्तेमाल किसी विश्वविद्यालय परिसर में संभावित कार्रवाई के संदर्भ में किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं।
ABVP-SFI विवाद के बाद बढ़ा तनाव
जादवपुर यूनिवर्सिटी में यह तनाव ABVP और वामपंथी छात्र संगठनों के बीच टकराव के बाद बढ़ा। 20 अगस्त को SFI और AIDSO समेत वामपंथी छात्र संगठनों ने यूनिवर्सिटी परिसर में विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शन के दौरान ‘JU Against Saffron’ बैनर दिखाई दिया और नारे लगाए गए। यह प्रदर्शन ABVP सदस्यों के साथ हुए तनाव और झड़पों के बाद हुआ। इस पूरे घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय परिसर में छात्र राजनीति और वैचारिक टकराव को फिर चर्चा में ला दिया है।
विश्वविद्यालय परिसर में राजनीतिक संघर्ष क्यों गंभीर?
विश्वविद्यालय किसी भी लोकतंत्र में विचारों की बहस, असहमति और संवाद के महत्वपूर्ण केंद्र होते हैं। छात्र संगठनों के बीच राजनीतिक मतभेद होना नया नहीं है, लेकिन जब राजनीतिक विरोध हिंसक टकराव या धमकी की भाषा तक पहुंचने लगे तो मामला गंभीर हो जाता है। जादवपुर यूनिवर्सिटी का इतिहास भी छात्र राजनीति और आंदोलनों से जुड़ा रहा है। ऐसे में किसी भी पक्ष की ओर से आक्रामक भाषा का इस्तेमाल स्थिति को और तनावपूर्ण बना सकता है।
यूनिवर्सिटी प्रशासन पर भी उठे सवाल
इस पूरे मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक 21 अगस्त की सुबह तक ABVP से जुड़े लोगों के कथित रूप से परिसर में घुसने के मामले में विश्वविद्यालय अधिकारियों की ओर से औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं कराई गई थी। ऐसे में सवाल यह है कि परिसर में नियमों के उल्लंघन या कथित अनधिकृत प्रवेश की शिकायतों पर प्रशासन ने क्या कार्रवाई की और आगे उसकी क्या रणनीति है।
‘राष्ट्रविरोधी’ की परिभाषा पर भी बहस
दिलीप घोष के बयान के बाद एक और बड़ा सवाल सामने आया है—आखिर विश्वविद्यालय में किस गतिविधि को “राष्ट्रविरोधी” माना जाएगा और इसका फैसला कौन करेगा? किसी नारे, राजनीतिक विचार या छात्र आंदोलन को राष्ट्रविरोधी बताना गंभीर मामला है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति और आलोचना की जगह बनी रहनी चाहिए। यदि कोई वास्तविक आपराधिक गतिविधि होती है तो कानून के तहत कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन विश्वविद्यालयों में राजनीतिक मतभेदों का समाधान हिंसा या धमकी की भाषा से नहीं हो सकता।
छात्र राजनीति या शक्ति प्रदर्शन?
जादवपुर यूनिवर्सिटी का मौजूदा विवाद केवल ABVP बनाम SFI का मामला नहीं रह गया है। इसके साथ राज्य की राजनीति भी जुड़ गई है। एक तरफ वामपंथी छात्र संगठन BJP और उसके छात्र संगठन ABVP के बढ़ते प्रभाव का विरोध कर रहे हैं, वहीं BJP की ओर से यूनिवर्सिटी में कथित “राष्ट्रविरोधी” गतिविधियों के खिलाफ सख्त रुख अपनाने की बात कही जा रही है। ऐसे में कैंपस की छात्र राजनीति धीरे-धीरे व्यापक राजनीतिक संघर्ष का मैदान बनती दिखाई दे रही है।
अब सवाल कार्रवाई का नहीं, तरीका क्या होगा?
दिलीप घोष की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ वाली चेतावनी ने विवाद को और तीखा कर दिया है। विश्वविद्यालय परिसर में अगर कानून या नियमों का उल्लंघन हुआ है तो उसकी जांच और कार्रवाई का रास्ता कानून और विश्वविद्यालय प्रशासन के नियमों से तय होना चाहिए। सवाल यही है कि क्या छात्र राजनीति को राजनीतिक शक्ति प्रदर्शन और टकराव की भाषा से चलाया जाएगा या संवाद और लोकतांत्रिक प्रक्रिया से?
जादवपुर यूनिवर्सिटी में बढ़ते तनाव के बीच अब प्रशासन के सामने सबसे बड़ी चुनौती परिसर में शैक्षणिक माहौल और छात्रों की सुरक्षा बनाए रखने की है। क्योंकि विश्वविद्यालय में विचारों की लड़ाई हो सकती है, लेकिन विचारों का जवाब ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की धमकी नहीं, बल्कि बहस, तर्क और कानून से होना चाहिए।




