राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | हैदराबाद | 21 अगस्त 2026
हैदराबाद के पश्चिमी किनारे पर स्थित लगभग 500 साल पुराने गोलकुंडा किले में सुरंग मिलने की खबर ने गुरुवार शाम से पूरे इलाके में उत्सुकता और रोमांच की लहर पैदा कर दी है। करवान विधायक कौसर मोहिउद्दीन ने 20 अगस्त की शाम को यह जानकारी साझा की कि भारतीय सेना की ओर से खुदाई के दौरान 18 सीढ़ी (अठारा सीढ़ी) इलाके में, करीब 400 साल पुराने कुतुब शाही कब्रिस्तान और खेल मैदान के पास सुरंग जैसी संरचना सामने आई है। विधायक ने इसे अवैध खुदाई बताते हुए पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) को मामले से अवगत कराया। खबर फैलते ही स्थानीय लोग और इतिहास प्रेमी सुरंग को देखने पहुंचने लगे। शुक्रवार सुबह भी वहां आवाजाही बनी रही।
गोलकुंडा: चरवाहे की पहाड़ी से साम्राज्य का गढ़
गोलकुंडा का नाम तेलुगु शब्दों ‘गोल्ला’ (चरवाहा) और ‘कोंडा’ (पहाड़ी) से बना है। किंवदंती है कि एक चरवाहे बालक को पहाड़ी पर मूर्ति मिली, जिसकी सूचना काकतीय राजा को दी गई। राजा ने इसे पवित्र स्थान मानकर 12वीं-13वीं शताब्दी में मिट्टी का किला बनवाया। बाद में बहमनी सुल्तानों ने इसे अपने नियंत्रण में लिया और 16वीं शताब्दी में कुतुब शाही शासकों ने करीब 62 वर्षों में इसे विशाल ग्रेनाइट किले में बदल दिया। आज यह 120 मीटर ऊंची ग्रेनाइट पहाड़ी पर स्थित है। इसकी बाहरी दीवार करीब 5 से 11 किलोमीटर लंबी है, जिसमें 87 अर्धवृत्ताकार बुर्ज (कुछ अभी भी तोपों से सुसज्जित) और आठ विशाल दरवाजे हैं। तीन स्तरों वाली सुरक्षा व्यवस्था, मुड़ी हुई प्रवेश द्वार और हाथियों को रोकने वाले कांटेदार दरवाजे इसकी सैन्य चतुराई की मिसाल हैं।
यह किला सिर्फ पत्थर की दीवारें नहीं, बल्कि उस दौर की इंजीनियरिंग का जीवंत उदाहरण है। फतेह दरवाजा (विजय द्वार) के पास ताली बजाने से आवाज लगभग एक किलोमीटर दूर बाला हिसार तक साफ सुनाई देती है—यह प्राकृतिक अलार्म सिस्टम था। पानी की आपूर्ति के लिए फारसी चक्र, मिट्टी की पाइपलाइनें और चट्टानों में काटे गए जलाशय बनाए गए थे। गोलकुंडा हीरे के व्यापार का विश्व प्रसिद्ध केंद्र रहा। कोहिनूर और होप जैसे प्रसिद्ध हीरे इसी क्षेत्र की खानों से निकले थे। 1687 में मुगल बादशाह औरंगजेब ने आठ महीने के घेराव के बाद धोखे से इसे जीता और उसके बाद किला धीरे-धीरे खंडहर में बदल गया।
सुरंगों की सदियों पुरानी कहानियां
गोलकुंडा को लेकर लंबे समय से गुप्त सुरंगों और भूमिगत रास्तों की कहानियां प्रचलित हैं। कहा जाता है कि दरबार हॉल या रानी महल से निकलने वाला कोई रास्ता पहाड़ी के नीचे या चारमीनार, गोशामहल, चौमहल्ला पैलेस और नौबत पहाड़ तक जाता था। कुछ किताबों और स्थानीय लोककथाओं में आपात स्थिति में शाही परिवार के भागने के लिए इन सुरंगों का जिक्र मिलता है। कुछ दावों में खजाने छिपाने की भी बात कही गई है। हालांकि, अब तक जितनी भी संरचनाएं मिली हैं, वे ज्यादातर छोटे रास्ते या दबे हुए महलों के हिस्से साबित हुई हैं। ASI और विशेषज्ञ पहले भी कई बार ऐसी अफवाहों को जांचा चुके हैं, लेकिन लंबी दूरी वाली सुरंग की ठोस पुष्टि अभी तक नहीं हुई।
इस बार 18 सीढ़ी इलाके में सामने आई संरचना ने पुरानी किंवदंतियों को फिर जिंदा कर दिया है। लोग सवाल पूछ रहे हैं—क्या यह किसी सुरक्षित भागने का रास्ता है? क्या इसमें कोई खजाना या ऐतिहासिक निशान छिपे हैं? या यह सिर्फ पुरानी जल निकासी या भवन निर्माण का हिस्सा है?
जांच ही खोलेगी असली रहस्य
फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि कथित सुरंग की आधिकारिक पुष्टि बाकी है। विशेषज्ञों को इसकी उम्र, निर्माण तकनीक, दिशा और ऐतिहासिक महत्व का अध्ययन करना होगा। अगर यह सच में कुतुब शाही या उससे पहले की सुरंग साबित होती है, तो गोलकुंडा के इतिहास का एक नया अध्याय खुल सकता है—सुरक्षा व्यवस्था, शाही आवाजाही और उस दौर की वास्तुकला के बारे में नई जानकारी मिल सकती है। अगर यह कोई अन्य पुरानी संरचना निकली, तब भी किले की जटिल बहुस्तरीय वास्तुकला को समझने में मदद मिलेगी।
गोलकुंडा पहले से ही अपनी विशाल दीवारों, अनोखी ध्वनि व्यवस्था, जल प्रणाली और हीरों की कहानियों के लिए प्रसिद्ध है। अब कथित सुरंग की खबर ने उसके छिपे रहस्यों को एक बार फिर लोगों की जुबान और सोशल मीडिया पर ला दिया है। इतिहास और पुरातत्व प्रेमियों की नजरें अब जांच के नतीजों पर टिकी हैं—क्या यह खोज सदियों पुराने गोलकुंडा के किसी अज्ञात अध्याय को उजागर करेगी, या फिर रहस्य वहीं रह जाएगा जहां से शुरू हुआ?




