राष्ट्रीय/ व्यापार | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 21 अगस्त 2026
कांग्रेस ने शुक्रवार को केंद्र सरकार की E20 नीति की तत्काल समीक्षा और बिना एथेनॉल वाले पेट्रोल के विकल्प उपलब्ध कराने की मांग की है। पार्टी के संचार प्रमुख जयराम रमेश ने कहा कि उपभोक्ता इस नीति की कीमत भोजन और परिवहन दोनों में चुका रहे हैं। उनका आरोप है कि गन्ना और खाद्यान्न को एथेनॉल उत्पादन के लिए मोड़ने से खाद्य पदार्थों की कीमतें बढ़ रही हैं, जबकि 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल उन वाहनों के लिए समस्या पैदा कर रहा है जो इसके लिए डिजाइन नहीं किए गए थे।
माइलेज में गिरावट और वाहनों की तकलीफ
एथेनॉल की कैलोरी वैल्यू पेट्रोल से करीब 30-36 प्रतिशत कम होती है। इसलिए E20 में ऊर्जा की मात्रा कम हो जाती है। वैज्ञानिक गणना के अनुसार इससे माइलेज में कम से कम 6-8 प्रतिशत की गिरावट आनी चाहिए। वास्तविक दुनिया में कई उपभोक्ता सर्वे और मैकेनिकों के अनुभव इससे कहीं ज्यादा नुकसान बताते हैं। LocalCircles जैसे सर्वे में प्री-2023 वाहनों के 66 प्रतिशत मालिकों ने 10 प्रतिशत से ज्यादा माइलेज घटने की शिकायत की है। कई ड्राइवर 12-15 प्रतिशत तक गिरावट बता रहे हैं। ओवरटेकिंग, चढ़ाई या AC चालू करने पर प्रदर्शन कमजोर पड़ रहा है।
पुराने वाहनों (जो देश के सक्रिय पेट्रोल फ्लीट का लगभग 77 प्रतिशत यानी करीब 24 करोड़ वाहन हैं) में एथेनॉल की समस्या और गंभीर है। एथेनॉल हाइग्रोस्कोपिक होता है—यानी हवा से नमी सोख लेता है। इससे फ्यूल सिस्टम में पानी-एथेनॉल मिश्रण बैठ जाता है, जो रबर की होज, सील, फ्यूल पंप, फिल्टर और इंजेक्टर को नुकसान पहुंचा सकता है। मैकेनिक क्लॉग्ड इंजेक्टर, फेल हो रहे फ्यूल पंप और ज्यादा कार्बन जमाव की शिकायतें बढ़ा बता रहे हैं। मरम्मत का खर्च पहले 3-4 हजार से बढ़कर 12-15 हजार रुपये तक पहुंच गया है।
सरकार और कुछ निर्माता कंपनियां कहती हैं कि व्यापक नुकसान का कोई प्रमाण नहीं है। लेकिन उपभोक्ताओं और स्वतंत्र रिपोर्टों में शिकायतें लगातार आ रही हैं। सबसे बड़ी शिकायत यह है कि पंप पर अब शुद्ध पेट्रोल या कम ब्लेंड (E10) का विकल्प लगभग गायब हो चुका है। लोग मजबूर हैं।
किचन पर भी बोझ: खाद्य महंगाई का सिलसिला
जयराम रमेश के अनुसार, पिछले तीन महीनों में चीनी 48 रुपये से 67 रुपये प्रति किलो और गुड़ 50 से 65 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गया। चावल 16 प्रतिशत और मक्का आटा 11 प्रतिशत महंगा हुआ। पशु आहार भी करीब 10 प्रतिशत महंगा हो गया। उन्होंने दावा किया कि 25 लाख टन चीनी-लायक गन्ना एथेनॉल में चला गया।
वास्तविक आंकड़े और भी चिंताजनक तस्वीर पेश करते हैं। वर्तमान एथेनॉल आपूर्ति वर्ष में अनाज आधारित फीडस्टॉक (मक्का, FCI का सरप्लस चावल, क्षतिग्रस्त अनाज) कुल आपूर्ति का करीब 67-72 प्रतिशत हो चुका है। मक्का अकेले सबसे बड़ा योगदानकर्ता बन गया है। पहले गन्ना-मोलasses आधारित एथेनॉल प्रमुख था, अब अनाज हावी हो रहा है। इससे खाद्य बनाम ईंधन का सीधा टकराव पैदा हो रहा है। मक्का का बड़ा हिस्सा पहले पशु-मुर्गी आहार और खाद्य श्रृंखला में जाता था। अब वह डिस्टिलरीज में जा रहा है।
पानी की खपत भी भारी है। एक लीटर गन्ना आधारित एथेनॉल के लिए करीब 3,600 लीटर और चावल आधारित के लिए 10,000 लीटर से ज्यादा पानी लग सकता है। गन्ना और धान पहले से ही भारत की सिंचाई का बड़ा हिस्सा सोखते हैं।
कीमतों में राहत क्यों नहीं?
सरकार विदेशी मुद्रा बचत और कार्बन उत्सर्जन में कमी का दावा करती है। लेकिन उपभोक्ता पूछ रहे हैं—अगर एथेनॉल पेट्रोल से सस्ता है और क्रूड ऑयल की अंतरराष्ट्रीय कीमतें भी घटी हैं, तो E20 की खुदरा कीमत क्यों नहीं घटी? एथेनॉल का खरीद मूल्य (मक्का आधारित करीब 71-72 रुपये प्रति लीटर) पेट्रोल के आधार मूल्य से ऊंचा है। इसके बावजूद पंप पर E20 उसी दर पर बिक रहा है जिस पर पहले सामान्य पेट्रोल बिकता था। माइलेज घटा, खर्च बढ़ा, विकल्प नहीं—यह समीकरण आम आदमी के खिलाफ है।
कुछ विश्लेषणों के अनुसार अप्रैल 2023 से मार्च 2026 के बीच सिर्फ माइलेज नुकसान की भरपाई के लिए उपभोक्ताओं ने हजारों करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च किए। NITI आयोग की अपनी रोडमैप में भी उपभोक्ताओं को मुआवजा देने की बात कही गई थी, लेकिन व्यवहार में सब्सिडी ज्यादातर एथेनॉल उत्पादकों को मिली।
जरूरत है संतुलन और विकल्प की
E20 नीति के कुछ फायदे हो सकते हैं—आयात निर्भरता कम होना, किसानों को अतिरिक्त बाजार, कुछ उत्सर्जन में कमी। लेकिन जल्दबाजी में पूरे देश पर एक ही ब्लेंड थोपना, पुराने वाहनों के लिए कोई रियायत न देना, खाद्य सुरक्षा और पानी की कीमत नजरअंदाज करना उचित नहीं। मुख्य आर्थिक सलाहकार तक ने हाल में E10 जैसे कम ब्लेंड का विकल्प वापस लाने की बात कही है।
कांग्रेस की मांग जायज लगती है—नीति की समीक्षा हो, गैर-एथेनॉल या कम ब्लेंड वाले पेट्रोल का विकल्प उपलब्ध कराया जाए, और उपभोक्ताओं को वास्तविक विकल्प मिले। जब तक माइलेज, मरम्मत खर्च, खाद्य महंगाई और पानी-खाद्य सुरक्षा के सवालों के ठोस जवाब नहीं मिलते, तब तक E20 को “हरित क्रांति” बताना अधूरा और एकतरफा ही रहेगा। आम आदमी की जेब और किचन दोनों पर दबाव बढ़ रहा है—इसकी अनदेखी लंबे समय तक संभव नहीं।




