राष्ट्रीय/कानून | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अगस्त 2026
जज बढ़ाने पर विवाद नहीं, लेकिन रास्ते पर बड़ा सवाल
सुप्रीम कोर्ट में मुकदमों का बोझ बढ़ रहा है, लाखों मामले अदालतों में लंबित हैं और न्याय व्यवस्था को अधिक जजों की जरूरत है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट में जजों की मंजूर संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के फैसले पर शायद ही किसी को बुनियादी आपत्ति हो। लेकिन सवाल यह है कि सरकार ने इस काम के लिए Money Bill यानी धन विधेयक का रास्ता क्यों चुना? Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill, 2026 लोकसभा से पारित होने के बाद राज्यसभा से भी गुजर चुका है। इसके जरिए चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सहित सुप्रीम कोर्ट के जजों की मंजूर संख्या 34 से बढ़ाकर 38 की जानी है। मगर असली बहस चार अतिरिक्त जजों की नहीं, उस संवैधानिक रास्ते की है जिसका इस्तेमाल सरकार ने विधेयक को आगे बढ़ाने के लिए किया। यही रास्ता पहले भी गंभीर कानूनी विवाद पैदा कर चुका है।
Money Bill आखिर है क्या और इतना फर्क क्यों पड़ता है?
बहुत आसान शब्दों में समझें तो सामान्य विधेयक और Money Bill में सबसे बड़ा अंतर राज्यसभा की ताकत का है। सामान्य विधेयक को कानून बनने के लिए लोकसभा और राज्यसभा दोनों से मंजूरी चाहिए। लेकिन संविधान के अनुच्छेद 110 के तहत Money Bill मुख्य रूप से कर, सरकारी धन, Consolidated Fund और उससे सीधे जुड़े निर्धारित वित्तीय विषयों से संबंधित होता है। Money Bill पर लोकसभा का पलड़ा बहुत भारी होता है। राज्यसभा इसे रोक नहीं सकती और न ही अपने संशोधन लोकसभा पर थोप सकती है। वह केवल सुझाव दे सकती है और 14 दिनों के भीतर विधेयक लौटाती है। लोकसभा चाहे तो उन सुझावों को स्वीकार करे, चाहे तो खारिज कर दे। यही कारण है कि किसी विधेयक को Money Bill घोषित करना केवल तकनीकी लेबल लगाना नहीं है; इससे संसद के दोनों सदनों के बीच संवैधानिक शक्ति-संतुलन बदल जाता है।
तो जजों की संख्या बढ़ाने वाला कानून ‘Money Bill’ कैसे?
यहीं मामला दिलचस्प हो जाता है। पहली नजर में कोई पूछ सकता है कि सुप्रीम कोर्ट में चार जज बढ़ाने का मामला टैक्स या सरकारी खजाने से कैसे जुड़ गया? इसका आधार यह है कि अतिरिक्त जजों की नियुक्ति से उनके वेतन, भत्ते और दूसरे खर्च सरकारी खजाने से आएंगे। लेकिन कानूनी बहस इससे आगे जाती है—क्या किसी कानून में सरकारी खर्च शामिल होने भर से पूरे विधेयक को Money Bill बनाया जा सकता है? अगर ऐसा बहुत व्यापक तरीके से स्वीकार कर लिया जाए तो सरकार के लगभग हर बड़े प्रशासनिक फैसले में किसी न किसी रूप में सरकारी पैसा खर्च होता है। तब Money Bill की संवैधानिक सीमा बेहद चौड़ी हो सकती है और राज्यसभा की भूमिका सिकुड़ सकती है। यही वह सवाल है जिस पर संवैधानिक विशेषज्ञ लंबे समय से बहस करते रहे हैं।
2019 में भी अपनाया गया था यही रास्ता
यह पहली बार नहीं है। 2019 में जब सुप्रीम कोर्ट के जजों की मंजूर संख्या बढ़ाकर 34 की गई थी, तब भी कानून को Money Bill के रास्ते से आगे बढ़ाया गया था। अब 2026 में संख्या 34 से बढ़ाकर 38 करने के लिए सरकार ने फिर वही रास्ता अपनाया है। सरकार के लिए यह पहले इस्तेमाल हो चुका संसदीय तरीका हो सकता है, लेकिन आलोचकों के लिए सवाल वही है—पुरानी मिसाल अपने आप किसी संवैधानिक विवाद का अंतिम उत्तर नहीं बन जाती। खासकर तब, जब Money Bill की सीमाओं को लेकर महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न स्वयं सुप्रीम कोर्ट के सामने रहे हैं।
Money Bill पर सुप्रीम कोर्ट में पहले से चल चुकी है बड़ी संवैधानिक लड़ाई
इस विवाद की जड़ Aadhaar Act से जुड़े मुकदमे तक जाती है। आधार कानून को भी Money Bill के रूप में पारित किए जाने को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी। 2018 में पांच जजों की संविधान पीठ ने बहुमत से आधार कानून के Money Bill के रूप में पारित होने को स्वीकार किया, लेकिन तत्कालीन जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने जोरदार असहमति जताई थी। उन्होंने Money Bill के रास्ते से आधार कानून पारित किए जाने को “fraud on the Constitution” यानी संविधान के साथ धोखा तक कहा था। उनकी चिंता का केंद्र यही था कि Money Bill की सीमा को जरूरत से ज्यादा फैलाने से राज्यसभा की संवैधानिक भूमिका कमजोर हो सकती है।
राज्यसभा कोई सजावटी सदन नहीं है
यही इस बहस का सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक पक्ष है। भारत ने दो सदनों वाली संसद यूं ही नहीं बनाई। लोकसभा सीधे जनता का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि राज्यसभा संघीय व्यवस्था में राज्यों की आवाज को जगह देती है। सरकार के पास लोकसभा में मजबूत बहुमत हो सकता है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि जहां संविधान दोनों सदनों की भागीदारी चाहता है वहां ऊपरी सदन को अप्रासंगिक बना दिया जाए। Money Bill संविधान द्वारा बनाया गया एक विशेष अपवाद है, सामान्य रास्ता नहीं। अगर इस अपवाद की परिभाषा इतनी फैला दी जाए कि सामान्य प्रकृति के कानून भी उसके भीतर आने लगें, तो सवाल केवल किसी एक विधेयक का नहीं रहेगा; सवाल संसद की संरचना का होगा।
हर सरकारी काम में पैसा लगता है, क्या हर कानून Money Bill हो जाएगा?
यही सबसे सीधा सवाल है। नई यूनिवर्सिटी खोलने में पैसा लगेगा, नया आयोग बनाने में पैसा लगेगा, मंत्रालय बनाने में पैसा लगेगा, सरकारी अधिकारियों की नियुक्ति में पैसा लगेगा और जज बढ़ाने में भी पैसा लगेगा। लेकिन केवल सरकारी खर्च होने से क्या हर ऐसा विधेयक Money Bill हो सकता है? संविधान का अनुच्छेद 110 Money Bill के लिए खास विषय निर्धारित करता है। इसलिए असली कानूनी परीक्षण यह नहीं कि किसी कानून के लागू होने पर पैसा खर्च होगा या नहीं, बल्कि यह है कि विधेयक का वास्तविक विषय और उसकी धाराएं अनुच्छेद 110 की निर्धारित सीमाओं के भीतर आती हैं या नहीं।
जज बढ़ाना जरूरी है, लेकिन संवैधानिक प्रक्रिया भी उतनी ही जरूरी
सरकार का उद्देश्य सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाना है और इसके पीछे मजबूत व्यावहारिक कारण मौजूद हैं। अदालत पर मुकदमों का भारी बोझ है और चार अतिरिक्त जज न्यायिक क्षमता बढ़ा सकते हैं। इसलिए इस विवाद को ऐसे पेश करना गलत होगा जैसे सवाल जजों की संख्या बढ़ाने का विरोध हो। असली सवाल प्रक्रिया का है। लोकतंत्र में अच्छे उद्देश्य के लिए अपनाया गया रास्ता भी संविधान की कसौटी पर खरा उतरना चाहिए। यह कहना पर्याप्त नहीं कि कानून से न्यायपालिका को फायदा होगा; यह भी देखना जरूरी है कि कानून बनाने की प्रक्रिया संसद के दोनों सदनों की संवैधानिक भूमिका का सम्मान करती है या नहीं।
लोकसभा स्पीकर का फैसला बेहद महत्वपूर्ण
किसी विधेयक को Money Bill प्रमाणित करने में लोकसभा अध्यक्ष की भूमिका निर्णायक होती है। लेकिन वर्षों से कानूनी बहस इस बात पर भी रही है कि ऐसी certification क्या न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह बाहर है या अदालत संविधान के उल्लंघन के आरोप की स्थिति में इसकी जांच कर सकती है। यह कोई मामूली संसदीय तकनीकी विवाद नहीं है। यदि Money Bill का प्रमाणपत्र अदालत की समीक्षा से पूरी तरह बाहर माना जाए तो लोकसभा में बहुमत वाली कोई भी सरकार इस रास्ते की सीमा को व्यापक करने की कोशिश कर सकती है। दूसरी तरफ, संसद की कार्यवाही में अदालत कितना हस्तक्षेप कर सकती है, यह भी संवैधानिक शक्तियों के विभाजन से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
सरकार के लिए आसान रास्ता, लेकिन लोकतंत्र के लिए कठिन सवाल
Money Bill का रास्ता सरकार के लिए राजनीतिक रूप से सुविधाजनक हो सकता है क्योंकि इसमें राज्यसभा किसी विधेयक को सामान्य कानून की तरह रोक नहीं सकती। लेकिन सुविधा और संवैधानिकता एक ही चीज नहीं हैं। अगर कोई विधेयक वास्तव में अनुच्छेद 110 की कसौटी पर Money Bill है तो उसका उसी रास्ते से पारित होना बिल्कुल वैध है। लेकिन अगर किसी सामान्य विधायी विषय को केवल इसलिए Money Bill के भीतर लाया जाता है कि उससे सरकारी खर्च जुड़ा है, तो यह राज्यसभा की भूमिका पर सीधा संवैधानिक सवाल पैदा करता है।
आज चार जज हैं, कल कोई कहीं बड़ा कानून हो सकता है
इस मामले का असर केवल Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill तक सीमित मानना भूल होगी। संवैधानिक मामलों में मिसालें आगे का रास्ता बनाती हैं। यदि सरकारी खर्च से जुड़ी व्यापक व्याख्या के आधार पर किसी विधेयक को Money Bill बनाया जा सकता है, तो भविष्य की कोई भी सरकार उसी तर्क को किसी और महत्वपूर्ण कानून के लिए इस्तेमाल कर सकती है। तब सवाल बीजेपी या कांग्रेस की सरकार का नहीं रहेगा। सत्ता बदलती रहती है, लेकिन संसद की संस्थागत ताकत एक बार कमजोर होने लगे तो उसका असर लंबे समय तक रहता है।
सवाल सरकार की नीयत पढ़ने का नहीं, संविधान की सीमा तय करने का है
इस मामले में यह दावा कर देना कि सरकार ने जानबूझकर राज्यसभा को दरकिनार करने के लिए ही यह रास्ता चुना, बिना अतिरिक्त प्रमाण के राजनीतिक निष्कर्ष होगा। लेकिन यह सवाल पूछना पूरी तरह जायज है कि जब Money Bill की संवैधानिक सीमा स्वयं इतने गंभीर कानूनी विवाद का विषय रही है, तब सरकार ने एक बार फिर इसी रास्ते को क्यों चुना? सरकार को इसका साफ संवैधानिक आधार बताना चाहिए। लोकतंत्र में सरकार से प्रक्रिया पर सवाल पूछना कानून का विरोध नहीं होता; बल्कि कानून बनाने की प्रक्रिया को मजबूत करता है।
सुप्रीम कोर्ट में जज चार बढ़ेंगे, लेकिन बड़ा फैसला ‘संसद की ताकत’ का होगा
चार नए जज आने से सुप्रीम कोर्ट की क्षमता बढ़ सकती है और लंबित मामलों के बोझ से निपटने में मदद मिल सकती है। लेकिन Money Bill को लेकर चल रही बड़ी संवैधानिक बहस का महत्व इससे कहीं ज्यादा है। आखिरकार तय होना है कि Money Bill की लक्ष्मण रेखा कहां है और क्या सरकार किसी विधेयक के वित्तीय पहलू को आधार बनाकर राज्यसभा की निर्णायक भूमिका सीमित कर सकती है। यह सवाल किसी एक सरकार, एक कानून या चार जजों का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें लोकसभा, राज्यसभा, सरकार और न्यायपालिका—चारों अपनी-अपनी संवैधानिक सीमा में काम करते हैं।
जजों की संख्या बढ़ाना जरूरी हो सकता है, लेकिन न्यायपालिका को मजबूत करने के नाम पर संसद की संवैधानिक प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों को कमजोर नहीं माना जा सकता। कानून का मकसद जितना महत्वपूर्ण है, उसे कानून बनाने का रास्ता भी उतना ही साफ होना चाहिए। आखिर संविधान की रक्षा केवल अदालत के भीतर बैठे जज नहीं करते—संसद जब संविधान के मुताबिक कानून बनाती है, तब वह भी उसी जिम्मेदारी को निभाती है।




