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परिसीमन पर सरकार ने कांग्रेस से साधा संपर्क, राहुल गांधी की शर्त—पहले सभी दलों को भरोसे में लें; सर्वदलीय बैठक की मांग

महिला आरक्षण लागू करने और परिसीमन से जुड़े प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन पर बढ़ी सियासी हलचल; राहुल गांधी और किरेन रिजिजू की फोन पर बातचीत—सरकार का दावा, ज्यादातर दलों को बिल पर आपत्ति नहीं लेकिन राज्यों के हितों की सुरक्षा चाहते हैं

राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 अगस्त 2026

देश की लोकसभा सीटों के भविष्य के नक्शे और महिला आरक्षण को लागू करने से जुड़े परिसीमन के बेहद संवेदनशील मुद्दे पर केंद्र सरकार और कांग्रेस के बीच सीधे संवाद की शुरुआत हुई है। सरकार की ओर से प्रस्तावित विधायी पैकेज को दोबारा आगे बढ़ाने के संकेत के बाद लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू के बीच फोन पर बातचीत हुई। राहुल गांधी ने सरकार से साफ कहा कि इतने बड़े संवैधानिक और राजनीतिक महत्व के फैसले को आगे बढ़ाने से पहले सभी राजनीतिक दलों को भरोसे में लिया जाना चाहिए। कांग्रेस ने इसके लिए बाकायदा सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की है, ताकि प्रस्तावित कानून के महत्वपूर्ण बिंदुओं, परिसीमन के तरीके और अलग-अलग राज्यों पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों पर खुलकर चर्चा हो सके।

मामला इसलिए बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि परिसीमन केवल लोकसभा सीटों की सीमाएं बदलने की प्रशासनिक कवायद नहीं है। भविष्य में किस राज्य को संसद में कितनी सीटें मिलेंगी, देश के अलग-अलग हिस्सों का राजनीतिक प्रतिनिधित्व किस अनुपात में होगा और महिला आरक्षण कानून वास्तव में किस तरह लागू होगा—इन सभी सवालों का संबंध परिसीमन से जुड़ा हुआ है। यही कारण है कि दक्षिण भारत सहित कई राज्यों में लंबे समय से यह चिंता रही है कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को भविष्य के परिसीमन में राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नुकसान नहीं होना चाहिए। ऐसे में सरकार यदि परिसीमन की दिशा में निर्णायक कदम बढ़ाती है तो यह आने वाले वर्षों की भारतीय राजनीति के सबसे बड़े संवैधानिक मुद्दों में से एक बन सकता है।

राहुल गांधी और किरेन रिजिजू के बीच हुई बातचीत में नेता प्रतिपक्ष ने इसी व्यापक राजनीतिक सहमति पर जोर दिया। राहुल गांधी का कहना था कि सरकार को प्रस्तावित कानून के प्रमुख प्रावधानों को लेकर सभी दलों को विश्वास में लेना चाहिए। कांग्रेस की ओर से सर्वदलीय बैठक की मांग इसी आधार पर की गई है। विपक्ष चाहता है कि संसद में विधेयक लाने और संख्याबल के आधार पर उसे पारित कराने से पहले यह स्पष्ट किया जाए कि परिसीमन किस आधार पर होगा, राज्यों के वर्तमान प्रतिनिधित्व और भविष्य की सीटों पर उसका क्या असर पड़ेगा तथा उन राज्यों के हितों की सुरक्षा किस प्रकार सुनिश्चित होगी जिन्हें संभावित बदलाव को लेकर आशंका है।

हालांकि सरकार फिलहाल सर्वदलीय बैठक की कांग्रेस की मांग स्वीकार करने के मूड में दिखाई नहीं देती। सरकारी सूत्रों का दावा है कि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू इस विषय पर समाजवादी पार्टी और DMK सहित लगभग सभी प्रमुख राजनीतिक दलों के नेताओं से पहले ही बातचीत कर चुके हैं। सरकार से जुड़े एक पदाधिकारी के मुताबिक इन चर्चाओं में प्रस्तावित विधेयक को लेकर सीधे तौर पर कोई बड़ी आपत्ति सामने नहीं आई, लेकिन अलग-अलग दलों ने अपने राज्यों और क्षेत्रीय हितों की सुरक्षा की मांग जरूर रखी है। सरकार का तर्क इसलिए यह दिखाई देता है कि जब प्रमुख दलों के साथ व्यक्तिगत स्तर पर बातचीत हो चुकी है तो अलग से सर्वदलीय बैठक बुलाना आवश्यक नहीं है।

यहीं सरकार और कांग्रेस के रुख में बुनियादी अंतर दिखाई देता है। सरकार अलग-अलग राजनीतिक दलों के नेताओं से हुई बातचीत को पर्याप्त परामर्श मान रही है, जबकि कांग्रेस औपचारिक और सामूहिक राजनीतिक संवाद चाहती है, जिसमें सभी दल एक मंच पर अपनी चिंताएं और शर्तें रख सकें। परिसीमन जैसे विषय पर यह अंतर मामूली नहीं है, क्योंकि इसका असर केवल मौजूदा सरकार या विपक्ष पर नहीं बल्कि आने वाले कई दशकों तक संसद में राज्यों की राजनीतिक ताकत पर पड़ सकता है।

सरकार की तरफ से यह दावा भी सामने आया है कि प्रस्तावित संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए उसके पास जरूरी संख्या मौजूद है और कांग्रेस से संपर्क केवल व्यापक राजनीतिक संवाद की प्रक्रिया का हिस्सा है। यदि सरकार वास्तव में आवश्यक संख्याबल को लेकर आश्वस्त है तो कांग्रेस की भूमिका विधेयक को रोकने या पारित कराने से कहीं अधिक राजनीतिक सहमति और उसकी वैधता के सवाल से जुड़ जाती है। संविधान में बड़े बदलाव केवल गणित से पारित हो सकते हैं, लेकिन उनका लंबे समय तक स्वीकार्य बने रहना व्यापक राजनीतिक सहमति पर निर्भर करता है।

इस पूरी बहस के केंद्र में महिला आरक्षण कानून भी है। संसद पहले ही महिलाओं के लिए लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में एक-तिहाई सीटें आरक्षित करने का कानून पारित कर चुकी है, लेकिन उसका वास्तविक क्रियान्वयन परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है। इसलिए परिसीमन आगे बढ़ने का अर्थ केवल संसदीय सीटों का पुनर्निर्धारण नहीं बल्कि महिला आरक्षण को जमीन पर लागू करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम होगा। यही वजह है कि सरकार इस पूरे विषय को एक व्यापक विधायी पैकेज के रूप में आगे बढ़ाने की तैयारी करती दिखाई दे रही है।

सबसे पेचीदा प्रश्न राज्यों के बीच प्रतिनिधित्व का है। देश के अलग-अलग हिस्सों में पिछले दशकों में जनसंख्या वृद्धि की दर समान नहीं रही है। दक्षिण के कई राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण और सामाजिक संकेतकों में बेहतर प्रदर्शन किया है, जबकि कुछ अन्य राज्यों में जनसंख्या तेजी से बढ़ी। यदि भविष्य में लोकसभा सीटों का बंटवारा केवल नवीनतम जनसंख्या के आधार पर बड़े पैमाने पर बदला जाता है, तो बेहतर जनसंख्या नियंत्रण वाले राज्यों को आशंका है कि राष्ट्रीय राजनीति में उनकी आनुपातिक ताकत कम हो सकती है। इसी वजह से परिसीमन का सवाल गणित से निकलकर संघीय संतुलन और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के सवाल तक पहुंच जाता है।

DMK जैसे दक्षिण भारतीय दल इस विषय पर पहले भी अपनी चिंताएं व्यक्त करते रहे हैं। ऐसे दल चाहते हैं कि जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को उसकी ‘सजा’ राजनीतिक प्रतिनिधित्व घटाकर न मिले। सरकार की बातचीत में भी विभिन्न दलों द्वारा अपने-अपने राज्यों और हितों की सुरक्षा पर जोर दिए जाने का दावा इसी संवेदनशीलता को दिखाता है। आने वाली बहस में इसलिए केवल यह महत्वपूर्ण नहीं होगा कि लोकसभा की कुल सीटें कितनी होती हैं, बल्कि यह भी कि अतिरिक्त या पुनर्वितरित सीटें राज्यों के बीच किस फॉर्मूले से बांटी जाती हैं।

कांग्रेस की सर्वदलीय बैठक की मांग इसी संदर्भ में राजनीतिक महत्व रखती है। राहुल गांधी का संदेश यह है कि सरकार के पास संख्या होने भर से इतने दूरगामी फैसले पर व्यापक विमर्श की जरूरत समाप्त नहीं हो जाती। विपक्ष चाहता है कि प्रस्ताव सामने आने से पहले राजनीतिक दलों को उसके महत्वपूर्ण प्रावधानों की स्पष्ट जानकारी दी जाए और उनकी चिंताओं का समाधान किया जाए। सरकार दूसरी तरफ यह संकेत दे रही है कि बातचीत पहले ही काफी आगे बढ़ चुकी है और अलग-अलग दलों से संपर्क में उसे प्रस्ताव के खिलाफ कोई व्यापक राजनीतिक दीवार दिखाई नहीं दी है।

अब निगाह इस बात पर रहेगी कि केंद्र प्रस्तावित संविधान संशोधन और उससे जुड़े विधायी पैकेज को संसद में कब और किस स्वरूप में पेश करता है। उससे भी महत्वपूर्ण यह होगा कि राज्यों की सीटों, परिसीमन के आधार और महिला आरक्षण के क्रियान्वयन के बीच सरकार कौन-सा रास्ता निकालती है। राहुल गांधी और किरेन रिजिजू की बातचीत ने कम से कम यह स्पष्ट कर दिया है कि पर्दे के पीछे इस बड़े संवैधानिक बदलाव को लेकर राजनीतिक संवाद शुरू हो चुका है।

परिसीमन का यह मुद्दा आने वाले दिनों में सत्ता और विपक्ष की सामान्य राजनीतिक खींचतान से कहीं बड़ा रूप ले सकता है। सवाल सिर्फ यह नहीं होगा कि सरकार के पास विधेयक पास कराने के लिए कितने सांसद हैं। असली सवाल यह होगा कि भारत के संघीय ढांचे में उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम और पूर्वोत्तर के राज्यों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व का नया संतुलन क्या होगा, जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों के हित कैसे सुरक्षित रहेंगे और महिला आरक्षण को किस नए चुनावी नक्शे पर लागू किया जाएगा। यही वजह है कि राहुल गांधी की सर्वदलीय बैठक की मांग और सरकार का उसे गैर-जरूरी मानना आने वाली बड़ी राजनीतिक लड़ाई की शुरुआती झलक भर हो सकती है।

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