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Google ने ChatGPT से पहले बना लिया था AI चैटबॉट, फिर भी दुनिया के सामने नहीं लाया; Jeff Dean ने बताया कैसे हाथ से निकल गई बड़ी बढ़त

महामारी के दौरान Google कर्मचारी लंच टाइम में करते थे इस AI से बातचीत; गलत सर्च जवाब और आपत्तिजनक प्रतिक्रियाओं के खतरे के कारण कंपनी ने रोकी सार्वजनिक रिलीज—Jeff Dean बोले, हम समय रहते समझ ही नहीं पाए कि Search से आगे चैटबॉट कितने उपयोगी हो सकते हैं

टेक्नोलॉजी | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 7 अगस्त 2026

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में ChatGPT के आने को उस ऐतिहासिक मोड़ के रूप में देखा जाता है जिसने आम लोगों के लिए AI के इस्तेमाल का तरीका ही बदल दिया। लेकिन अब Google के दिग्गज कंप्यूटर वैज्ञानिक और लंबे समय तक कंपनी की AI रणनीति के केंद्र में रहे Jeff Dean ने एक ऐसी बात बताई है जो टेक्नोलॉजी जगत में बेहद दिलचस्प सवाल खड़ा करती है—Google ने OpenAI के ChatGPT के सार्वजनिक होने से करीब एक साल पहले ही वैसा AI चैटबॉट तैयार कर लिया था, लेकिन कंपनी ने उसे दुनिया के सामने उतारने का फैसला नहीं किया। यानी जिस तकनीक ने बाद में पूरी दुनिया में AI की होड़ शुरू कर दी, उसका एक शुरुआती रूप Google के पास पहले से मौजूद था। फर्क सिर्फ इतना था कि Google ने उसे प्रयोगशाला और अपने कर्मचारियों तक सीमित रखा, जबकि OpenAI ने इसी तरह की तकनीक को आम लोगों के हाथों तक पहुंचाकर बाजार की दिशा बदल दी।

Jeff Dean के मुताबिक यह चैटबॉट केवल कोई अधूरा प्रयोग नहीं था जिसे कुछ इंजीनियर बंद कमरे में टेस्ट कर रहे हों। कोविड महामारी और लॉकडाउन के दौर में Google के कर्मचारी इसका आंतरिक रूप से इस्तेमाल करते थे। Dean ने बताया कि कर्मचारी लंच के दौरान इस चैटबॉट से बातचीत किया करते थे क्योंकि वह एक अच्छे बातचीत के साथी जैसा अनुभव देता था। यह उस समय की बात है जब आम इंटरनेट उपयोगकर्ता के लिए AI chatbot आज जितना परिचित शब्द भी नहीं था। इससे पता चलता है कि conversational AI की संभावनाओं की झलक Google के भीतर काफी पहले दिखाई देने लगी थी।

इसके बावजूद Google ने इसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया? Jeff Dean के मुताबिक इसके पीछे मुख्य रूप से दो बड़ी समस्याएं थीं। पहली समस्या विश्वसनीयता की थी। चैटबॉट Search के नजरिए से हमेशा सही जानकारी नहीं देता था। वह गलतियां कर सकता था और ऐसे जवाब दे सकता था जिन पर भरोसा करना मुश्किल था। दूसरी बड़ी चिंता सुरक्षा की थी। मॉडल कभी-कभी ऐसी बातें भी कह देता था जिन्हें आपत्तिजनक माना जा सकता था। किसी ऐसी कंपनी के लिए जिसकी पहचान दुनिया के सबसे बड़े Search प्लेटफॉर्म के रूप में बनी हुई थी, गलत या असुरक्षित जवाब देने वाले AI को करोड़ों लोगों के सामने उतारना बड़ा जोखिम था। इसलिए तकनीक मौजूद होने के बावजूद कंपनी नेतृत्व ने सार्वजनिक रिलीज का रास्ता नहीं चुना।

लेकिन कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा केवल यह नहीं है कि Google के पास ChatGPT जैसा सिस्टम पहले मौजूद था। Jeff Dean की टिप्पणी से सामने आने वाली बड़ी बात यह है कि Google उस समय यह पूरी तरह नहीं समझ पाया कि लोग chatbot का इस्तेमाल Search के विकल्प के अलावा किन-किन कामों के लिए कर सकते हैं। कंपनी की सोच स्वाभाविक रूप से Search के इर्द-गिर्द केंद्रित थी—यदि कोई AI सवाल का तथ्यात्मक रूप से गलत जवाब दे रहा है तो वह Search product के लिहाज से बड़ी कमजोरी थी। लेकिन बाद में दुनिया ने दिखाया कि conversational AI की ताकत केवल सवाल पूछकर जानकारी हासिल करने में नहीं थी।

लोग AI से कह सकते थे—मेरे लिए एक ईमेल लिख दो, इस लंबे दस्तावेज को कुछ बिंदुओं में समझा दो, किसी कठिन विषय को आसान भाषा में समझाओ, किसी विचार को बेहतर शब्दों में लिखो, कोड तैयार करने में मदद करो, रिपोर्ट का सार निकालो या किसी विषय पर brainstorming करो। Jeff Dean ने भी स्वीकार किया कि Google उस समय यह पूरी तरह नहीं समझ पाया कि ऐसे बहुत से काम हैं जिन्हें लोग Search engine से नहीं पूछेंगे, लेकिन chatbot से करवाना चाहेंगे। बाद में यही उपयोग AI चैटबॉट की लोकप्रियता का बड़ा कारण बना।

यहीं Google और OpenAI की रणनीति के बीच ऐतिहासिक अंतर दिखाई देता है। Google के पास विशाल तकनीकी संसाधन, दुनिया के बेहतरीन AI वैज्ञानिक, अरबों उपयोगकर्ताओं तक पहुंच और वर्षों का मशीन लर्निंग अनुभव था। लेकिन उसकी सबसे बड़ी ताकत—Search—कहीं न कहीं उसकी सोच की सीमा भी बन गई। Google नई तकनीक को इस कसौटी पर देख रहा था कि वह मौजूदा Search अनुभव के मुकाबले कितनी भरोसेमंद है। दूसरी ओर OpenAI ने chatbot को एक बिल्कुल अलग प्रकार के उत्पाद के रूप में लोगों के सामने रखा, जहां उपयोगकर्ता केवल तथ्य खोजने नहीं बल्कि AI के साथ काम करने, लिखने, समझने और विचार विकसित करने लगे।

ChatGPT के सार्वजनिक होने के बाद जो हुआ उसने पूरी टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री की प्राथमिकताएं बदल दीं। Generative AI अचानक प्रयोगशालाओं से निकलकर आम लोगों के मोबाइल और कंप्यूटर तक पहुंच गया। कंपनियों के बीच बड़े भाषा मॉडल विकसित करने की होड़ तेज हुई और Search से लेकर ऑफिस सॉफ्टवेयर, प्रोग्रामिंग, शिक्षा, मीडिया और वैज्ञानिक अनुसंधान तक AI को शामिल करने की दौड़ शुरू हो गई। Google को भी अपने AI उत्पादों को तेजी से आगे बढ़ाना पड़ा। इस लिहाज से Jeff Dean का खुलासा उस पुराने सवाल को फिर सामने लाता है—क्या बड़ी कंपनियां कभी-कभी तकनीक की कमी से नहीं, बल्कि अपनी सफल मौजूदा व्यवस्था को बचाने की मानसिकता के कारण अगली क्रांति में पीछे रह जाती हैं?

Jeff Dean की अपनी कहानी भी Google और आधुनिक इंटरनेट के इतिहास से गहराई से जुड़ी है। उन्होंने कंपनी में करीब 27 वर्ष बिताए और Google की बुनियादी तकनीकी संरचना तैयार करने वाले प्रमुख इंजीनियरों में उनकी गिनती होती है। उन्होंने Google Brain की सह-स्थापना की, Google AI का नेतृत्व किया और बाद में कंपनी के Chief Scientist की भूमिका निभाई। MapReduce, Bigtable और Spanner जैसे बड़े पैमाने पर डेटा संभालने वाले सिस्टम के निर्माण में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। TensorFlow के डिजाइन और implementation में भी उनका योगदान रहा और Google के TPU hardware acceleration programme को आगे बढ़ाने में उन्होंने नेतृत्व किया। Google News और AdSense जैसे शुरुआती उत्पादों से लेकर बड़े neural networks की training तक उनका काम फैला रहा।

27 साल बाद Jeff Dean ने 2026 में Google छोड़ने का फैसला किया। उन्होंने Sanjay Ghemawat के साथ Discovery Loop नाम की AI स्टार्टअप की सह-स्थापना की है। इसे public benefit corporation के रूप में विकसित किया जा रहा है और इसका उद्देश्य AI की मदद से वैज्ञानिक तथा इंजीनियरिंग प्रयोगों को अधिक स्वचालित और तेज बनाना है। यानी Google में इंटरनेट और AI की बुनियादी तकनीक बनाने में दशकों बिताने के बाद Dean अब AI को वैज्ञानिक खोज की प्रक्रिया में लगाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

उनका Google के पुराने chatbot को लेकर बयान इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह innovation के बारे में एक बड़ी सीख देता है। किसी कंपनी के पास सबसे अच्छी तकनीक होना और उस तकनीक से अगली बड़ी क्रांति शुरू करना दो अलग-अलग बातें हैं। कई बार आविष्कार पहले हो जाता है, लेकिन उसका वास्तविक महत्व बाद में समझ आता है। Google के पास conversational AI था, उसके कर्मचारी उससे बातचीत भी कर रहे थे और उसकी क्षमताओं का अनुभव भी कर रहे थे—फिर भी कंपनी उसे सार्वजनिक उत्पाद बनाने की उपयोगिता और जोखिम के बीच उलझी रही।

यह भी जरूरी है कि Google के उस समय के फैसले को केवल एक ‘भारी भूल’ कहकर सरल न बना दिया जाए। Jeff Dean ने स्वयं सुरक्षा और गलत जवाबों की समस्याओं का उल्लेख किया है। बड़े पैमाने पर किसी AI सिस्टम को जारी करने से पहले गलत सूचना, आपत्तिजनक सामग्री और उपयोगकर्ता सुरक्षा की चिंता वास्तविक थी और आज भी है। फर्क इतना है कि OpenAI के ChatGPT ने यह साबित कर दिया कि अपूर्ण होने के बावजूद conversational AI इतना उपयोगी हो सकता है कि लोग उसकी सीमाओं को समझते हुए भी उसे बड़े पैमाने पर अपनाएंगे।

अंततः AI की इस कहानी में एक दिलचस्प विडंबना छिपी है—Google के पास भविष्य की झलक पहले थी, लेकिन OpenAI ने उस भविष्य को पहले आम लोगों के हाथ में रख दिया। Jeff Dean की टिप्पणी बताती है कि टेक्नोलॉजी की दौड़ में केवल यह मायने नहीं रखता कि आविष्कार सबसे पहले किसने किया; कई बार असली बढ़त उसे मिलती है जो सही समय पर समझ ले कि लोग उस आविष्कार का इस्तेमाल आखिर करना किस लिए चाहते हैं।

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