राष्ट्रीय/राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | कोलकाता | 22 जून 2026
तृणमूल कांग्रेस में निर्णायक मोड़
पश्चिम बंगाल की राजनीति में सोमवार को उस समय बड़ा राजनीतिक भूचाल आ गया जब तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के गद्दार भगोड़ों के गुट ने पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को चुनौती देते हुए नई राष्ट्रीय कार्यसमिति के गठन की घोषणा कर दी। विधानसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद शुरू हुआ असंतोष अब खुली बगावत में बदलता दिखाई दे रहा है। बागी नेताओं ने दावा किया है कि उन्होंने पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में बड़ा बदलाव करते हुए ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी को उनके पदों से हटाकर नई टीम का गठन किया है।
इस घटनाक्रम ने बंगाल की राजनीति में नई बहस छेड़ दी है और राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या तृणमूल कांग्रेस अपने सबसे बड़े संगठनात्मक संकट से गुजर रही है।
अरूप राय को बनाया गया नया चेयरमैन
ऋतब्रत बनर्जी के नेतृत्व वाले गद्दार भगौड़े गुट ने घोषणा की कि हावड़ा मध्य से विधायक अरूप राय को पार्टी का नया राष्ट्रीय चेयरमैन नियुक्त किया गया है। इसके साथ ही ममता बनर्जी को इस पद से हटाने का दावा भी किया गया।
भगोड़ों का कहना है कि पार्टी को नए नेतृत्व और नई दिशा की आवश्यकता है। उनका आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हुई और निर्णय लेने की प्रक्रिया सीमित लोगों तक सिमटकर रह गई। इसी कारण संगठन के भीतर व्यापक असंतोष पैदा हुआ।
अभिषेक बनर्जी को भी पद से हटाने का दावा
भगोड़ों ने केवल ममता बनर्जी को ही नहीं, बल्कि पार्टी के प्रभावशाली नेता अभिषेक बनर्जी को भी राष्ट्रीय महासचिव पद से हटाने का दावा किया है। उनकी जगह नई नियुक्तियों की घोषणा की गई है।
गद्दार नेताओं के अनुसार संगठन को परिवारवाद और केंद्रीकृत नेतृत्व से बाहर निकालकर सामूहिक नेतृत्व की दिशा में ले जाने की आवश्यकता है। उनका कहना है कि पार्टी की चुनावी हार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि संगठन में व्यापक बदलाव की जरूरत है।
नई राष्ट्रीय कार्यसमिति का गठन
गद्दार गुट ने दावा किया कि नई राष्ट्रीय कार्यसमिति का गठन कर दिया गया है। इसके तहत अरूप राय को राष्ट्रीय चेयरमैन और ऋतब्रत बनर्जी को राष्ट्रीय महासचिव बनाया गया है। इसके अलावा संगठन के विभिन्न पदों पर नए चेहरों को जिम्मेदारी सौंपे जाने की भी घोषणा की गई है।
गद्दारों का कहना है कि कई विधायक, पूर्व सांसद, जिला स्तर के नेता और कार्यकर्ता उनके साथ हैं। हालांकि उन्होंने अभी तक सभी समर्थकों की सूची सार्वजनिक नहीं की है।
चुनावी हार के बाद बढ़ा असंतोष
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल कांग्रेस के भीतर असंतोष लगातार बढ़ रहा था। लंबे समय से पार्टी के कुछ नेताओं द्वारा संगठन में बदलाव और नेतृत्व की कार्यशैली को लेकर सवाल उठाए जा रहे थे।
चुनाव परिणामों के बाद यह असंतोष और खुलकर सामने आया। कई नेताओं ने पार्टी की रणनीति, उम्मीदवार चयन और संगठनात्मक ढांचे पर सवाल उठाए थे। अब बागी गुट का यह कदम उसी असंतोष का परिणाम माना जा रहा है।
टीएमसी नेतृत्व की प्रतिक्रिया पर नजर
इस पूरे घटनाक्रम पर तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक नेतृत्व की ओर से विस्तृत प्रतिक्रिया का इंतजार किया जा रहा है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि पार्टी नेतृत्व जल्द ही इस चुनौती का जवाब देगा और संगठन में अपनी स्थिति मजबूत करने का प्रयास करेगा।
सूत्रों का कहना है कि पार्टी के शीर्ष नेता स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जल्द ही रणनीतिक बैठकें हो सकती हैं। यह भी माना जा रहा है कि पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल नेताओं के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
बंगाल की राजनीति पर पड़ सकता है बड़ा असर
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भगौड़ा गुट अपने दावों के अनुरूप पर्याप्त जनप्रतिनिधियों और नेताओं का समर्थन जुटाने में सफल रहता है, तो इसका असर केवल तृणमूल कांग्रेस तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरे पश्चिम बंगाल के राजनीतिक समीकरण बदल सकते हैं।
आने वाले महीनों में स्थानीय निकाय चुनावों और अन्य राजनीतिक गतिविधियों पर भी इस घटनाक्रम का प्रभाव दिखाई दे सकता है। विपक्षी दल भी इस स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और इसे अपने राजनीतिक लाभ के अवसर के रूप में देख रहे हैं।
नेतृत्व की लड़ाई या पार्टी के भविष्य की जंग?
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह केवल नेतृत्व परिवर्तन का विवाद नहीं है, बल्कि तृणमूल कांग्रेस के भविष्य, उसकी विचारधारा और संगठनात्मक संरचना की लड़ाई बन चुका है। एक ओर ममता बनर्जी का दशकों पुराना नेतृत्व है, जिसने पार्टी को राज्य की सत्ता तक पहुंचाया, वहीं दूसरी ओर बदलाव की मांग करने वाला एक नया गुट है जो संगठन में नई व्यवस्था की बात कर रहा है।
अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि ममता बनर्जी और अभिषेक बनर्जी इस चुनौती का सामना किस तरह करते हैं और गद्दार गुट का दावा वास्तविक राजनीतिक ताकत में कितना बदल पाता है। इतना तय है कि बंगाल की राजनीति में शुरू हुआ यह नया अध्याय आने वाले दिनों में कई बड़े घटनाक्रमों को जन्म दे सकता है।




