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क्या ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल की गलती की सज़ा आज देश भुगत रहा है?

ओपिनियन/ राष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 7 जून 2026

अगर नीतीश कुमार को INDIA गठबंधन का कन्वेनर बना दिया जाता, तो 2024 में बन सकती थी INDIA गठबंधन की सरकार

भारतीय राजनीति में कई बार चुनावी नतीजे जनता से पहले नेताओं के फैसले तय कर देते हैं। 2024 का लोकसभा चुनाव भी कुछ ऐसा ही दिखाई देता है। आज जब जेडीयू के वरिष्ठ नेता संजय कुमार झा यह दावा कर रहे हैं कि नीतीश कुमार को INDIA गठबंधन का कन्वेनर बनने से ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने रोका था, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या उस समय की एक राजनीतिक गलती ने पूरे देश की दिशा बदल दी? क्या विपक्ष के कुछ नेताओं की महत्वाकांक्षा ने सत्ता परिवर्तन का एक बड़ा मौका खत्म कर दिया?

2024 के चुनाव परिणामों पर नजर डालें तो तस्वीर काफी साफ दिखाई देती है। बीजेपी अपने दम पर बहुमत हासिल नहीं कर पाई थी। पार्टी 240 सीटों पर रुक गई थी, जबकि सरकार बनाने के लिए 272 सीटों की जरूरत थी। ऐसे में बीजेपी को अपने सहयोगी दलों का सहारा लेना पड़ा। सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाई बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जेडीयू और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की टीडीपी ने। जेडीयू के 12 और टीडीपी के 16 सांसदों ने मिलकर 28 सांसदों का वह समर्थन दिया जिसके दम पर एनडीए सरकार बन सकी। यदि ये 28 सांसद एनडीए के साथ नहीं होते, तो केंद्र में सरकार बनाने का पूरा गणित बदल जाता।

यहीं से वह सवाल पैदा होता है जो आज राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। अगर नीतीश कुमार INDIA गठबंधन में बने रहते तो क्या चंद्रबाबू नायडू भी दूसरी दिशा में जाते? अगर नीतीश कुमार गठबंधन के कन्वेनर बन जाते तो क्या विपक्ष पहले से अधिक मजबूत होकर चुनाव लड़ता? अगर ऐसा होता तो क्या आज केंद्र में INDIA गठबंधन की सरकार होती? इन सवालों का जवाब पूरी तरह निश्चित नहीं हो सकता, लेकिन राजनीतिक गणित यह जरूर बताता है कि ऐसा होना असंभव भी नहीं था।

नीतीश कुमार केवल बिहार के नेता नहीं थे। INDIA गठबंधन बनाने की शुरुआती पहल में उनकी भूमिका सबसे महत्वपूर्ण मानी जाती थी। उन्होंने अलग-अलग दलों के नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश की। कई बैठकें आयोजित कराईं और विपक्षी एकता का माहौल बनाया। ऐसे में स्वाभाविक रूप से यह उम्मीद की जा रही थी कि उन्हें गठबंधन में कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जाएगी। लेकिन यदि संजय कुमार झा का दावा सही है, तो उस समय कुछ नेताओं ने उनके नाम पर सहमति बनने के बावजूद विरोध किया। यही वह मोड़ था जहां से विपक्ष के भीतर अविश्वास की शुरुआत हुई।

राजनीति में सम्मान सबसे बड़ी ताकत होता है। कोई भी नेता तब तक किसी गठबंधन के लिए पूरी ताकत से काम करता है जब तक उसे लगता है कि उसकी भूमिका और योगदान की कद्र हो रही है। लेकिन जब किसी नेता को लगता है कि उसे जानबूझकर किनारे किया जा रहा है, तो दूरी बढ़ने लगती है। ऐसा लगता है कि INDIA गठबंधन के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ। जिस नेता ने गठबंधन खड़ा करने में सबसे अधिक मेहनत की, वही नेता कुछ समय बाद गठबंधन छोड़कर एनडीए में चला गया। यह केवल एक व्यक्ति का जाना नहीं था, बल्कि पूरे राजनीतिक समीकरण का बदल जाना था।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि 2024 का चुनाव बहुत छोटे अंतर से सत्ता का फैसला करने वाला चुनाव साबित हुआ। यदि जेडीयू और टीडीपी के 28 सांसद एनडीए के साथ नहीं होते, तो बीजेपी के नेतृत्व वाला गठबंधन बहुमत से नीचे आ जाता। दूसरी तरफ INDIA गठबंधन और अन्य विपक्षी दल सरकार बनाने के लिए जरूरी समर्थन जुटाने की स्थिति में पहुंच सकते थे। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि 2024 के चुनाव में सबसे महत्वपूर्ण संख्या 240 या 272 नहीं, बल्कि 28 थी। यही 28 सांसद केंद्र की सत्ता का फैसला करने वाले साबित हुए।

आज पीछे मुड़कर देखने पर ऐसा लगता है कि विपक्ष की सबसे बड़ी हार चुनाव प्रचार में नहीं हुई, बल्कि उन बैठकों में हुई जहां नेतृत्व और जिम्मेदारियों को लेकर सहमति नहीं बन सकी। अगर सभी दल बड़े लक्ष्य को प्राथमिकता देते, अगर व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर निर्णय लिए जाते और अगर नीतीश कुमार को वह जिम्मेदारी दी जाती जिसकी चर्चा हो रही थी, तो शायद भारतीय राजनीति की तस्वीर बिल्कुल अलग होती।

यह भी सच है कि इतिहास में “अगर” और “शायद” का कोई निश्चित जवाब नहीं होता। लेकिन राजनीति संभावनाओं का खेल है और 2024 का गणित एक बात साफ बताता है कि नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू के 28 सांसदों ने सरकार बनाने में निर्णायक भूमिका निभाई। इसलिए यह सवाल लंबे समय तक पूछा जाता रहेगा कि क्या ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक जिद ने केवल INDIA गठबंधन को नुकसान पहुंचाया या फिर देश को एक वैकल्पिक सरकार मिलने का अवसर भी छीन लिया?

आज भी यह बहस जारी है, लेकिन एक बात साफ है—विपक्ष यदि पूरी तरह एकजुट रहता, तो 2024 का चुनाव परिणाम और देश की राजनीतिक दिशा दोनों अलग हो सकती थीं। यही वह राजनीतिक सबक है जिसे आने वाले वर्षों तक याद रखा जाएगा।

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