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ट्रंप को बड़ा झटका : 1.8 अरब डॉलर फंड पर कोर्ट की बड़ी रोक

अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन | 30 मई 2026

अमेरिका में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की एक महत्वाकांक्षी और विवादास्पद योजना को बड़ा झटका लगा है। एक संघीय अदालत ने ट्रंप प्रशासन द्वारा बनाए गए 1.8 अरब डॉलर के तथाकथित “एंटी-वेपनाइजेशन फंड” पर अस्थायी रोक लगा दी है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब इस फंड को लेकर पहले से ही डेमोक्रेट और रिपब्लिकन दोनों दलों के भीतर गंभीर सवाल उठ रहे थे।

वर्जीनिया की संघीय जिला अदालत की न्यायाधीश लियोनी ब्रिंकेमा ने आदेश जारी करते हुए कहा कि जब तक मामले की कानूनी सुनवाई पूरी नहीं हो जाती, तब तक इस फंड से कोई पैसा जारी नहीं किया जाएगा, न ही किसी दावे पर विचार किया जाएगा और न ही किसी प्रकार का भुगतान किया जाएगा। अदालत ने स्पष्ट किया कि यह कदम इसलिए उठाया गया है ताकि सुनवाई पूरी होने से पहले सरकारी धन का “अपरिवर्तनीय वितरण” न हो सके।

यह विवाद तब और गहरा गया जब 6 जनवरी 2021 को अमेरिकी संसद भवन (कैपिटल) पर हुए हमले से जुड़े मामलों के अभियोजक एंड्रयू फ्लॉयड और अन्य अधिकारियों ने इस फंड के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया। उनका आरोप है कि यह फंड वास्तव में ट्रंप समर्थकों और राजनीतिक सहयोगियों को लाभ पहुंचाने के लिए बनाया गया है और इसके संचालन में पारदर्शिता तथा सार्वजनिक निगरानी लगभग न के बराबर है।

एंड्रयू फ्लॉयड, जिन्होंने कैपिटल दंगा मामलों में अभियोजन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई थी, ने अदालत में कहा कि ट्रंप प्रशासन उन लोगों को आर्थिक लाभ पहुंचाने की कोशिश कर रहा है जिनकी जांच और अभियोजन उन्होंने किया था। फ्लॉयड के अनुसार यह व्यवस्था कानून के शासन और लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए खतरनाक संदेश देती है, क्योंकि इससे यह संकेत जाता है कि सत्ता के करीब रहने वालों को विशेष संरक्षण और लाभ मिल सकता है।

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ट्रंप प्रशासन इस फंड को उन लोगों के लिए “मुआवजा योजना” बताता है जो कथित रूप से सरकारी एजेंसियों के राजनीतिक दुरुपयोग का शिकार हुए हैं। लेकिन आलोचकों का कहना है कि कांग्रेस की मंजूरी के बिना इस तरह का फंड बनाना संवैधानिक और वित्तीय दोनों दृष्टि से विवादास्पद है। कई विशेषज्ञ इसे “राजनीतिक इनाम योजना” और “स्लश फंड” तक बता चुके हैं।

इस पूरे मामले ने रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी असहजता पैदा कर दी है। रिपोर्टों के अनुसार सीनेट के कई रिपब्लिकन सांसदों ने भी फंड की पारदर्शिता और कानूनी वैधता पर सवाल उठाए हैं। यही कारण है कि आव्रजन और सीमा सुरक्षा से जुड़े एक महत्वपूर्ण विधेयक पर मतदान तक टाल दिया गया।

हालांकि न्याय विभाग ने अदालत के फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि यह फंड पूरी तरह कानूनी है और इसके समर्थन में पूर्व प्रशासनों के दौरान हुए समझौतों की मिसालें मौजूद हैं। विभाग का कहना है कि अदालतों को सरकार की नीतिगत प्राथमिकताओं में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए और सरकार उन लोगों को न्याय दिलाने के लिए प्रतिबद्ध है जिन्हें “कानूनी उत्पीड़न” का सामना करना पड़ा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल एक फंड तक सीमित नहीं है, बल्कि ट्रंप प्रशासन और न्यायिक संस्थाओं के बीच बढ़ते टकराव का नया अध्याय बन सकता है। 6 जनवरी कैपिटल दंगा आज भी अमेरिकी राजनीति का सबसे संवेदनशील और विभाजनकारी मुद्दा बना हुआ है। ऐसे में अदालत का यह फैसला आने वाले महीनों में अमेरिकी राजनीति, न्याय व्यवस्था और राष्ट्रपति चुनावी विमर्श पर गहरा प्रभाव डाल सकता है।

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अब सबकी निगाहें 12 जून को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह तय होगा कि ट्रंप का यह बहुचर्चित फंड आगे बढ़ेगा या कानूनी चुनौतियों के बीच ठंडे बस्ते में चला जाएगा।

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