अंतरराष्ट्रीय | ABC NATIONAL NEWS | तेहरान | 28 मई 2026
पश्चिम एशिया में युद्ध की आशंका पर ईरान का बड़ा संकेत
Iran की शक्तिशाली सैन्य इकाई इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने अमेरिका के साथ दोबारा बड़े युद्ध की संभावना को “कम” बताया है, लेकिन साथ ही बेहद कड़ी चेतावनी भी दी है कि यदि किसी भी प्रकार का हमला हुआ तो उसका जवाब बेहद विनाशकारी होगा। यह बयान ऐसे समय आया है जब पिछले कुछ दिनों में अमेरिकी सैन्य हमलों, संघर्षविराम उल्लंघन के आरोपों और होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव ने पूरे पश्चिम एशिया को फिर अस्थिरता के मुहाने पर ला खड़ा किया है। ईरान की ओर से आया यह बयान दुनिया के लिए राहत और चेतावनी — दोनों संकेत लेकर आया है। एक तरफ तेहरान यह संदेश देना चाहता है कि वह फिलहाल पूर्ण युद्ध नहीं चाहता, लेकिन दूसरी तरफ उसने स्पष्ट कर दिया है कि उसकी सैन्य तैयारी पूरी तरह सक्रिय है और किसी भी आक्रमण का जवाब पहले से अधिक आक्रामक तरीके से दिया जाएगा।
IRGC की चेतावनी: “हमलावरों की कब्रगाह बनेगा दक्षिणी तट”
IRGC नौसेना के उप राजनीतिक प्रमुख मोहम्मद अकबरज़ादेह ने बेहद सख्त शब्दों में कहा कि ईरानी सेनाएं “भरी हुई बंदूकों” के साथ तैयार बैठी हैं। उन्होंने कहा कि दुश्मन की कमजोरी के कारण युद्ध की संभावना कम है, लेकिन अगर हमला हुआ तो चाबहार से लेकर माहशहर तक का पूरा दक्षिणी तटीय इलाका हमलावरों के लिए “कब्रगाह” बन जाएगा। यह इलाका रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है क्योंकि यहीं से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज और खाड़ी क्षेत्र की समुद्री गतिविधियों पर नियंत्रण रखा जाता है। ईरान की इस चेतावनी को केवल सैन्य बयान नहीं बल्कि एक रणनीतिक संदेश माना जा रहा है, जिसका उद्देश्य अमेरिका और उसके सहयोगियों को यह बताना है कि युद्ध की स्थिति में पूरे खाड़ी क्षेत्र की स्थिरता खतरे में पड़ सकती है। ईरान यह भी दिखाना चाहता है कि उसके पास समुद्री मार्गों, मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय नेटवर्क के जरिए जवाब देने की पर्याप्त ताकत मौजूद है।
फरवरी 2026 से शुरू हुआ युद्ध कैसे पूरे क्षेत्र में फैल गया
पश्चिम एशिया का मौजूदा संकट फरवरी 2026 में उस समय शुरू हुआ जब United States और Israel द्वारा ईरान से जुड़े ठिकानों पर बड़े हमले किए गए। इसके बाद संघर्ष तेजी से कई मोर्चों तक फैल गया और पूरे मध्य पूर्व में अस्थिरता का माहौल बन गया। तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार, ऊर्जा सुरक्षा और अंतरराष्ट्रीय बाजार पर इसका सीधा असर देखने को मिला। वैश्विक तेल कीमतों में तेज उछाल आया और दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं में चिंता बढ़ गई। अप्रैल 2026 में एक संघर्षविराम लागू हुआ, लेकिन वह पूरी तरह स्थिर नहीं रह पाया। हाल ही में अमेरिकी हमलों और ईरान के जवाबी आरोपों ने यह साफ कर दिया कि जमीन पर तनाव अब भी बरकरार है। यही कारण है कि दुनिया की निगाहें अब हर छोटे सैन्य घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।
संघर्षविराम टूटने के आरोप और बढ़ता अविश्वास
ईरान ने हाल ही में अमेरिका पर संघर्षविराम तोड़ने का गंभीर आरोप लगाया है। तेहरान का कहना है कि अमेरिकी सेना ने दक्षिणी ईरान और होर्मुज क्षेत्र के आसपास सैन्य कार्रवाई की, जो सीधे तौर पर सीज़फायर का उल्लंघन है। दूसरी ओर अमेरिकी सेंट्रल कमांड (CENTCOM) का दावा है कि उसने “आत्मरक्षा” में कार्रवाई की और उसके निशाने पर मिसाइल लॉन्च साइट्स तथा समुद्री माइंस बिछाने वाली नौकाएं थीं। इस बयानबाजी ने दोनों देशों के बीच अविश्वास को और बढ़ा दिया है। ईरान का आरोप है कि अमेरिका क्षेत्र में तनाव को जानबूझकर बनाए रखना चाहता है ताकि खाड़ी क्षेत्र में उसकी सैन्य मौजूदगी और प्रभाव कायम रहे। वहीं वॉशिंगटन लगातार यह कह रहा है कि वह अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार और वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की रक्षा के लिए कार्रवाई कर रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य बना सबसे बड़ा रणनीतिक मुद्दा
इस पूरे संकट का सबसे संवेदनशील केंद्र स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना हुआ है। दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में शामिल यह जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। युद्ध शुरू होने के बाद ईरान ने यहां जहाज़ी गतिविधियों पर कड़ा नियंत्रण लागू कर दिया था, जबकि अमेरिका ने जवाब में ईरानी बंदरगाहों और समुद्री मार्गों पर दबाव बढ़ाया। अब दोनों देशों के बीच चल रही बातचीत में यही सबसे बड़ा मुद्दा बन चुका है कि होर्मुज को किस शर्त पर पूरी तरह खोला जाएगा। ईरान चाहता है कि उसकी सुरक्षा और क्षेत्रीय अधिकारों को स्वीकार किया जाए, जबकि अमेरिका किसी भी हालत में इस मार्ग को “किसी एक देश के नियंत्रण” में नहीं रहने देना चाहता। यही वजह है कि इस मुद्दे पर समझौता बेहद कठिन दिखाई दे रहा है।
परमाणु कार्यक्रम पर गतिरोध अब भी कायम
ईरान और अमेरिका के बीच बातचीत का दूसरा सबसे बड़ा विवादास्पद विषय ईरान का परमाणु कार्यक्रम है। अमेरिका चाहता है कि ईरान अपने संवेदनशील परमाणु कार्यक्रम को सीमित करे और अंतरराष्ट्रीय निगरानी स्वीकार करे, जबकि ईरान इसे अपनी संप्रभुता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा मानता है। तेहरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है, लेकिन पश्चिमी देशों को आशंका है कि इसका इस्तेमाल भविष्य में परमाणु हथियार क्षमता विकसित करने के लिए किया जा सकता है। इसी मुद्दे पर दोनों देशों के बीच वर्षों से अविश्वास बना हुआ है और मौजूदा संघर्ष ने इस विवाद को और गहरा कर दिया है।
अमेरिका और ईरान दोनों शांति की बात भी कर रहे हैं
तनाव और सैन्य चेतावनियों के बावजूद दोनों देशों की ओर से शांति वार्ता के संकेत भी लगातार दिए जा रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री Marco Rubio ने कहा है कि समझौते की संभावना अभी खत्म नहीं हुई है और बातचीत जारी है। दूसरी ओर ईरानी मीडिया यह दावा कर रहा है कि दोनों देशों के बीच एक प्रारंभिक समझौते का मसौदा तैयार किया जा चुका है, जिसमें नौसैनिक घेराबंदी हटाने, होर्मुज में सामान्य जहाज़ी आवाजाही बहाल करने और क्षेत्रीय सैन्य गतिविधियों को सीमित करने जैसे बिंदु शामिल हैं। हालांकि अभी तक किसी अंतिम समझौते की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार जारी बैक-चैनल कूटनीति यह संकेत दे रही है कि दोनों पक्ष पूर्ण युद्ध से बचना चाहते हैं।
वैश्विक बाजार और भारत पर भी पड़ रहा असर
पश्चिम एशिया में जारी इस तनाव का असर केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है। तेल कीमतों में बढ़ोतरी, समुद्री व्यापार पर दबाव और ऊर्जा आपूर्ति की अनिश्चितता का असर दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ रहा है। भारत जैसे देशों के लिए यह संकट विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा खाड़ी क्षेत्र से आयात करता है। होर्मुज में अस्थिरता बढ़ने से पेट्रोल-डीजल की कीमतों, परिवहन लागत और महंगाई पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है। यही कारण है कि भारत समेत कई देश लगातार इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता की अपील कर रहे हैं।
दुनिया की नजर अब अगले कदम पर
विशेषज्ञों का मानना है कि हालात अभी बेहद नाजुक बने हुए हैं। एक तरफ बातचीत जारी है, दूसरी तरफ सैन्य बयानबाजी भी तेज है। यदि दोनों पक्ष समझदारी से आगे बढ़ते हैं तो यह संकट धीरे-धीरे कम हो सकता है, लेकिन किसी भी छोटी सैन्य घटना या गलत फैसले से पूरा पश्चिम एशिया फिर बड़े युद्ध की आग में झुलस सकता है। फिलहाल दुनिया की नजर इस बात पर टिकी हुई है कि आने वाले दिनों में अमेरिका और ईरान बातचीत को आगे बढ़ाते हैं या फिर तनाव एक बार फिर खुले संघर्ष में बदल जाता है।




