अंतरराष्ट्रीय / अमेरिका-क्यूबा / वैश्विक राजनीति | ABC NATIONAL NEWS | वॉशिंगटन/बीजिंग/मॉस्को | 22 मई 2026
क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति राउल कास्त्रो पर अमेरिका द्वारा हत्या और विमान गिराने जैसे गंभीर आरोप लगाए जाने के बाद वैश्विक राजनीति में नया टकराव उभरता दिखाई दे रहा है। रूस और चीन दोनों ने खुलकर अमेरिका की कार्रवाई का विरोध किया है और वॉशिंगटन पर “दबाव, धमकी और जबरदस्ती की राजनीति” करने का आरोप लगाया है। यह पूरा घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका पहले ही क्यूबा पर आर्थिक प्रतिबंध, तेल आपूर्ति पर दबाव और राजनीतिक अलगाव की रणनीति तेज कर चुका है।
अमेरिका ने राउल कास्त्रो पर 1996 में दो विमानों को गिराने की घटना में शामिल होने का आरोप लगाया है। इस घटना में चार लोगों की मौत हुई थी, जिनमें तीन अमेरिकी नागरिक शामिल थे। उस समय कास्त्रो क्यूबा की सेना के प्रमुख थे। अमेरिकी प्रशासन का दावा है कि यह हमला अमेरिकी नागरिकों की हत्या और अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन की श्रेणी में आता है। हालांकि क्यूबा ने इन आरोपों को “राजनीतिक साजिश” और “कानूनी आधार से रहित” करार दिया है।
चीन ने अमेरिका की कार्रवाई पर तीखी प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वॉशिंगटन को “धमकी और दबाव की राजनीति” बंद करनी चाहिए। चीनी विदेश मंत्रालय ने साफ कहा कि बीजिंग क्यूबा के साथ खड़ा है और किसी भी बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता है। वहीं रूस ने भी अमेरिकी कदम को “हिंसा की सीमा तक पहुंचा दबाव” बताया। क्रेमलिन के प्रवक्ता ने कहा कि किसी पूर्व या वर्तमान राष्ट्राध्यक्ष के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई स्वीकार्य नहीं मानी जा सकती।
विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला केवल राउल कास्त्रो तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अमेरिका और उसके विरोधी देशों के बीच बढ़ते वैश्विक शक्ति संघर्ष का हिस्सा बन चुका है। पिछले कुछ महीनों में अमेरिका ने क्यूबा पर प्रतिबंध और सख्त कर दिए हैं। तेल आपूर्ति पर प्रभावी रोक, आर्थिक दबाव और सुरक्षा एजेंसियों की गतिविधियों ने क्यूबा में ईंधन संकट, बिजली कटौती और खाद्य संकट को और गंभीर बना दिया है। दूसरी ओर रूस और चीन क्यूबा को अमेरिका विरोधी रणनीतिक साझेदार के रूप में देखते हैं।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पहले भी क्यूबा की कम्युनिस्ट सरकार को लेकर आक्रामक रुख दिखा चुके हैं। वे खुलकर यह कह चुके हैं कि क्यूबा की व्यवस्था “गिरने के करीब” है। इससे पहले वेनेजुएला के पूर्व राष्ट्रपति निकोलस मादुरो के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई ने भी दुनिया को चौंकाया था। अब राउल कास्त्रो के खिलाफ मामला दर्ज होने के बाद यह आशंका और बढ़ गई है कि अमेरिका लैटिन अमेरिका में अपने विरोधी शासन के खिलाफ अधिक कठोर रणनीति अपना सकता है।
इस घटनाक्रम ने शीत युद्ध जैसी नई वैचारिक ध्रुवीकरण की बहस को भी तेज कर दिया है। एक तरफ अमेरिका लोकतंत्र और मानवाधिकारों के नाम पर दबाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ चीन और रूस इसे अमेरिकी प्रभुत्व और हस्तक्षेपवाद की राजनीति बता रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय संबंधों के जानकारों का कहना है कि क्यूबा अब केवल कैरेबियाई द्वीप नहीं, बल्कि वैश्विक शक्ति संघर्ष का प्रतीक बनता जा रहा है।
क्यूबा के भीतर भी हालात लगातार मुश्किल होते जा रहे हैं। आर्थिक प्रतिबंधों और ईंधन संकट के कारण आम जनता भारी परेशानियों का सामना कर रही है। लंबे ब्लैकआउट, खाद्य संकट और आर्थिक ठहराव ने सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। इसके बावजूद हवाना सरकार अमेरिकी दबाव के सामने झुकने को तैयार नहीं दिख रही।
अब दुनिया की नजर इस बात पर टिकी है कि क्या अमेरिका केवल कानूनी और आर्थिक दबाव तक सीमित रहेगा या क्यूबा के खिलाफ और आक्रामक कदम उठाएगा। वहीं रूस और चीन का खुला समर्थन यह संकेत दे रहा है कि आने वाले समय में क्यूबा एक बार फिर वैश्विक महाशक्तियों के टकराव का बड़ा केंद्र बन सकता है।




