अर्थव्यवस्था / RBI / रुपया संकट | ABC NATIONAL NEWS | नई दिल्ली | 22 मई 2026
भारतीय रुपये में लगातार गिरावट और वैश्विक ऊर्जा संकट के बीच अब देश में आर्थिक नीति को लेकर नई बहस छिड़ गई है। 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष और जाने-माने अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को सलाह दी है कि वह “₹100 प्रति डॉलर” के मनोवैज्ञानिक स्तर से डरकर बाजार में अत्यधिक हस्तक्षेप न करे। उनका कहना है कि 100 केवल एक संख्या है और यदि परिस्थितियां मांग करती हैं, तो रुपये को स्वाभाविक रूप से कमजोर होने देना चाहिए। यह बयान ऐसे समय आया है जब अंतरबैंक बाजार में रुपया लगभग ₹97 प्रति डॉलर के स्तर तक पहुंच गया और बाजार में यह चर्चा तेज रही कि RBI ने आक्रामक हस्तक्षेप कर उसे उस स्तर से नीचे बनाए रखने की कोशिश की।
अरविंद पनगढ़िया ने सोशल मीडिया मंच X पर लिखा कि चाहे तेल संकट अस्थायी हो या दीर्घकालिक, इस समय सही नीति यही होगी कि रुपये को अवमूल्यन होने दिया जाए। उनके इस बयान को केवल मुद्रा विनिमय दर पर टिप्पणी नहीं, बल्कि मौजूदा आर्थिक हालात पर एक गंभीर संकेत के रूप में देखा जा रहा है। वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में भारी उछाल, पश्चिम एशिया संकट, स्ट्रेट ऑफ होर्मुज में अनिश्चितता और डॉलर की मजबूती ने भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर दबाव बढ़ा दिया है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, ऐसे में डॉलर महंगा होने और तेल कीमतों के बढ़ने का सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ रहा है।
आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि RBI लगातार डॉलर बेचकर रुपये को कृत्रिम रूप से मजबूत बनाए रखने की कोशिश करता है, तो इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ सकता है। दूसरी ओर, रुपये की तेज गिरावट महंगाई को और बढ़ा सकती है क्योंकि पेट्रोल, डीजल, गैस, खाद और कई आयातित वस्तुएं महंगी हो जाएंगी। यही वजह है कि RBI के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती मुद्रा स्थिरता और आर्थिक वास्तविकताओं के बीच संतुलन बनाने की है।
विश्लेषकों के अनुसार “₹100 प्रति डॉलर” का स्तर भारत में केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक प्रतीक भी बन चुका है। लंबे समय से सरकारें और केंद्रीय बैंक इस स्तर को पार होने से रोकने की कोशिश करते रहे हैं क्योंकि इससे आम जनता के बीच आर्थिक कमजोरी की धारणा बन सकती है। लेकिन कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि किसी मुद्रा की वास्तविक ताकत उसके कृत्रिम बचाव में नहीं, बल्कि अर्थव्यवस्था की संरचनात्मक क्षमता में होती है। यदि बाजार की वास्तविक स्थिति रुपये को कमजोर कर रही है, तो केवल प्रतीकात्मक स्तर बचाने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार खर्च करना दीर्घकालिक समाधान नहीं माना जा सकता।
इस पूरे घटनाक्रम ने भारत की आर्थिक संवेदनशीलता को भी उजागर कर दिया है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, तेल आपूर्ति संकट और वैश्विक व्यापारिक अनिश्चितताओं का असर सीधे भारतीय मुद्रा पर दिखाई दे रहा है। अप्रैल 2026 में भारत का तेल आयात बिल कम आयात के बावजूद भारी बढ़ोतरी दर्ज कर चुका है। यही कारण है कि बाजार में यह आशंका भी बढ़ रही है कि आने वाले महीनों में RBI को ब्याज दरें बढ़ाने जैसी सख्त नीतियां अपनानी पड़ सकती हैं।
विपक्षी दल इस स्थिति को सरकार की आर्थिक नीतियों की विफलता बता रहे हैं। कांग्रेस और अन्य विपक्षी नेताओं का आरोप है कि विदेशी निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है, रुपया लगातार दबाव में है और आम जनता पर महंगाई का बोझ बढ़ता जा रहा है। वहीं सरकार समर्थकों का कहना है कि मौजूदा संकट पूरी दुनिया में चल रही भू-राजनीतिक अस्थिरता का परिणाम है और भारत अब भी दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है।
फिलहाल इतना साफ है कि रुपया अब केवल मुद्रा बाजार का विषय नहीं रह गया, बल्कि यह भारत की आर्थिक स्थिरता, ऊर्जा सुरक्षा और वैश्विक संकटों से निपटने की क्षमता का बड़ा संकेतक बन चुका है। आने वाले दिनों में सबकी नजर RBI की अगली रणनीति पर होगी — क्या केंद्रीय बैंक रुपये को बाजार के हवाले छोड़ता है या “₹100 प्रति डॉलर” की मनोवैज्ञानिक रेखा बचाने के लिए और आक्रामक हस्तक्षेप करता है।




